हाइफा युद्ध : भारतीय योद्धाओं के बलिदान ने लिखी इजरायल की आजादी की इबारत

भारत के प्रति इजरायल का जो कृतज्ञता का भाव है, संभवत: उसके पीछे हाइफा युद्ध के इन्हीं महान भारतीय योद्धाओं का बलिदान है। भारत और इजरायल के बीच रक्त संबंध हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी ऐतिहासिक तीन दिवसीय इजरायल यात्रा के दौरान हाइफा युद्ध में वीरगति पाए सैनिकों के समाधि स्थल पर पहुँच कर दुनिया को भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस से परिचित कराया है। भारत के ही ज्यादातर लोग भारतीय योद्धाओं की इस पराक्रम की गाथा को पहली बार सुन रहे होंगे।

पराजय का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजयों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज नहीं होने दिया। शारीरिक तौर पर मरने के बाद जी उठने वाले देश इजरायल की आजादी के संघर्ष को जब हम देखेंगे, तब हम पाएंगे कि यहूदियों को ईश्वर के प्यारे राष्ट्र का पहला हिस्सा भारतीय योद्धाओं ने जीतकर दिया था। वर्ष 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इजरायल के निर्माण की नींव पड़ी थी। इसलिए हाइफा युद्ध में भारतीय सैनिकों के प्राणोत्सर्ग को यहूदी आज भी स्मरण करते हैं।

इजरायल की सरकार आज तक हाइफा, यरुशलम, रामलेह और ख्यात के समुद्री तटों पर बनी 900 भारतीय सैनिकों की समाधियों की अच्छी तरह देखरेख करती है। इजरायल के बच्चों को इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम की कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं। प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को भारतीय योद्धाओं को सम्मान देने के लिए हाइफा के महापौर, इजरायल की जनता और भारतीय दूतावास के लोग एकत्र होकर हाइफा दिवस मनाते हैं। भारतीय सेना भी 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है। अब हम समझ सकते हैं कि भारत और इजरायल के रिश्तों में सार्वजनिक दूरी के बाद भी जो गर्माहट बनी रही, वह भारतीय सैनिकों के रक्त की गर्मी से है।

भारतीय योद्धाओं के पराक्रम और साहस को समझने के लिए हाइफा युद्ध के पन्ने पलटने होंगे। हाइफा का युद्ध मानव इतिहास का सबसे बड़ा और अपनी तरह का आखिरी युद्ध है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की साम्राज्य से इजरायल के हाइफा शहर को आजाद कराने के लिए ब्रिटिश सेना की सहायता के लिए जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद से सैनिकों को भेजा गया था। चूँकि हैदराबाद के निजाम द्वारा भेजी गई टुकड़ी में लगभग सभी सैनिक मुस्लिम थे, इसलिए ब्रिटिश सेना के अधिकारियों ने उन्हें सीधे युद्ध के मैदान में नहीं उतारा। निजाम के सैनिकों को युद्ध बंदियों के प्रबंधन और देखरेख का कार्य सौंपा गया। जबकि मैसूर और जोधपुर की घुड़सवार सैन्य टुकडिय़ों को मिलाकर एक विशेष इकाई बनाई गई थी।

तुर्की, ऑस्ट्रिया और जर्मनी की संयुक्त साधन सम्पन्न शक्तिशाली सेना के विरुद्ध भारतीय सैन्य दल का नेतृत्व जोधपुर के मेजर दलपत सिंह शेखावत ने किया था, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। अदम्य साहस और सैन्य रणनीति का प्रदर्शन करके वाले मेजर दलपत सिंह शेखावत को हाइफा के नायक के रूप में जाना जाता है। हाइफा का युद्ध इसलिए बड़े युद्धों में शामिल है, क्योंकि इस युद्ध में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की विजय हुई थी।

एक ओर तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संयुक्त सेना अपनी चौकियों पर मजबूती से जमी हुई थी। उनके पास तोप, बम और बंदूक सहित अत्याधुनिक हथियार थे। जबकि भारतीय सैनिकों ने उनका मुकाबला केवल तलवार और भालों से किया। उन्होंने पैदल और घोड़ों पर सवार होकर युद्ध न केवल लड़ा, बल्कि अकल्पनीय विजय भी प्राप्त की। यह दुनिया के इतिहास में घुड़सवार सेना का अंतिम महान अभियान था। इसके साथ ही यह सैन्य इतिहास में एकमात्र घटना है, जब एक घुड़सवार सेना ने सबसे कम समय में सुरक्षित और चाक-चौबंद शहर पर कब्जा कर लिया।

हाइफा पहुँचने के बाद जब ब्रिटिश सेना को दुश्मन की मोर्चाबंदी और ताकत के बारे में पता चला तब ब्रिगेडियर जनरल एडीए किंग ने सेना को वापस बुला लिया था। ब्रिगेडियर का निर्णय उचित ही था, क्योंकि तुर्की की सेना सुरक्षित और युद्ध की दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में थी। परंतु, भारतीय योद्धा सेना को वापस बुलाने के निर्णय से खुश नहीं थे। उन्होंने कहा कि ‘हम अपने देश में किस मुंह से जाएंगे। अपने देश की जनता को कैसे बताएंगे कि शत्रु के डर से मैदान छोड़ दिया। युद्ध के मैदान में पीठ दिखाकर भागना उचित नहीं माना जाता। इसलिए हम तो लड़कर यहीं वीरगति प्राप्त करना पसंद करेंगे।’

भारतीय सैनिक सीधे मौत के मुँह में जाने की इजाजत माँग रहे थे। काफी समझाने के बाद भी जब भारतीय सैनिक नहीं माने, तब ब्रिटिश सेना के अधिकारी समझ गए कि यह असली योद्धा हैं, इन्हें रोका नहीं जा सकता। भारतीय योद्धाओं के दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस को देखकर उन्हें हमले की अनुमति दे दी गई।

तलवार और भालों से सज्जित घुड़सवार एवं पैदल भारतीय सेना ने 23 सितंबर को सुबह 5 बजे हाइफा की ओर बढ़ना प्रारंभ किया। भारतीय सेना का मार्ग माउंट कार्मल पर्वत श्रृंखला के साथ लगता हुआ था और किशोन नदी एवं उसकी सहायक नदियों के साथ दलदली भूमि की एक पट्टी तक सीमित था। जैसे ही सेना 10 बजे हाइफा पहुँची, वह माउंट कार्मल पर तैनात 77 एमएम बंदूकों के निशाने पर आ गए। परंतु, भारतीय सेना का नेतृत्व कर रहे जवानों ने यहाँ बहुत सूझबूझ दिखाई।

मैसूर लांसर्स की एक स्क्वाड्रन शेरवुड रेंजर्स के एक स्क्वाड्रन के समर्थन से दक्षिण की ओर से माउंट कार्मल पर चढ़ी। उन्होंने दुश्मनों पर अचानक आश्चर्यचकित कर देने वाला हमला कर कार्मल की ढलान पर दो नौसैनिक तोपों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने दुश्मनों की मशीनगनों के खिलाफ भी वीरता के साथ आक्रमण किया। उधर, 14:00 बजे ‘बी’ बैटरी एचएसी के समर्थन से जोधपुर लांसर्स ने हाइफा पर हमला किया। मजबूत प्रतिरोध के बावजूद भी लांसर्स ने बहादुरी के साथ दुश्मनों की मशीनगनों पर सामने से आक्रमण किया। 15:00 बजे तक भारतीय घुड़सवारों ने उनके स्थानों पर कब्जा कर तुर्की सेना को पराजित कर हाइफा पर अधिकार कर लिया। पुस्तक : इजऱायल में भारतीय वीरों की शौर्यगाथा, लेखक : रवि कुमार, पृष्ठ21 और 22

हाइफा के बलिदानी योद्धाओं को श्रद्धांजलि देते प्रधानमंत्री मोदी

लगभग 2000 वर्ष से अपनी जन्मभूमि से बेदखल, दुर्व्यवहार और अमानवीय यातनाओं के शिकार यहूदियों के लिए 23 सितंबर, 1918 को तुर्की साम्राज्य से हाइफा शहर की मुक्ति का महत्त्व बहुत अधिक था। यूरोप सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में रह रहे यहूदियों ने जब हाइफा की मुक्ति का समाचार सुना तो वे खुशी से झूम उठे। हाइफा शहर की मुक्ति के बाद भी भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के सैनिकों के साथ मिलकर पूरे इजरायल को मुक्त करावाने के लिए कुछ और लड़ाइयाँ भी लड़ीं। इजरायल की आजादी के लिए लड़े गए विभिन्न युद्धों में लगभग 900 साहसी भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है।

भारत के प्रति इजरायल का जो कृतज्ञता का भाव है, संभवत: उसके पीछे इन्हीं महान योद्धाओं का बलिदान है। भारत और इजरायल के बीच रक्त संबंध हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी ऐतिहासिक तीन दिवसीय इजरायल यात्रा के दौरान हाइफा युद्ध में वीरगति पाए सैनिकों के समाधि स्थल पर पहुँच कर दुनिया को भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस से परिचित कराया है। भारत के ही ज्यादातर लोग भारतीय योद्धाओं की इस पराक्रम की गाथा को पहली बार सुन रहे होंगे।

पिछले 70 साल में यह पहली बार है कि भारत का कोई प्रधानमंत्री इतने महत्त्वपूर्ण देश में पहली बार गया है। भारतीय वीरों के समाधि स्थल पर पहुँचने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री भी नरेन्द्र मोदी हो गए हैं। जिस तरह इजरायल अपने बच्चों को साहसी बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकों में हाइफा युद्ध और भारतीय सैनिकों के शौर्य के पाठ पढ़ा रहा है, उसे देखते हुए भारत सरकार को भी अपने यहाँ किताबों में इन वीर गाथाओं को स्थान देना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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