भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके हैं लालू यादव

लालू कोई गरीबों और मजलूमों की सामाजिक और आर्थिक तरक्की का धर्मयुद्ध नहीं लड़ रहे हैं। लालू का मकसद सिर्फ इतना है कि गैर कानूनी तौर पर इकठ्ठा किये हुए धन को कानून की नज़रों से कैसे छुपा लिया जाए। इस कारण जब से लालू यादव के परिवार के खिलाफ सीबीआई ने सख्ती बरती है, तो ध्यान भटकाने के उद्देश्य से लालू इसे सियासी रंजिश का नाम देकर बड़ा सियासी वितंडा खड़ा करने की कवायदों में लग गए हैं।

बिहार की सियासत में एक मुहावरा ख़ासा चर्चा में रहता है कि ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, बिहार में रहेगा लालू’। मतलब यह कि लालू के पाँव बिहार की सियासत में गहरे जमे हुए हैं। लालू ने हर कीमत पर खुद को बिहार की सियासत में कायम रखने की कोशिश की भी है। लालू के पास सोशल इंजीनियरिंग का कौशल है; जात-बिरादरी का कार्ड खेलकर वह सत्ता में बने हुए हैं, लेकिन उनके अन्दर राजनीतिक और व्यक्तिगत नैतिकता ज़रा भी नहीं है। उनके साथ भ्रष्टाचार के इतने मामले जुड़े हुए हैं कि लालू का राजनीतिक चरित्र घोटाला-प्रधान हो गया है। लालू और उनके परिवार के खिलाफ अगर एक और घोटाला जुड़ता है, तो यह आपको अब चकित नहीं करेगा, क्योंकि सामाजिक  न्याय  के नाम पर लालू ने अपनी जाति का इस्तेमाल कर बिहार में भरपूर लूट मचाई है और आज  वे भारतीय सियासत में घोटाले का पर्याय बन चुके हैं।  

मगर, इस बार संकट सिर्फ लालू पर नहीं उनके बच्चों पर भी आ पड़ा है। पुत्र तेजस्वी यादव और पुत्री मीसा भारती दोनों सीबीआई और ईडी की रडार पर हैं। लालू अपने बच्चों को बचाने में लगे हैं ताकि परिवार की सियासी विरासत कहीं खतरे में न पड़ जाए। लालू की सियासी विरासत पर खतरे का मतलब यह है कि कहीं उनके बेटे को उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी से तो नहीं हटाया जाएगा।

लालू कोई गरीबों और मजलूमों की सामाजिक और आर्थिक तरक्की का धर्मयुद्ध नहीं लड़ रहे हैं। लालू का मकसद सिर्फ इतना है कि गैर कानूनी तौर पर इकठ्ठा किये हुए धन को कानून की नज़रों से कैसे छुपा लिया जाए। इस कारण जब से लालू यादव के परिवार के खिलाफ सीबीआई ने सख्ती बरती है, तो ध्यान भटकाने के उद्देश्य से लालू इसे सियासी रंजिश का नाम देकर बड़ा सियासी वितंडा खड़ा करने की कवायदों में लग गए हैं।

सीबीआई के पास लालू यादव के रेलमंत्री रहते हुए रेलवे के होटल के आवंटन में हुए फर्जीवाड़े का हिसाब है। लालू पर रेलवे के दो होटलों के टेंडर बांटने में फर्जीवाड़ा करने का आरोप है। लालू की बेटी मीसा और दामाद पर भी सीबीआई का शिकंजा कस रहा है। सीबीआई ने लालू और उनके परिवार समेत आठ लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 120बी, 13, 13(1)(डी) पीसी एक्ट के तहत केस दर्ज किया है।

लालू के रेलमंत्रित्व काल में रेलवे के दो होटलों की देखभाल के लिए इसे प्राइवेट कंपनी को लीज पर देने का फैसला किया गया था। लेकिन, रेलवे ने जो टेंडर निकाले थे, उसमें भारी अनियमितता पाई गई है। बदले में उन निजी कंपनियों की ओर से लालू को ज़मीन दिए जाने की बात भी सामने आई है। लेन-देन के इस पूरे गोरखधंधे को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है।

रेलवे टेंडर घोटाला : क्या है मामला ?

  • रेलवे के दो होटल आईआरसीटीसी को ट्रांसफर किए गए।
  • टेंडर सुजाता प्राइवेट लिमिटेड को दिए गए।
  • सुजाता प्राइवेट लिमिटेड ने टेंडर मिलने के बदले जमीन सरला गुप्ता की कंपनी मेसर्स डिलाइट प्राइवेट लिमिटेड को ट्रांसफर की।
  • बाद में ये 32 करोड़ की जमीन लालू प्रसाद यादव की कंपनी मेसर्स लारा प्रोजेक्ट एलएलपी को सिर्फ 65 लाख रूपए में ट्रांसफर की गई, जबकि सार्किल रेट 32.5 करोड़ था। इस हिसाब से 3 एकड़ जमीन की कीमत 94 करोड़ ठहरती है।
  • इसी मामले में लालू और उनके परिवार समेत आठ लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 120 बी (आपराधिक साजिश), 13, 13 (1) (डी) पीसी एक्ट का मामला दर्ज।
  • लालू यादव, राबड़ी देवी, बिहार सरकार में मंत्री एवं लालू के पुत्र तेजस्वी यादव, पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता, विजय कोचर, विनय कोचर, लारा प्रोजेक्ट और पीके गोयल पर केस दर्ज किया गया है।

लालू की बड़ी बेटी मीसा का जैन ब्रदर्स से कनेक्शन ?

  • मीसा के खिलाफ काला धन को सफ़ेद करने का आरोप है। ईडी का आरोप है कि कारोबारी बीरेंद्र जैन और सुरेंद्र कुमार जैन ने करीब 8000 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग की। 
  • जैन ब्रदर्स ने मीसा के पति शैलेश कुमार की बंद पड़ी कंपनी मीशैल पैकर्स के 10 रुपए मूल्य के 1 लाख 20 हजार शेयर 90 रुपए प्रीमियम पर खरीदे।
  • इसी पैसे से दिल्ली के बिजवासन में 1.41 करोड़ रुपए में 3 एकड़ का फार्म हाउस खरीदा गया।
  • मीसा भारती का चार्टर्ड अकाउंटेंट राजेश अग्रवाल को इन्फोर्समेंट डिपार्टमेंट ने पहले ही अरेस्ट कर लिया है। 
  • जैन ब्रदर्स पर नेताओं और उनके परिवार वालों की ब्लैकमनी लीगल करने का भी आरोप है।

उल्लेखनीय होगा कि लालू को जब चारा घोटाले में जेल भेजा गया था, तो उन्होंने अपनी पांचवीं पास पत्नी राबड़ी देवी के सिर पर बिहार का ताज धर दिया। लालू जब जेल से निकले, तो उन्होंने फिर सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। इसी तरह भ्रष्टाचार के मामले में अदालत से सजा पाने के बाद जब लालू यादव के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो लालू ने अपने बच्चों को चुनावी मैदान में उतार दिया।

एक बार जब लगा कि लालू वंश की सियासत का सफाया हो जाएगा तो मुस्लिम-यादव (माय) समीकरण पर दांव खेलकर लालू ने बाजी पलट दी और नीतीश कुमार के जद(यू) के साथ मिलकर सरकार बना ली। समझा जा सकता है कि लालू की कुल जमा सियासत जाति के गणित पर आधारित रही है।

दरअसल लालू ने बिहार में यादव कुल की सियासत की। वे समाजवाद के रथ पर चढ़कर सत्ता में आए, मगर अगड़ों-पिछड़ों को लड़ाकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का काम उन्होंने किया। लालू के राज में भारतीय राजनीति को एक नया शब्द मिला, जिसे ‘जंगलराज’ का नाम दिया गया। जंगलराज  इसलिए क्योंकि शहरों, कस्बों और गाँवों में लालू से संरक्षण पाए लोग उनका नाम लेकर लूट करने लगे। प्रदेश में अपहरण एक उद्योग बन गया। 

अब बात लालू के सहयोग से सरकार चला रहे नीतीश कुमार की करें तो बिहार की जनता ने उनका समर्थन इसलिए किया ताकि बिहार में स्वच्छ प्रशासन लाया जा सके, इसलिए नहीं कि वे लालू के कुनबे की करतूतों पर पर्दा डालते जाएं। मगर इस पूरे प्रकरण पर नीतीश की खामोशी गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्हें बिहार की सियासत में किस नाम से याद किया जाए, यह आज उनको ही देखना होगा। नीतीश की छवि सुशासन की रही है, मगर लालू के साथ जाकर उन्होंने उसे नुकसान ही पहुँचाया है। अब जब लालू और उनके परिवार के खिलाफ इतने आरोप सामने आए हैं, ऐसे में नीतीश खामोश नहीं रह सकते। उन्हें स्पष्ट करना होगा कि वे किधर खड़े हैं, क़ानून के पाले में या लालू की रक्षा में।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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