बंगाल हिंसा : इखलाक और जुनैद पर आंसू बहाने वाले कार्तिक घोष पर सन्नाटा क्यों मारे हुए हैं ?

मालदा, धूलागढ़ से लेकर अब 24 परगना के बशीरहाट तक देखा जा सकता है कि ममता बनर्जी कट्टर मज़हबी ताकतों के हाथों में खुलकर खेल रही हैं। इसके अलावा उनके खासमखास कोलकाता की एक मस्जिद के एक कुख्यात इमाम ने कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक बेहद आपतिजनक फतवा जारी किया था। देश के प्रधानमंत्री पर हमला करने का फतवा जारी करने के बावजूद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा उस मौलवी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी, बल्कि वह उनका खासमखास बना हुआ है। यह दिखाता है कि वे किस कदर कट्टर मजहबियों की चपेट में हैं।

कार्तिक घोष न तो जुनैद बन पाया और न ही इखलाक। कार्तिक के लिए तथाकथित सेकुलरों से लेकर स्वघोषित मानवाधिकारवादियों ने जंतर-मंतर पर जाकर कैंडिल मार्च भी नहीं निकाला। बता दें कि पश्चिम बंगाल के 24 परगना में बीते दिनों भड़की खूनी सांप्रदायिक हिंसा में कार्तिक को अपनी जान गंवानी पड़ी। ये देश के सेकुलरानों का मिजाज है। कोई हिन्दू मारा जाए तो उफ तक न करो। कोई मुसलमान भीड़ का शिकार हो तो हाय-तौबा मचाना चालू कर दो। जुनैद की मौत को कतई जायज नहीं माना जा सकता। उसके कातिलों को कठोर सजा मिले ये सारा देश चाहता है। पर कार्तिक के कत्ल पर मौत की चुप्पी क्यों छाई रही, देश इस सवाल का जवाब भी चाहता है ?

पश्चिम बंगाल में हालात खराब होते जा रहे हैं।  कोलकाता से सटा उत्तर 24-परगना जिला अशांत है। जनता में आक्रोश हैं। कोलकात्ता के पड़ोस में है 24 परगना। वहां पर एक आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट के बाद जमकर बवाल काटा गया। इलाके में हिंसा भड़कने के दौरान कई मंदिर व स्कूल जला दिए गए और दर्जनों दुकानों में लूटपाट की गई। दरअसल वहां 11वीं कक्षा के एक छात्र ने फेसबुक पर मुस्लिमों के किसी पवित्र स्थान के बारे में अपमानजनक टिप्पणी पोस्ट कर दी थी, जिसके विरोध में हज़ारों कट्टर मजहबी कूद पड़े कोहराम मचाने। जमकर दंगे हुए। उस भीड़ में से कुछ तो उस छात्र को पत्थर मारकर मार डालने की इजाज़त मांग रहे थे, तब जबकि उस छात्र को तत्काल गिरफ़्तार कर लिया गया।

एक नाबालिग़ बच्चे की इस छोटी सी ग़लती को भी ये कट्टर मजहबी बर्दाश्त नहीं कर सके। माफ़ करने की बजाय, सड़कों पर बवाल काटने उतर पड़े। जरा इन सिरफिरों से पूछा जाय कि एक पोस्ट से क्या बिगड़ गया उस पवित्र स्थान का। एक तरफ़ अल्लाह को सबसे रहमदिल कहते हो और ख़ुद इतने कमज़र्फ नफरत-दिल हो ?  खैर, पुलिस ने सजगता दिखाते हुए फेसबुक पर वह पोस्ट लगाने वाले नाबालिग छात्र को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन, फिर भी मुसलमान सड़क जाम करने लगे, पुलिस पर हमले किए और पुलिस वाहनों  को आग के हवाले कर दिया गया। हालांकि यहाँ एक सवाल पुलिस पर भी उठता है कि क्या उस लड़के की गलती इतनी बड़ी थी कि उसकी गिरफ़्तारी करनी पड़ी ?

वैसे, बंगाल में ये मुस्लिम साम्प्रदायिकता नयी नहीं है। इसकी जड़ें आज़ादी से पहले ही जम गयी थीं, जिन्हें आज़ादी के बाद कांग्रेसी, वामी और अब ममता बनर्जी की सरकार द्वारा अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से प्रेरित होकर लगातार सींचा गया है। याद रखिए कि बंगाल में मुस्लिम साम्प्रदायिकता का इतिहास 1906 से साफ तौर पर चालू होता है। उस साल ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी। उसके बाद बंगाल के बंटवारे के साथ ही वहां पर साम्प्रदायिकता की जड़ें गहरी होती चली गईं।

अंग्रेजों ने बंगाल के विभाजन का कारण तो प्रशासनिक बताया, लेकिन इसका मुख्य कारण बंगाल का क्षेत्रीय विभाजन धर्म के आधार पर कर के स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रक्रिया को कमजोर करना था, क्योंकि बंगाल उस समय राष्ट्रीय आन्दोलन का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था। बंगाल का विभाजन करके गोरों की सरकार मुसलमानों को  यह सन्देश देना चाहती थी कि नया प्रान्त बन जाने से उन्हें राजनीतिक व प्रशासनिक अवसर ज्यादा प्राप्त होंगे।

ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस और बंगाल के राष्ट्रवादियों द्वारा इस विभाजन के अवश्यम्भावी विरोध की दशा में इस विवाद को हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का रूप देना चाहती थी। कुछ हद तक अंग्रेजों यह नीति सफल भी रही जब मुस्लिमों का एक बहुत बड़े तबका अंग्रेजों के झांसे में आते हुए बंगाल विभाजन के समर्थन में उतर आया और इसके खिलाफ होने वाले आन्दोलन को उन्होंने हिन्दू बहुसंख्यक तानाशाही की संज्ञा दी। उल्लेखनीय होगा कि मुस्लिम लीग के स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराना नहीं था। इसका लक्ष्य  अंग्रेजों के प्रति भारतीय मुस्लिमों के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर उन्हें ब्रिटिश सरकार के नजदीक लाना था। वो इसने किया भी।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बंगाल कट्टर मुसलमानों का गढ़ बहुत पहले से बन चुका है। आपको याद होगा कि पिछले साल मालदा में हजारों मुसलमानों की भीड़ ने किस तरह से उपद्रव किया था। मालदा में बवाल करने वालों की मांग थी कि कमलेश तिवारी नाम के उस शख्स को फांसी दे दी जाए जिसने उनके नबी की शान में तथाकथित गुस्ताखी की। ये मांग तब हो रही थी, जब तिवारी को रासुका लगाकर जेल में डाल दिया गया था। उस पर कई कठोर धाराएं लगा दी गई थीं। लेकिन, फांसी की मांग करने वालों को ये  नहीं पता था कि तिवारी ने जो अपराध किया है, उसकी सजा किसी भी प्रकार से फांसी नहीं हो सकती देश के मौजूदा कानून के अन्दर।

इसके साथ ही एक और मामला उल्लेखनीय है कि कोलकाता के एक मदरसे के हेडमास्टर काजी मासूम अख्तर को सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीटा जाता है, क्योंकि उसने अपने छात्रों को राष्ट्रगान सिखाने की कोशिश की थी। अब यह सवाल अहम हो गया है कि क्या भारत में राष्ट्रगान गाना समाज के एक वर्ग के लिए जरूरी नहीं है? और इसपर भी एक लंबी डरावनी चुप्पी सामने आ रही है उन कथित लेखकों की तरफ से जो असहिष्णुता के सवाल पर  अपने पुरस्कार लौटाते रहे हैं या जंतर-मंतर पर धरने पर बैठते रहे हैं।

बहरहाल, 24 परगना के उपद्रवियों पर ममता बनर्जी की तथाकथित सेकुलर सरकार कोई कड़ी कार्रवाई करती नज़र नहीं आ रही। ताज़ा मामले में इतने व्यापक स्तर पर आगजनी हुई और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  ने हालातों पर काबू पाने की बजाय राज्य के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी  पर ही आरोप लगाने चालू कर दिए। कहा कि राज्यपाल महोदय ने धमकी दी। क्या उन्हें यह शोभा देता है कि उनका राज्य जल रहा है और वो सियासत कर रही हैं ? क्या राज्यपाल को इतना भी अधिकार नहीं कि मुख्यमंत्री से यह पूछ सके कि स्थिति पर नियन्त्रण क्यों नहीं हो रहा ? क्या केशरीनाथ त्रिपाठी ने  दंगाग्रस्त इलाकों की स्थिति पर ममता बनर्जी से फोन पर बात करके कोई अपराध कर दिया? वास्तव में सब अपनी जवाबदेही से बचने के लिए ममता द्वारा अपनाए जा रहे हथकण्डे हैं।

सारा देश देख रहा है कि ममता बनर्जी सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों में खुलकर खेल रही हैं। आपको याद होगा कि उनके एक खासमखास कोलकाता की एक मस्जिद के एक कुख्यात इमाम ने कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक बेहद आपतिजनक फतवा जारी किया था। कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरुर रहमान बरकती ने फतवा जारी करते हुए मोदी का अपमान करने वाले को 25 लाख रुपए का इनाम देने का वादा किया था। जरा देख लीजिए कि कितना खतरनाक था वो फतवा।

देश के प्रधानमंत्री पर हमला करने का फतवा जारी करने के बावजूद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा उस मौलवी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी, बल्कि वह उनका खासमखास बना हुआ है। एक बात देश को समझ लेनी चाहिए कि बंगाल तेजी से कट्टर मुसलमानों की चपेट में आ रहा है। ये गंभीर स्थिति है। अब लापरवाही करने से पश्चिम बंगाल देश के लिए नासूर बन जाएगा।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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