भारत से युद्ध की हालत में नहीं है चीन, ऐसा किया तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल होगी !

चीन में स्थिति ये है कि वहाँ कभी बेहद सस्ती रही श्रम शक्ति अब धीरे-धीरे बढ़ते बुढ़ापे के कारण महँगी होती जा रही है, जिससे चीन की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है। भारत में अपने उत्पादों के लिए बढ़ती मुश्किलों और आंतरिक रूप से डांवाडोल हो रही अर्थव्यवस्था के कारण ऊपर से मजबूत और चमक-दमक वाला दिख रहा चीन अन्दर ही अन्दर आर्थिक रूप से काफी परेशान है। ऐसे में इस बात की कोई संभावना नहीं लगती कि चीन हमसे युद्ध ठानने का जोखिम उठाएगा। अगर उसने ऐसा कोई कदम उठाया तो ये खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा।

ये सर्वविदित है कि भारत का बाज़ार घटिया चीनी उत्पादों से अटा पड़ा है। चीन के माल दोयम दर्जे के हैं, लेकिन सस्ते होने के कारण इनने धीरे-धीरे घरों में जगह बना ली है। खेती के सामान से लेकर उद्योग, मोबाइल, खिलौने, खाने-पीने के सामान; हर जगह चीनी उत्पादों ने अपनी पैठ बना ली है। हमें यह समझना होगा कि स्वदेशी सामान के उपयोग से ही चीन को हराया जा सकता है, जब तक आपके अन्दर राष्ट्र गौरव का एहसास नहीं पैदा होता है, आप चीन से मुकाबला नहीं कर सकते। अगर चीन के व्यापार को नुकसान पहुँचता है, तो उससे सीधे चीन को भी तकलीफ होगी।

हालांकि अब भारत चीनी गीदड़-भभकी से घबराना छोड़ चुका है, जिसकी नजीर डोकलाम सीमा विवाद के दौरान देखने को मिली है। यह 1962 नहीं है, यह 2017 है; हमें चीन के आँखों में आँख डालकर सीमा पर खड़ा होना है, जैसा हमारे सैनिक कर भी रहे हैं। पिछले दो हफ़्तों से, भारत और भूटान के नियंत्रण वाले इलाके में आधारभूत संरचना का विकास करके चीन भारत के सामने ऐसी ही चुनौती खड़ा करना चाहता है ताकि भारत इस इलाके से अपने कदम खींच ले। डोकलाम नामक स्थान पर चीन, भूटान और भारत की सीमा मिलती हैं,  चीन इसको लेकर तनाव पैदा कर रहा है।

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले इन दोनों देशों के बीच 3500 किमी की साझी सीमा है, जिसके बहुत बड़े हिस्से ऐतिहासिक तौर पर विवादित रहे हैं। जहाँ अनेक स्थानों पर सीमाबंदी जैसी कोई चीज नहीं है। इन इलाकों में भारत और चीन के बीच छोटी-मोटी झड़पें सामान्य हैं, लेकिन डोकलाम को लेकर चीन का व्यवहार कुछ ज्यादा ही  कटुतापूर्ण हो गया है।

सबको पता है हमारे लिए 1962 के युद्ध की यादें अच्छी नहीं हैं। इसमें देश की पराजय हुई थी। ऐसा होने की वजह यह थी  कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पंचशील के सुनहरे सपने में खोये हुए थे, हिंदी-चीनी भाई भाई के सुनहरे ख्वाब बुने जा रहे थे। कई मायनों में यह भारत की सैन्य हार से ज्यादा एक राजनीतिक हार थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोब्गे (सांकेतिक चित्र)

भारत और भूटान आपसी दोस्ती और भाईचारे में यकीन रखते हैं, साथ ही भूटान का चीन के साथ कोई कूटनीतिक संबंध भी नहीं है। अपनी सुरक्षा के लिए भूटान भारत पर निर्भर है। ऐसे में चीन इस इलाके में सड़क बनाकर भारत के ऊपर नज़र रखना चाहता है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत के साथ जोड़ती है।

चीन के बौखलाने के कई कारण हैं। भारत ने वन बेल्ट वन रोड (OBOR) का विरोध किया है, जिससे चीन भड़का हुआ है। दूसरी तरफ हाल ही में दलाईलामा ने अरुणाचल प्रदेश की यात्रा भी की है, जिसे चीन अपना हिस्सा मानता रहा है। तीसरी बात मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ प्रोजेक्ट से चीनी उत्पादों पर लगाम लगनी तय है।

भारत और इजराइल की नजदीकियां बढ़ रही है, यह भी चीन की परेशानी बढ़ाने वाला है। भारत-चीन के बीच छोटी-मोटी झड़पें होती रहती हैं, लेकिन  लड़ाई की सम्भावना नहीं के बराबर है। चीन हमसे युद्ध ठानने जैसी मूर्खता नहीं करेगा। अगर उसने ऐसा किया तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल होगी। इस बात के पीछे कई ठोस कारण है, जिन्हें गंभीरता से समझना होगा।

भारत और इजरायल की बढ़ती नज़दीकियाँ चीन को परेशान कर रही हैं

दरअसल चीनी उत्पाद इस वक़्त हद से ज्यादा भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं। इलेक्ट्रोनिक उत्पादों से लेकर आईपीओ सेक्टर तक देश में चीनी कम्पनियां सक्रिय हैं। मोबाइल के बाजार पर भी चीनी कंपनियों का दबदबा रहा है। आईपीएल में चीनी कंपनियों की बड़ी भागीदारी रही है।  बाजार पर चीनी दबदबा तो जगजाहिर ही है। लेकिन, हाल के दिनों में मोदी सरकार की ‘मेक इन इण्डिया’ और जीएसटी जैसी पहलों के बाद चीन के इस बाजार को धक्का लगना शुरू हुआ है।

वहीं, दूसरी तरफ चीन में स्थिति ये है कि वहाँ कभी बेहद सस्ती रही श्रम शक्ति अब धीरे-धीरे बढ़ते बुढ़ापे के कारण महँगी होती जा रही है, जिससे चीनी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है। भारत में अपने उत्पादों के लिए बढ़ती मुश्किलों और आंतरिक रूप से डांवाडोल हो रही अर्थव्यवस्था के कारण ऊपर से मजबूत और चमक-दमक वाला दिख रहा चीन अन्दर ही अन्दर आर्थिक रूप से काफी परेशान है।

वैसे, चीन की परिस्पर्धा सिर्फ भारत के साथ नहीं है, चीनी विस्तारवाद से अमेरिका भी उसी तरह खफा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी चीनी मालों पर रोक लगाने की वकालत की है। दुनिया में चीन के प्रति अब लगभग ऐसा ही माहौल बन चुका है। भारत की अर्थव्यवस्था 7 % के दर से विकास कर रहा है, वहीं चीन की माली हालत दिन-प्रतिदिन गिर रही है।

चीन घटिया माल से आपके बाज़ार को भर चुका है, जिसके लिए धीरे-धीरे उसे बाजार मिलना मुश्किल होता जाएगा। अतः इन सब बातों को देखते हुए कोई संभावना नहीं लगती कि चीन भारत से युद्ध ठानने का जोखिम उठाएगा। अगर उसने ऐसा कोई कदम उठाया तो ये खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम होगा। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ये उनके निजी विचार हैं)

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