भारतीय दर्शन को समझने के लिए आवश्यक है संस्कृत का ज्ञान

प्राचीन काल से ही भारत में एक-एक गहन विचार को सूक्ष्मता व समग्रता में अभिव्यक्त करने का प्रयास हुआ। इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा संस्कृत रही। संस्कृत की इस भाषायी क्षमता को विलियम जोन्स ने यह कहते हुए व्यक्त किया कि संस्कृत भाषा की आश्चर्यजनक संरचना है, जो ग्रीक से अधिक परिपूर्ण है, लेटिन से अधिक विस्तृत है और अधिक परिष्कृत है – “The language of Sanskrit is a wonderful structure, more perfect than Greek, more copious than Latin and more exquisitely refined than either.” भारत में ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली संस्कृत से आई है तथा भारत की सभी भाषाओं का विकास संस्कृत की गोद में हुआ है।

देश के उच्चतम न्यायालय ने संतोष कुमार बनाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय (याचिका सं. 299, 1989) वाद (संस्कृत सम्बन्धी) के निर्णय की शुरुआत में एक बहुत ही गहन व रोचक घटना का उदाहरण दिया। वह उदाहरण भारतीयता व संस्कृत के सम्बन्ध को समझने में सहायक है। केम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर अपने शान्त कक्ष में अपने अध्ययन में डूबा हुआ है: एक उत्तेजित अंग्रेज सिपाही उस अध्ययन कक्ष में प्रवेश करता है और प्रोफेसर को कोसता है कि उसके व उसके जैसे अनेक व्यक्ति जर्मनों से लड़ते हुए जो त्रासदी झेल रहे हैं उसमें वह भाग क्यों नहीं ले रहा।

प्रोफेसर उस सिपाही से शान्ति से पूछता है कि वह किसके लिए लड़ रहा है? इसका तुरन्त उत्तर मिलता है- देश की रक्षा के लिये। उस विद्वान ने जानना चाहा कि वह देश क्या है जिसके लिये वह रक्त बहाने को तैयार है। सैनिक उतर देता है- वह भूमि का भाग व इसमें रहने वाले लोग हैं। आगे पूछने पर सैनिक कहता है, यह इतना ही नहीं है अपितु देश की संस्कृति है जिसे वह बचाना चाहता है। प्रोफेसर शान्ति से कहता है कि वह उसी संस्कृति को योगदान दे रहा है। सैनिक शान्त होकर प्रोफेसर के सम्मान में झुकता है तथा अधिक उत्साह से अपने देश की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने का संकल्प लेता है। यह घटना उस समय की है जब दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड अपने अस्तित्व की लड़ाई लगभग आखिरी क्षणों में लड़ रहा था और इंग्लैण्ड की अच्छी विजय के लिये सभी अंग्रेजों ने अपने-अपने ढंग से योगदान दिया।

इस घटना के उदाहरण के माध्यम से न्यायालय ने आगे कहा कि इससे पश्चिम के लोगों का भी अपनी संस्कृति के प्रति इतना प्रेम प्रदर्शित होता है। जहां तक “हम भारत के लोग” का संबंध है, वे हमेशा इस प्राचीन भूमि की सांस्कृतिक विरासत को उच्च सम्मान में रखते हैं। इस विरासत की रक्षा के लिये संस्कृत का अध्ययन निःसन्देह आवश्यक है। संस्कृत के अध्ययन के बिना भारतीय दर्शन को समझना संभव नहीं है जिसके आधार पर हमारी संस्कृति व विरासत आधारित हैं।

किसी विद्वान ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति या राष्ट्र के स्वभाव को जानना हो तो उसका इतिहास व दर्शन जानना चाहिए। इसे ध्यान में रखते हुए विचार करें कि भारत का स्वभाव क्या है, भारतीयता क्या है, तो इसे समझना संस्कृत के बिना संभव नहीं है। इतिहास की सही व्याख्या करने के लिये संस्कृत का ज्ञान बहुत आवश्यक होता है। दुर्भाग्य से कई इतिहासकार संस्कृत नहीं जानते जिसका इतिहास लेखन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सांकेतिक चित्र

पाश्चात्य दर्शन के लिये प्रसिद्ध कथन है कि सम्पूर्ण पाश्चात्य दर्शन प्लेटो व अरस्तु के दर्शन की पादटिप्पणी (foot note) है। इसे भारतीय दर्शनों के संदर्भ में देखा जाये तो सम्पूर्ण भारतीय दर्शन के केन्द्र में वेद-उपनिषद् है। दर्शन व्यवस्थित दृष्टिकोण का नाम है। किसी भी व्यक्ति, समाज व राष्ट्र का दॄष्टिकोण उसके विचारों व जीवन-मूल्यों का निर्धारण करता है। छान्दोग्य उपनिषद् कहता है, जिस प्रकार अलग-अलग तरह के आभूषण (गहने) बना लेने पर भी उनमें विद्यमान तत्त्व सोना ही रहता है, उसी प्रकार अलग-अलग प्राणियों में एक ही तत्त्व अलग-अलग रूप में प्रकट होता है। वह तत्त्व सभी प्राणियों का ‘स्व’ है।

इसी प्रकार किसी भी राष्ट्र के जीवन-मूल्य यदि उसकी अलग-अलग ज्ञान विधाओं, जीवन व्यवस्थाओं व कार्यों में प्रकट होते हैं, तो वह उस देश की स्वतंत्रता कही जायेगी। इसके अनुसार देखा जाये तो यह प्रश्न भी उठता है कि क्या भारत सच में बौद्धिक रूप से स्वतन्त्र है ? आज भी शिक्षा पद्धति में समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, भाषा विज्ञान, रसायन विज्ञान इत्यादि अनेक विषयों में अधिकतर पाश्चात्य सिद्धान्तों के बारे में बताया जाता है। जिन देशों में व्यवस्थित समाज रचना नहीं रही उनके सिद्धान्तों के आधार पर भारतीय समाज का अध्ययन करना कहाँ तक उचित है? भारतीय दृष्टिकोण से क्या उपयुक्त है, इसके सम्बन्ध में बहुत कम बताया जाता है। संस्कृत-शास्त्रों में निहित ज्ञान-विज्ञान को जाने बिना इस विमर्श को बदलना संभव नहीं होगा। स्वतन्त्र भारत के बौद्धिक जागरण में संस्कृत की भूमिका को प्रथम संस्कृत आयोग ने निम्नवत प्रकार से रेखांकित किया –

“Sanskrit will be necessary for us as the one main source for our words and ideas, ideas relating primarily to the permanent things of Indianism. In the development of our modern languages, Sanskrit will be sine qua non to enable us to achieve the completeness of our knowledge in the study of the various sciences. And, finally, Sanskrit will be necessary for the retention of those traditions in our life, which are still living and which can bear fruit by virtue of their excellence and usefulness”.

प्राचीन काल से ही भारत में एक-एक गहन विचार को सूक्ष्मता व समग्रता में अभिव्यक्त करने का प्रयास हुआ। इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा संस्कृत रही। संस्कृत की इस भाषायी क्षमता को विलियम जोन्स ने यह कहते हुए व्यक्त किया कि संस्कृत भाषा की आश्चर्यजनक संरचना है, जो ग्रीक से अधिक परिपूर्ण है, लेटिन से अधिक विस्तृत है और अधिक परिष्कृत है – “The language of Sanskrit is a wonderful structure, more perfect than Greek, more copious than Latin and more exquisitely refined than either.” भारत में ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली संस्कृत से आई है तथा भारत की सभी भाषाओं का विकास संस्कृत की गोद में हुआ है।

इसी कारण इन भाषाओं के शब्दों व व्याकरण का संस्कृत से गहरा सम्बन्ध है। तमिल के सबसे पुराने व्याकरण तोल-काप्पियम् के टीकाकार शिव-ज्ञान-मुनिवर ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिन्होंने संस्कृत नहीं सीखा उन्हें तमिल की प्रकृति समझ में नहीं आयेगी। संस्कृत इन  विशेषताओं से भारत की  एकता व अखण्डता को सींचती है। अन्य भाषाओं की संरचना से समानता होने के कारण यह संगणक (computer) द्वारा भारतीय भाषाओं के आपसी अनुवाद में मध्यस्थ भाषा (Inter-lingua) के रूप में कार्य करने की क्षमता रखती है। इस विशेषता का उपयोग करते हुए भाषा-अनुवादक सोफ्टवेयर बनाने की दिशा में कार्य किये जा रहे हैं।

सांकेतिक चित्र

इस प्रकार संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं के विकास में योगदान देती है। संस्कृत भाषा में लाखों पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं जिनमें से लगभग 95% पाण्डुलिपियाँ आयुर्वेद, औषधि, योग, शिक्षा, वास्तु, शिल्प, गणित, रसायन इत्यादि विज्ञान व तकनीकी विषयों सम्बन्धी हैं। यह तथ्य उन लोगों की गलत अवधारणाओं का भी उत्तर है जो संस्कृत को मात्र रस्मों व रीति-रिवाजों तक सीमित मानते हैं। अभी योग व आयुर्वेद जैसे कुछ क्षेत्रों में ध्यान दिया गया है जिसके परिणामस्वरूप अनेकों व्यक्तियों को लाभ प्राप्त हुआ है।

विश्व योग दिवस जैसे प्रयासों से वैश्विक स्तर पर भारत की अपनी अलग पहचान बनी है। लेकिन तेजी से बढ़ती वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिये ज्ञान के अनेक क्षेत्रों का दोहन किये जाने की आवश्यकता है। इससे भारत अपने विश्व कल्याण के भाव के आदर्श की ओर तेजी से बढ़ सकेगा। यह विश्व कल्याण का भाव भारत के चिन्तन में प्रकट हुआ। इसे संस्कृत शास्त्रों ने हजारों वर्षों से अभिव्यक्त किया।

भारतीयता व संस्कृत के सम्बन्ध को समझने में देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का 28 नवम्बर 2015  को संसद में दिया गया वह भाषण भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने ‘Idea of India’ को शास्त्रों के ‘सत्यमेव जयते’ (सत्य की ही विजय होती है), अहिंसा परमो धर्मः (अहिंसा परम धर्म है), एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति (सत्य एक है, उसे विद्वान व्यक्ति अलग-अलग तरीके से बताते हैं), सर्वे भवन्तु सुखिनः (सभी सुखी होवें) इत्यादि कई वाक्यों द्वारा बताया।

(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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