कड़े फैसलों से यूपी को पटरी पर लाने की कवायदों में जुटी योगी सरकार

यूपी की नौकरशाही के लिए कठिन इम्तेहान का समय है, क्योंकि सरकार ने अपने दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए हैं। जनता दर्शन के जरिए मुख्यमंत्री हर रोज लोगों से मिलते हैं, जब वो नहीं होते हैं तो किसी न किसी मंत्री के द्वारा इस काम को किया जाता हैं। वक्त की पाबंदी सिर्फ अफसरों तक ही सीमित नहीं है। मंत्री हों, स्कूली टीचर हों या फिर गांवों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डाक्टर, सबके लिए ये नियम बराबर लागू है। इस कड़ाई के सकारात्मक परिणाम सामने भी आने लगे हैं।

यूपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार को करीब चार महीने पूरे हो गए हैं। किसी सरकार की समीक्षा के लिए यूं तो चार महीने का समय पर्याप्त नहीं होता लेकिन इन चार महीनों में ही सरकार ने अपने अंदाज से आगाज का एहसास करा दिया है। ये बता दिया है कि उत्तर प्रदेश में अब वो नहीं चलेगा जो पिछले चौदह पंद्रह सालों से यहां होता आ रहा था।

जाहिर है, डेढ़ दशक का वक्त काफी होता है और डेढ़ दशकों में ना सिर्फ उत्तर प्रदेश की कार्य-संस्कृति बदल गई थी, बल्कि प्रदेश भी विकास की दौड़ में हर रोज पीछे होता चला गया था और इसका नतीजा भुगतना पड़ा था यहां की जनता को। पर सूबे की योगी आदित्यनाथ की सरकार इस व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन करने की तैयारी में है। शुरूआत हुई है, नौकरशाही से और अब जबकि चार महीने बीत चुके हैं, तब सरकार की जद में हैं नौकरशाही से लेकर राजनीति तक के तमाम भ्रष्टाचारी चेहरे।

सरकार संभालते ही मुख्यमंत्री योगी ने ऐलान किया कि अफसरों को वक्त से दफ्तर पहुंचना होगा, लोगों की जनसुनवाई करनी होगी। सिर्फ अफसरों के लिए ही नहीं बल्कि आम जनता के लिए भी ये एक हैरान करने वाला फैसला था। इसलिए क्योंकि चंद ही अफसर ऐसे रहे होंगे जो वक्त से अपने दफ्तर में मिलते थे। पिछले डेढ़ दशक के दौरान अफसरों की लेट-लतीफी एक ढर्रा बन गया था और कोई भी इस ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन, अब नई सरकार इस खराब परंपरा को ख़त्म करने के लिए कमर कस कर जुटी हुई है।

सरकार का ही खौफ है कि ज्यादातर अफसर वक्त से दफ्तरों में बैठने लगे हैं। पर कुछ ऐसे भी हैं जो खुद को बदलने को तैयार नहीं; तो ऐसे अफसरों पर भी सरकार की पूरी नज़र है। हाल ही में दर्जनों अफसरों को सरकार की तरफ से नोटिस मिला है, जिसमें उनसे पूछा गया है कि वक्त पर दफ्तर नहीं पहुंचने के कारण उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों ना की जाए। बात यहीं नहीं खत्म हुई है। मुख्यमंत्री ने खुद तमाम फरियादियों के साथ बैठकर वीडियो कांफ्रेंसिग के जरिए जनसुनवाई की समीक्षा करनी शुरू कर दी है। ये एक अनूठी पहल है और इस वीडियो कांफ्रेंसिग के दौरान एक तरफ मुख्यमंत्री और फरियादी होते हैं तो दूसरी तरफ शिकायतों का निपटारा करने वाले अधिकारी। सीधा जवाब तलब होता है कि शिकायतों का निपटारा क्यों नहीं हुआ।

यूपी की नौकरशाही के लिए कठिन इम्तेहान का समय है, क्योंकि सरकार ने अपने दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए हैं। जनता दर्शन के जरिए मुख्यमंत्री हर रोज लोगों से मिलते हैं, जब वो नहीं होते हैं तो किसी न किसी मंत्री के द्वारा इस काम को किया जाता हैं। वक्त की पाबंदी सिर्फ अफसरों तक ही सीमित नहीं है। मंत्री हों, स्कूली टीचर हों या फिर गांवों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डाक्टर, सबके लिए ये नियम बराबर लागू है। इस कड़ाई के सकारात्मक परिणाम सामने भी आने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

भ्रष्टाचार के खिलाफ भी सरकार ने खुली जंग छेड़ दी है। पालना घोटाला हो या लोकसेवा आयोग और रिवर फ्रंट का घोटाला, सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश करने में देर नहीं लगाई। किसे याद नहीं होगा कि किस तरह यूपी के लोकसेवा आयोग में नौकरियां बेची गईं, मेधावी बच्चों को उनके हक से वंचित किया गया। जो ईमानदार थे, उनको नौकरियां नहीं मिलीं। इसी तरह गरीब मां बाप के लिए आई पालना योजना के पैसे में बंदरबांट की गई और मजदूर परिवारों का हक मारा गया।

गोमती नदी साफ करने की योजना 160 करोड़ से होती हुई 1600 करोड़ तक जा पहुंची, अधिकांश पैसे का भुगतान भी हो गया, लेकिन गोमती की हालत बद से बदतर हो गई। पिछले 15 सालों के दौरान प्रदेश के लोगों ने पहले भी ऐसे घोटाले होते देखे थे, पर एक सरकार में हुई घोटालों की जांच दूसरी सरकार सीबीआई को भेज दे, ऐसा होता हुआ नहीं देखा गया था। योगी सरकार इस परंपरा को तोड़ रही है।

भ्रष्टाचारी अफसर हों या नेता, सरकार हर किसी पर शिकंजा कसने में जुट गई है। हाल ही में सरकार ने एक एआरटीओ को गिरफ्तार कराया तो उसके पास से अरबों की संपत्ति का पता चला। इसी तरह लखनऊ विकास प्राधिकरण के महाभ्रष्ट बाबू को भी दफ्तर से गिरफ्तार करा दिया गया। महज चार महीनों में कई राजपत्रित अफसरों समेत करीब तीन दर्जन घूसखोर गिरफ्तार कर जेल भेजे जा चुके हैं। देश के सबसे बड़े प्रदेश में ये अभी शुरूआत भर है भ्रष्ट और नाकारा हो चुके काकस को तोड़ने की। उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार जिस राह पर है, उससे तंत्र भी सुधरेगा और उत्तर प्रदेश के हालात भी।

(लेखक भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हैं।)

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