बिहार की जनता के लिए जरूरी हो गया था महागठबंधन सरकार का अंत !

लालू प्रसाद यादव से लेकर राहुल गांधी द्वारा नीतीश के इस निर्णय पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। कोई कह रहा कि उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया तो कोई उन्हें धोखेबाज बता रहा, वहीं नीतीश कुमार स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने गठबंधन बचाने की पूरी कोशिश की, मगर अब उनके लिए इसे जारी रखना मुश्किल हो गया था। सही-गलत की इस बहस का फिलहाल कोई लाभ नहीं है, इसका निर्णय समय आने पर जनता ही करेगी। फिलहाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण अगर कुछ है, तो वो है बिहार का विकास और राज्य में सुशासन की स्थापना जिसकी संभावना महागठबंधन के शासन में नहीं दिखाई दे रही थी।

बिहार के महागठबंधन में महीनों से चल रही खींचतान आखिर बीती 26 जुलाई की शाम तब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गयी, जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव के इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद नीतीश ने यह निर्णय लिया। इस्तीफा देकर निकलते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा माहौल में उनके लिए सरकार चलाना संभव नहीं रह गया था, इसलिए आत्मा की आवाज पर उन्होंने इस्तीफे का निर्णय लिया है।

नीतीश के इस्तीफे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विट कर उन्हें भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के लिए बधाई दी। इसके बाद भाजपा की संसदीय दल की बैठक हुई और फिर नीतीश को समर्थन देने की घोषणा की गयी। रात में ही सरकार बनाने का दावा पेश किया गया और सुबह दस बजे नीतीश कुमार ने पुनः मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। साथ ही, सुशील मोदी ने भी उपमुख्यमंत्री पद  की शपथ ग्रहण की। इस प्रकार एकबार फिर बिहार में राजग सरकार स्थापित हो गयी है।

इस्तीफे की अगली सुबह पुनः शपथ ग्रहण करते नीतीश कुमार

लालू प्रसाद यादव से लेकर राहुल गांधी तक सबके द्वारा नीतीश के इस निर्णय पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। कोई कह रहा कि उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया तो कोई उन्हें धोखेबाज बता रहा, वहीं नीतीश कुमार स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने गठबंधन बचाने की पूरी कोशिश की, मगर अब उनके लिए इसे जारी रखना मुश्किल हो गया था। सही-गलत की इस बहस का फिलहाल कोई लाभ नहीं है, इसका निर्णय समय आने पर जनता करेगी। फिलहाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण अगर कुछ है, तो वो है बिहार का विकास और राज्य में सुशासन की स्थापना जिसकी संभावना महागठबंधन के शासन में दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही थी।

बीस महीने के शासन के दौरान राजद और जदयू के बीच विभिन्न मसलों पर स्पष्ट असहमति दिखाई दी थी। बाहुबली शहाबुद्दीन की जमानत पर राजद कार्यकर्ताओं का जश्न हो, शहाबुद्दीन का लालू को अपना नेता बताना हो अथवा प्रदेश में अपराध का तांडव हो, ऐसी तमाम बातें हैं जो इस बेमेल गठबंधन पर आधारित शासन की विफलता को दर्शा रही थीं।

गौर करें तो महागठबंधन को जो जनादेश मिला था, उसमें नीतीश की सुशासन वाली छवि की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, मगर अब नीतीश महागठबंधन सरकार में रहते हुए अपनी उस छवि के अनुरूप काम नहीं कर पा रहे थे। उनकी कोई सुन नहीं रहा था, बावजूद इसके उन्होंने लम्बे समय तक गठबंधन को बचाने का प्रयास किया, मगर धीरे-धीरे पानी सिर से ऊपर हो गया। ऐसे में उन्होंने इस्तीफा देने का एक सही और समयोचित निर्णय लिया।

उपर्युक्त बातों के आधार पर कह सकते हैं कि महागठबंधन की सरकार का अंत बिहार की जनता के लिए सबसे अधिक ज़रूरी हो गया था। अतः नीतीश के इस्तीफे से सर्वाधिक भला बिहार की जनता का होगा और उम्मीद की जाती है कि भाजपा-जदयू के गठबंधन पर आधारित शासन में बिहार फिर से सुशासन की डगर पर बढ़ सकेगा। और, अपने इस समयोचित और साहसिक निर्णय के लिए नीतीश कुमार हमेशा याद किए जाएंगे। विपक्षी चाहें जो कहें, मगर अपनी आत्मा की आवाज पर इस्तीफे का निर्णय लेकर नीतीश ने अपना कद बिहार की जनता की नज़रों में और अधिक ऊँचा कर लिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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