अलगाववादियों पर हो रही कार्रवाई का घाटी में क्या होगा असर ?

अलगाववादी हमेशा से इस देश के विरोध में ही लगे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की पिछली सरकार ने उनपर हाथ तक नहीं डाला। इसमें कोई संशय नही कि पिछली सरकार की अनदेखी ने अलगाववादियों को घाटी में उगने का उपयुक्त वातावरण दिया वरना जैसे ये कार्यवाही आज हो रही है, वैसे ही अगर पहले हुई होती तो आज अलगाववादी कश्मीर में इस कदर अपने पैर नहीं जमा पाए होते। बहरहाल अब इनपर हो रही कार्रवाई का घाटी में काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान से फंडिंग का खुलासा होने के बाद देश में अशांति फ़ैलाने से लेकर कई संगीन अपराधों के लिए अब अलगाववादी नेताओं के कई करीबियों को हिरासत में लिया गया है। देश की सुरक्षा के लिहाज से यह एक बेहद जरूरी कदम था। ईडी ने आतंकी फंडिंग केस में शब्बीर शाह के एक करीबी कथित हवाला डीलर असलम वानी  को श्रीनगर से गिरफ्तार किया। साथ ही शब्बीर शाह को भी जुलाई में ईडी 10 साल पुराने मनी लांड्रिंग केस में गिरफ्तार कर चुकी है। अब अगर इतने बड़े स्तर पर एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं, तो यह मानना गलत नही होगा कि पिछली सरकार इनपर कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी और इनकी हरकतों को नज़रन्दाज किया जा रहा था।

केस की पड़ताल कर रही एनआईए पहले भी कश्मीर से करीब सात अलगाववादी नेताओ को गिरफ्तार कर चुकी है, जिसमें  सैयद अली शाह गिलानी का दामाद भी शामिल है। बानी, जो श्रीनगर से भागने की फ़िराक में था, को ईडी ने मनी-लांड्रिंग केस में गैर-जमानती वारंट पर गिरफ्तार किया है। इसके साथ ही ईडी ने शब्बीर शाह के पाकिस्तान में मौजूद आतंकियों से सम्बन्ध होने को लेकर उसकी रिमांड की अवधी बढ़ाने को  कोर्ट से दरख्वास्त की थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। शब्बीर शाह को 14 दिन की रिमांड पर भेजा जा चुका है।

शब्बीर शाह और हुर्रियत प्रमुख गिलानी

अलगाववादी नेताओ के कई करीबी और कई अलगाववादी नेता खुद भी हिरासत में हैं। इनपर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से लेकर पत्थरबाजों आदि के जरिये कश्मीर घाटी में अशांति फ़ैलाने तथा सीमा पार से इस काम में मदद लेने के गंभीर आरोप हैं। साथ ही, हाफ़िज़ सईद के साथ भी इनके सम्बन्ध होने की बात सामने आई है। सईद को 26/11 मुंबई हमले का मास्टरमाइंड माना जाता है। एनआईए अब तक करीब 13 लोगों के खिलाफ सुबूत जुटा चुकी है, जिन्हें जल्द ही कोर्ट में पेश किया जायेगा।

ज़ाहिर है, अलगाववादियों पर जो आरोप लगे हैं, वो छोटे-मोटे नहीं हैं और सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं, अतः इनपर हो रही कार्रवाई पूरी तरह से उचित है। अलगाववादी हमेशा से इस देश के विरोध में ही लगे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की पिछली सरकार ने उनपर हाथ तक नहीं डाला। इसमें कोई संशय नही कि पिछली सरकार की अनदेखी ने अलगाववादियों को घाटी में उगने का उपयुक्त वातावरण दिया। जैसे अलगाववादियों पर आज कार्रवाई हो रही है, वैसे ही अगर पहले हुई होती तो आज अलगाववादी कश्मीर में इस कदर अपने पैर नहीं जमा पाए होते। सोचने वाली बात यह भी है कि अब जब अलगाववादियों का सच सामने आ चुका है और उनपर कार्रवाई हो रही है, तो किस प्रकार की परिस्थिति बनेगी ? क्या घाटी में पुनः अमन होगा और सीमा पार की घुसपैठ में कमी आएगी ?

दरअसल इस कार्रवाई के कई प्रभाव होंगे। अलगाववादियों और देश-विरोधी गुटों को इससे चेतावनी मिलेगी कि मौजूदा सरकार पिछली सरकार की तरह उन्हें बर्दाश्त नहीं करने वाली। दूसरा, सीमा पार पकिस्तान को भी यह कड़ा सन्देश मिल जाएगा कि भारत अब किसी उसकी तरह की घुसपैठ को कामयाब नहीं होने देगा। 

साथ ही, इस कार्रवाई के जरिये कश्मीर की आवाम के समक्ष अलगाववादियों की हकीकत भी सामने आ सकेगी। घाटी में हिंसा फैला रहे आतंकियों जिनको अलगाववादियों से पूरा सहयोग मिलता था, की हालत भी कमजोर होगी। दूसरी तरफ सेना खोज-खोजकर आतंकियों का सफाया कर ही रही है। इस प्रकार कुल मिलाकर कह सकते हैं कि अलगाववादियों पर इस कार्रवाई से घाटी में आतंक की धमक कमजोर होगी और वहाँ अमन-चैन की संभावना बढ़ेगी।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

 

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