‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की वर्षगाँठ पर भी अपनी नकारात्मक राजनीति से बाज नहीं आया विपक्ष !

कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि क्या मनमोहन सिंह जैसे जनाधारविहीन नेता को प्रधानमंत्री बनाने से जनतंत्र की बुनियाद मजबूत हुई थी। क्या लाखों करोड़ के घोटाले से देश का नुकसान नहीं हुआ था। आज मोदी जब भ्रष्टाचार भारत छोड़ो की बात करते हैं, तो इसका कुछ आधार दिखाई देता है। यह सही है कि इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना है। लेकिन तीन वर्षों में स्थितियां बदली हैं। भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ का विपक्ष ने जैसा राजनीतिक उपयोग किया, वह अत्यंत निंदनीय है। इसमें भी वह मोदी के अंध-विरोध के दायरे से बाहर नहीं निकल सके। विपक्ष भले न समझे, मगर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की वर्षगाँठ का ऐसा इस्तेमाल उसे नुकसान ही पहुंचाएगा।

भारत छोड़ो आंदोलन की पचहत्तरवीं वर्षगांठ देश के लिए अहम है। इस दिन राष्ट्र-हित के विषयों का चयन होना चाहिए था और उनके प्रति संकल्प का भाव व्यक्त होना चाहिए था जिससे खास तौर पर युवा पीढ़ी उन राष्ट्रीय मूल्यों को समझ सके जिनकी स्थापना हमारे स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों ने की थी। लोकसभा और राज्यसभा ने इस संबंध में अलग-अलग संकल्प पारित किए। मगर उसके पहले विपक्षी नेताओं ने राजनीति करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मतलब भारत छोड़ो आंदोलन की यह वर्षगांठ उनके लिए अलग से कोई महत्व नहीं रखती थी। इसका भी उन्होंने सरकार के खिलाफ विरोध के लिए ही इस्तेमाल किया।

संसद के बाहर विरोध की इसी मानसिकता का प्रदर्शन किया गया। बिहार में तेजस्वी यादव, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और अनेक स्थानों पर कांग्रेस ने प्रदर्शन के लिए इस दिन को चुना। कांग्रेस के नेता संसद और सड़क पर ऐसे बोल रहे थे जैसे आजादी में यही अंग्रेजों से मोर्चा लिए हों। तेजस्वी यादव महात्मा गांधी की दुहाई दे रहे थे। वह जनादेश सम्मान यात्रा पर निकले हैं।

अखिलेश यादव (सांकेतिक चित्र)

अखिलेश यादव ने देश बचाओ देश बनाओ का नारा बुलंद किया। मगर यह नहीं बताया कि सपा के शासन में उत्तर प्रदेश को कितना विकसित बनाया गया। क्षेत्रीय दलों की एक सीमा होती है। यह क्यों न माना जाए कि सपा ने जानबूझकर प्रदेश की जगह देश को बचाने की बात कही। प्रदेश बचाने या बनाने की बात करते तो उनके ऊपर ज्यादा सवाल उठते।

तेजस्वी कहते हैं कि जिस समय का भ्रष्टाचार का मामला बताया जा रहा है तब वह बच्चे थे। मान लिया कि उनकी बात ठीक है, लेकिन आज तो वे बड़े हो गए हैं। विधायक हैं, उपमुख्यमंत्री रहे हैं। अब उन्हें संपत्ति का पूरा ज्ञान है। इसका उपयोग भी करते हैं। उन्होंने अपने माता-पिता की गैराज वाली फोटो अवश्य देखी होगी। वह कितनी साधारण स्थिति में थे, इसका भी अनुमान होगा। बच्चे थे तो नहीं समझे, लेकिन अब तो पूछना चाहिए था कि इतनी दौलत, संपत्ति का मालिकाना हक कैसे मिल गया।

जहां तक जनादेश की बात है तो नीतीश कुमार का राजद पर ज्यादा उपकार था। यह नीतीश की साफ छवि का प्रभाव था जिसने राजद को एक बार फिर उभरने का अवसर दिया। तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। अन्यथा राजद धीरे-धीरे बिहार की राजनीति में आप्रासांगिक होती जा रही थी।

ममता बनर्जी (सांकेतिक चित्र)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का अपने प्रदेश से बाहर कोई महत्व नहीं है। मगर, भारत छोड़ो की वर्षगाँठ के दिन उन्होंने भी भाजपा विरोध में रैली निकाली। दरअसल पिछले कुछ वर्षो में पश्चिम बंगाल में भाजपा का जनाधार बढ़ा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को दस प्रतिशत वोट मिले। इससे ममता की नींद उड़ी हुई है। वह भाजपा को हटाने की बात कर रही हैं, जबकि भाजपा की जड़ें अनेक प्रदेशों में लगातार गहरी होती जा रही हैं।

लोकसभा में सोनिया गांधी बोलीं कि उस दौर में ऐसे संगठन थे, जिनका आजादी में कोई योगदान नहीं था। यही बात राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद ने भी कही। इन्हें पता होना चाहिए कि कांग्रेस के प्राय: सभी राष्ट्रीय और प्रांतीय नेता आंदोलन शुरू होने के पहले जेलों में बंद कर दिए गए थे। आंदोलनकारियों में संघ की अहम भूमिका थी। संघ ने आंदोलनकारियों की अपरोक्ष सहायता पहुंचाने का भी कार्य किया था।

सोनिया गांधी सहित कई विपक्षी नेता तीन वर्ष से रटे राग को इस अवसर पर भी ले आए। कहा कि लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। मतलब मतदाता उन्हें विजयी बना दें, तो लोकतंत्र मजबूत हो जाता है; बहुलतावादिता और धर्मनिरपेक्षता आ जाती है। लेकिन अगर मतदाता भाजपा को जिता दें तो यह सब खतरे में आ जाता है। सोनिया यहीं तक नहीं रुकीं। कहा कि अंधकार की शक्तियां तेजी से उभर रही हैं। जनतंत्र की बुनियाद को नष्ट किया जा रहा। जाहिर है, विपक्ष के सबसे बड़े नेता ही इस महत्वपूर्ण दिन की मर्यादा कायम नहीं रख सके।

सोनिया गाँधी (सांकेतिक चित्र)

कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि क्या मनमोहन सिंह जैसे जनाधारविहीन नेता को प्रधानमंत्री बनाने से जनतंत्र की बुनियाद मजबूत हुई थी। क्या लाखों करोड़ के घोटाले से देश का नुकसान नहीं हुआ था। आज मोदी जब भ्रष्टाचार भारत छोड़ो की बात करते हैं, तो इसका कुछ आधार दिखाई देता है। यह सही है कि इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना है। लेकिन तीन वर्षों में स्थितियां बदली हैं। भारत छोड़ो आन्दोलन की वर्षगांठ का विपक्ष ने जैसा राजनीतिक उपयोग किया, वह अत्यंत निंदनीय है। इसमें भी वह मोदी के अंध-विरोध के दायरे से बाहर नहीं निकल सके।

इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर अपने पद की गरिमा का पालन किया। उन्होंने देश के समाचार में मौजूद समस्याओं का उल्लेख किया। यह आह्वान किया कि देश हित में कुछ मुद्दों पर आपसी सहमति बननी चाहिए। भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ को इसी का अवसर मानना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार व गरीबी को भारत से हटाने की बात रखी। चीन और पाकिस्तान की गतिविधियों का उल्लेख किया। इसके विरोध में पूरे देश को एकजुट प्रदर्शित करना आवश्यक है।

विपक्ष इस बात से नाराज था कि मोदी ने जवाहरलाल नेहरू का नाम नहीं लिया। सच्चाई यह है कि मोदी ने स्वतंत्र भारत में कार्य कर चुके किसी भी प्रधानमंत्री का नाम नहीं लिया। इसका मतलब यह नहीं कि किसी का अपमान हुआ। जहां तक नाम की बात है तो सप्रंग के दस वर्षों में कितनी बार अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लिया गया।

कांग्रेस के शासन में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, सुभाष चंद्र बोस का कितनी बार नाम लिया जाता था। बहरहाल, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की वर्षगाँठ जैसे विशेष अवसर पर सकारात्मक सोच के साथ देश को आगे ले जाने की बात होनी चाहिए थी और सरकार ने वही किया भी, मगर विपक्ष अपनी नकारात्मकता राजनीति से बाज नहीं आ सका। इससे उसके प्रति जनता में कोई अच्छा सन्देश नहीं जाएगा।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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