अब चीन के हर ‘पैंतरे’ का माकूल जवाब देने लगा है भारत !

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत चीन से मुकाबला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा। चीन के हर पैंतरे का माकूल जवाब देने के लिए भारत एक नया कदम उठा ले रहा है। ओबोर का विरोध भारत कई बार कर चुका है, क्योंकि उसका एक रास्ता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर जाता है। हालाँकि चीन ने निर्माण पर रोक नहीं लगाई, पर नरेंद्र मोदी का बलोचिस्तान को समर्थन देना और चाबहार पोर्ट की प्रगति भारत का अप्रत्यक्ष जवाब साबित हुआ है।

डोलाम (डोकलाम) को लेकर चीन की बढ़ती आक्रामकता को रोकने में भारत सफल हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय  समुदाय भी इस मामले में भारत के ही साथ खड़ा नज़र आ रहा। भूटान ने भी साफ़ शब्दों में चीन को समझा दिया है कि डोलाम को वो चीन का हिस्सा नहीं मानता है। डोलाम जो कि भूटान और चीन का विवादित क्षेत्र है, कुछ महीनों से तंग माहौल के वजह से चर्चे में है। ये क्षेत्र वर्षों से भूटान और चीन के बीच टकराव का मुद्दा रहा है।

डोलाम त्रि-संगम क्षेत्र है जो कि उत्तर में तिब्बत के चुम्बी घाटी, पूर्व में भूटान की घाटी और पश्चिम में भारत के सिक्किम राज्य से घिरा हुआ है। चीन की मानें तो डोलाम उनका क्षेत्र है, पर भूटान के अनुसार डोलाम उनके सीमा के अंदर आता है। वर्षों से चीन उसी विवादित क्षेत्र से गुज़रती रोड के निर्माण में तत्पर है।  हाल में चीन अपनी ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबोर) पहल को लेकर अत्यधिक अहम कदम उठाने शुरू कर चुका है। इसी सिलसिले में रुके हुए इस निर्माण को पूरा करने की कोशिश कर रहे चीन को जून 2017 में भारत के सामने अपनी गति रोकनी पड़ी।

सांकेतिक चित्र

भूटान के निवेदन पर समझौते के अनुसार भारतीय सेना डोलाम क्षेत्र की रक्षा के लिए वहां डट गई। हालांकि चीन की इस हरक़त से भारत की सीमाएँ भी ख़तरे में आ सकती थीं। भूटान के विदेश मंत्री का कहना है कि चीन के साथ हुई एक संधि के अनुसार शांति बनाए रखने की बात थी जिसका वो सीधा उलंघन कर रहा है। पूर्व सहायक सचिव, कैबिनेट सेक्रेटेरिएट, जयदेव रानाडे के अनुसार चीन द्विपक्षीय और शांतिपूर्ण मसले के हल के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ रहा है, इससे परेशानी बढ़ सकती है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत चीन से मुकाबला करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा। चीन के हर पैंतरे का जवाब  देने के लिए भारत एक नया कदम उठा ले रहा है। ओबोर का विरोध भारत कई बार कर चुका है, क्योंकि उसका एक रास्ता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर जाता है। हालाँकि चीन ने निर्माण पर रोक नहीं लगाई, पर नरेंद्र मोदी का बलोचिस्तान को समर्थन देना और चाबहार पोर्ट की प्रगति भारत का अप्रत्यक्ष जवाब साबित हुआ है।

भारत का हाल ही में सर्जिकल स्ट्राइक करना और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापिस लेने की बात करना चीन को खटक रहा है और भारत की बढ़ती ताकत का संकेत दे रहा है। चीन बौखलाहट में ‘प्रोपोगैंडा विडिओज’ बनाकर जारी कर रहा है, जिसके अनुसार भूटान डोलाम को चीन का हिस्सा मानता है, जबकि भारत  के समर्थन से उत्साहित भूटान की संसद ने चीन को कड़े शब्दों  में कहा कि डोकलाम चीन का हिस्सा नहीं है।

सांकेतिक चित्र

चीन के साथ दिक्कत यह है कि वो शोर कितना भी मचा ले, मगर किसी भी सूरत में युद्ध का शंखनाद नहीं कर सकता।  एक छोटा सा क्षेत्र जो कि ज़्यादातर अगम्य रहता है, उसके लिए चीन अपनी सेना, पूंजी और  भारत से अपने राजनयिक रिश्ते को दाँव पर लगाने का जोखिम नहीं उठा सकता। साथ ही, युद्ध होने की स्थिति में अबकी भारत सामरिक रूप से मजबूत स्थिति में होगा जिससे चीन को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

बावजूद इन सब बातों के अगर वो युद्ध जैसी स्थिति बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, तो सिर्फ भारत पर दबाव बनाने के लिए, मगर इसमें भी उसे कोई कामयाबी मिलती नहीं दिख रही। गौरतलब है कि जुलाई में चीन उत्तराखंड के बाराहोती इलाक़े में घुसकर भारत को धमकी दे रहा था कि भारत क्या कर लेगा, पर इसमें भी नाकाम रहा। जल्द ही उसे पीछे हटना पड़ा।

रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे अरुण जेटली का कड़ा बयान कि “ये 1962 का नहीं, 2017 का भारत है” भारत की मुस्तैदी और मजबूती को ही दर्शाता है। वहीं, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज  ने राजनयिक तरीको से द्विपक्षीय बातचीत द्वारा विवाद सुलझाने का प्रस्ताव रखा। फिर भी  चीन अपना आक्रोश नहीं छोड़ रहा था और दूसरे देशों को उकसाने की कोशिश कर रहा था।  लेकिन विश्व-पटल पर चीन का ‘प्रोपगैंडा’ असफल होता जा रहा है और कहीं से समर्थन नहीं मिल पा रहा। परिणामस्वरूप अब चीन को सूझ नहीं रहा कि वो डोलाम मसले पर क्या रुख अपनाए, लिहाजा दबे-दबे सुरों में वो पीछे हटने के संकेत दे रहा है। कहना न होगा कि इसके पीछे भारत सरकार की कूटनीतिक सूझबूझ और भारतीय सेना के अडिग साहस का ही प्रभाव है।

(लेखिका डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में इंटर्न हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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