डोकलाम में भारत ने कायदे से चीन को उसकी औकात दिखा दी है !

ताजा डोकलाम विवाद के दौरान भारत सरकार का रुख साफ था कि भारत चीन के दबाव में नहीं आएगा। हां, आपसी सहयोग और सीमा पर जारी तनाव को दूर करने के लिए भारत तैयार था। आखिरकार चीन को अपनी हठ छोड़कर पीछे हटना पड़ा। निश्चित ही ये न सिर्फ चीन पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है, वरन इसने चीन के संदर्भ में भारत को मनोवैज्ञानिक रूप से भी मजबूती प्रदान की है।

भारत ने इस बार कायदे से चीन को समझा दिया कि हमें 1962 वाला कमजोर और निरीह देश मत समझना। अगर जंग की तो इतनी मार खाओगे कि पानी नहीं मिलेगा। भारत के आत्मविश्वास के आगे धूर्त चीन पस्त हो गया। उसने अपने कदम वापस खींच कर समझदारी दिखाई। दोनों पड़ोसियों के ताजा विवाद ने कुछ बिन्दुओं को साफ कर दिया। जैसे कि चीन घनघोर विस्तारवादी देश है। विश्व समुदाय को चीन की इस हरकत का नोटिस लेना होगा।

दूसरी बात यह कि चीन के बारे में संसार को मालूम चल गया है कि एशिया में भी वो अजेय नहीं है। उससे लोहा लेने के लिए कम से कम भारत तो तैयार है। ये पं नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल का भारत नहीं है। नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में चीन ने भारत को युद्ध में भारी क्षति पहुंचाई थी। भारत के बड़े भू-भाग को कब्जा लिया था। और इस सबके बीच नेहरू तीसरी दुनिया के नेता बनने में व्यस्त थे। इसबार अच्छे से चीन के अड़ियल रवैये और बेबात के गुरूर पर चोट पड़ी है।

भारत ने चीन को कायदे से उसकी औकात बता दी

ताजा डोकलाम विवाद के दौरान भारत सरकार का रुख साफ था कि वो चीन के दबाव में नहीं आएगा। हां, आपसी सहयोग और सीमा पर जारी तनाव को दूर करने के लिए भारत तैयार था। आखिरकार चीन को अपनी हठ छोड़कर पीछे हटना पड़ा। निश्चित ही ये न सिर्फ चीन पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है, वरन इसने चीन के संदर्भ में भारत को मनोविज्ञानिक रूप से भी मजबूती प्रदान की है।

अब डोकलाम पर विवाद ठंडा पड़ गया है। 1962 के युद्ध की कड़वी यादें अब भी भारतीय जनमानस के जेहन में थीं कि चीन फिर से हमारे से पंगा ले रहा था। कुछ समय पहले तक लग रहा था कि भारत और चीन ने एक राष्ट्र के रूप में और द्विपक्षीय रिश्ते में लम्बी दूरी तय की है। लेकिन इस प्रकरण से उस सोच को धक्का लगा है। साथ ही, लगता है कि चीनी नेतृत्व को अपने देश की निजी कंपनियों के हितों की कोई परवाह नहीं है।

दरअसल साल 2014 में जब चीन के राष्ट्रपति  भारत आए थे, तो उनके साथ उनके देश की करीब 80 शिखर कंपनियों के प्रतिनिधि भी आए थे, जिनमें विमानन से लेकर मत्स्यपालन क्षेत्र की कंपनियों के सीईओ थे। चीनी नेता की टोली में एयर चाइना, जेडटीई, हुआवेई टेक्नोलॉजी, शांगहाई इलेक्ट्रिक कॉरपोरेशन, चाइना डेवलपमेंट बैंक आदि के प्रतिनिधि शामिल थे। यानी चीन का प्राइवेट सेक्टर भारत से संबंध सुधारना चाहता है व्यापारिक संबंधों को गति देकर। पर वहां की सरकार विस्तारवादी नीति पर ही चल रही है।

भारत-चीन सीमा पर जो कुछ हुआ, उस पृष्ठभूमि में ब्रिक्स को बहस में लाना अति आवश्यक है। ब्रिक्स पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत-चीन दोनों हैं। इनके अलावा ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका भी हैं। माना जाता है कि ब्रिक्स देशों में विश्व भर की 43 फीसद आबादी रहती है, जहां विश्व का सकल घरेलू उत्पाद 30 फीसद है और विश्व व्यापार में इसकी 17 फीसद हिस्सेदारी है।

सांकेतिक चित्र

ब्रिक्स देश वित्त, व्यापार, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कृषि, संचार, श्रम आदि  मसलों पर परस्पर सहयोग का वादा करते  हैं। यहां तक तो सब ठीक है। अब जब ब्रिक्स देशों का एक सदस्य कतई गुंडे के अंदाज में साथी ब्रिक्स समूह के देश ( भारत) को ललकार रहा है, तो बाकी ब्रिक्स राष्ट्र चुप्पी क्यों साध गए हैं ? ब्राजील,रूस और दक्षिण अफ्रीका खुलकर क्यों नहीं उसकी गुंडई पर बोले ? सबको मालूम है कि वस्तुस्थिति क्या है ? इसके बावजूद  ब्रिक्स देश जुबान खोलने को तैयार नहीं हैं। यह एक चिंतनीय प्रश्न है।

वैसे, अब भारत चीन को उसकी औकात कायदे से समझाने लगा है। चीन, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन उसके साथ भारत का 29 अरब डॉलर का विशाल व्यापार घाटा भी है। इसे कम करने के लिए सरकार की तरफ से प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार प्रत्यक्ष रूप से भले न कहे, मगर कई प्रकार के व्यापारिक करों में वृद्धि के माध्यम से चीनी आयात में कमी लाने की कोशिश की जा रही है। भारत जिस भी चीज का निर्यात कर सकता है, उसको उसे अपने लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद जगह पर अच्छी से अच्छी कीमत लेकर बेचना चाहिए।

साथ ही, उसे अपनी जरूरत की चीजें ऐसी हर संभव जगह से मंगानी चाहिए, जहां वे कम से कम कीमत पर उपलब्ध हों। तात्पर्य यह कि भारत को अपेक्षाकृत कम होड़ वाले देशों से व्यापारिक मुनाफे की स्थिति में रहना चाहिए जबकि अधिक होड़ वाले देशों के साथ व्यापार घाटे को कम करना चाहिए। वैसे अबकी चीन को भी पता चल गया होगा कि भारत उसकी गीदड़ भभकियों से घबड़ाने वाला नहीं है। अगर उसने भारत की तरफ आँखे तरेरीं तो उसे माकूल जवाब मिलेगा।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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