अपने लक्ष्यों की तरफ अग्रसर है नोटबंदी, विफलता की बातें हैं भ्रामक

नोटबंदी की विफलता की जो भी बातें की जा रही हैं, वो भ्रामक प्रचार पर आधारित हैं, उनमे सत्यता न के बराबर है। अपने निकटवर्ती लक्ष्यों को प्राप्त करने की दृष्टि से नोटबंदी अब तक एक सफल निर्णय साबित हुआ है और आगे भी उम्मीद की जा सकती है कि ये अपने दूरगामी लक्ष्यों को प्राप्त कर पूर्ण रूप से सफल सिद्ध होगी।

पिछले साल की गई नोटबंदी के सकारात्‍मक परिणाम अब सामने आने लगे हैं। रिजर्व बैंक ने इसी सप्‍ताह एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि जब नोटबंदी की गई थी तो जिन पांच सौ व हजार रूपये के नोटों को बंद किया गया था, उनका मूल्‍य 15.28 लाख करोड़ रुपए था। इस राशि का करीब 99 प्रतिशत हिस्‍सा बैंकिंग सिस्‍टम में वापस आ चुका है। इन पुराने नोटों में से महज 16 हजार नोट ही आना शेष हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा की थी। उसके बाद से देश भर में बहस का दौर शुरू हो गया था।

यही कारण है कि जब आरबीआई ने नोटबंदी पर अपनी रिपोर्ट जारी की तो स्‍वयं वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि नोटबंदी का ध्‍येय कालेधन और भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगाना तो था ही, साथ ही इसके दीगर परिणाम भी सामने आए। जैसे, आतंकवाद के लिए होने वाली फंडिंग पर प्रभाव पड़ा। देश में विपक्षी भले ही नोटबंदी की आलोचना करें लेकिन तथ्‍य यही है कि नोटबंदी के बाद से देश में एक नए आर्थिक युग का आगाज़ हुआ है।

सांकेतिक चित्र

नकदी रहित अर्थव्यवस्था

निश्चित ही यह सरकार का एक निर्णायक कदम था। वास्ता में, नोटबंदी एक एकाधिक लक्ष्यों पर आधारित योजना थी, जिसने अपने कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया है तो कुछ को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। सबसे पहली बात तो यह है कि नोटबंदी के बाद से देश में करदाताओं से वसूल होने वाले टैक्‍स में बढ़ोतरी हुई है। देश में नकदी में कमी आई है। नकदी के रूप में जो पैसा बैंकिंग प्रणाली से बाहर था, अब वो उसका हिस्सा बन चुका है। यही पैसा देश में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर रहा था, जिसपर अब चोट पड़ी है। अब धीरे देश की अर्थव्यवस्था नकदी रहित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ने लगी है। जो उतार-चढ़ाव हैं, वे अस्थायी हैं जबकि दूरगामी रूप से नोटबंदी से अर्थव्यवस्था का भारी हित सुनिश्चित है।     

डिजिटलीकरण

इस निर्णय के जरिये डिजिटलीकरण को भी मुख्‍य रूप से बढ़ावा दिया जाना था। आज देश में डिजिटल क्रांति का सूत्रपात हो चुका है। आम आदमी अब स्‍वयं तकनीकी ज्ञान से लैस होकर यथासंभव खुद ही डिजिटल भुगतान कर रहा है। देश के युवा चूंकि तकनीक के जानकार हैं, इसलिए अधिक से अधिक मोबाइल वॉलेट, ऑनलाइन पेमेंट आदि कर रहे हैं, जिसके लिए वे विभिन्‍न मोबाइल ऐप की मदद ले रहे हैं।

एक छोटे से उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है कि नोटबंदी के पहले किसी कस्‍बे के ग्राहक को घर के टेलीविजन या मोबाइल के रिचार्ज के लिए किसी दुकान पर जाना होता था और वहां उसे नकद भुगतान करना होता था। नोटबंदी के बाद डिजिटल पेमेंट को प्रोत्‍साहित किया गया जिसके चलते विभिन्‍न कंपनियों ने ग्राहकों को अच्‍छे ऑफर देना शुरू किये।

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इसके चलते अब यही ग्राहक घर बैठे, किसी भी समय स्‍वयं के मोबाइल से स्‍वयं ही विभिन्न रिचार्ज अपने मोबाइल वॉलेट से कर लेता है, जिसमें बिजली का बिल, डिश टीवी रिचार्ज, मोबाइल बैलेंस, फंड ट्रांसफर, फिल्‍म टिकट बुकिंग, गैस सिलेंडर भुगतान, लैंडलाइन बिल भुगतान आदि मुख्‍य रूप से शामिल हैं। ऐसा करने पर उसे दो मोर्चों पर राहत मिली है। पहला, उसे अब बाहर भटकने से निजात मिली और वह घर बैठे ये काम कर लेता है। दूसरा, कैशलेस पेमेंट के समय कंपनियों से मिलने वाले विभिन्‍न कैशबैक के चलते उसे तय राशि से कम राशि चुकाना होती है, जिससे वह अपना डिजिटल वॉलेट बढ़ा सकता है।

पेट्रोल पंप पर पेट्रोल लेने जैसे महत्‍वपूर्ण कार्य में डिजिटल भुगतान एक वरदान बनकर सामने आया है, क्‍योंकि कई बार ग्राहक के पास नकदी नहीं होती तो कई बार पेट्रोल पंप कर्मचारी राउंड फिगर में पेट्रोल डालते हैं। डिजिटल भुगतान की सुविधा के कारण वह बिना एटीएम गए कार्ड से ही भुगतान कर सकता है और जितनी राशि का पेट्रोल लिया उतनी ही राशि का भुगतान संभव है, इसमें राउंड फिगर की प्रतिबद्धता नहीं है। यानी अब ग्राहक के पास एटीएम के पास जाने का भी समय बचने लगा है। ऐसा नहीं है कि नकद भुगतान बंद हो गया है या इसकी अहमियत नहीं है, लेकिन अब छोटी-मोटी जरूरतों के लिए नगद भुगतान के झंझट से मुक्ति मिलना इस देश के ग्राहक वर्ग के लिए बड़ी राहत बनकर उभरा है।

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कर-संग्रह में वृद्धि

आम जनता के दायरे में नोटबंदी कारगर साबित हुई है। दूसरी तरफ, एक वृहद पैमाने पर भी व्‍यापक रूप से इसकी सार्थकता साबित हुई है। आयकर के क्षेत्र में यह एक अहम निर्णय रहा है। आयकर विभाग ने जानकारी देते हुए बताया है कि नोटबंदी के बाद से पहले की अपेक्षा अधिक कर की राशि प्राप्‍त हुई है।

इसके अलावा करीब 9.72 लाख लोगों ने नोटबंदी के बाद बैंक अकाउंट्स में भारी भरकम राशि जमा की है। यदि आंकड़ों पर गौर करें तो नोटबंदी के बाद देश के 13.33 लाख बैंक खातों में 2.89 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि जमा की गई है। इनमे से जो भी लोग संदिग्ध लगे उनपर विभाग की नजर है। इसके अलावा 1 करोड़ रुपए से अधिक राशि (प्रत्येक) की 14,000 संपत्तियां आयकर विभाग की जांच के दायरे में हैं, क्योंकि इनके मालिकों ने आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया है।

ह जानकारी आरबीआई की सालाना रिपोर्ट जारी होने के ठीक एक दिन बाद सामने आई है। जाली नोटों पर भी लगाम लगाने में नोटबंदी के जरिये सरकार एक सीमा तक सफल रही है। इन सब बातों को देखते हुए कहा जा सकता है कि नोटबंदी की विफलता की जो भी बातें की जा रही हैं, वो भ्रामक प्रचार पर आधारित हैं, उनमे सत्यता न के बराबर है। अपने निकटवर्ती लक्ष्यों को प्राप्त करने की दृष्टि से नोटबंदी अब तक एक सफल निर्णय साबित हुआ है और आगे भी उम्मीद की जा सकती है कि ये अपने दूरगामी लक्ष्यों को प्राप्त कर पूर्ण रूप से सफल सिद्ध होगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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