मोदी सरकार की सफल विदेशनीति का उदाहरण है डोकलाम से चीन का पलायन

डोकलाम में भारत की जीत मोदी सरकार की विदेशनीति और कूटनीति की सफलता का ही एक और उदाहरण है, जिसके तहत भारत शांति  की बात तो कर ही  रहा था साथ ही सेना को पीछे हटने से भी रोक रहा था। चीन समझ चुका था कि भारत पीछे नहीं हटेगा और न ही उसे सड़क निर्माण करने देगा, लिहाज़ा चीन को ब्रिक्स समिट और चुनाव को ध्यान में रखते हुए जल्दी ही भारत की मांगों के आगे झुकना पड़ा।

आखिरकार भारत और चीन के बीच डोकलाम से सेना पीछे करने पर सहमति बन गयी।   भारत ने बातचीत के जरिये डोकलाम मुद्दे को सुलझाने का प्रस्ताव रखा था, जबकि चीन इसके लिए तैयार नहीं था।  भारत ने भी अपनी सेना पीछे हटाने से साफ़ इन्कार कर दिया था।  चीन को भारत की सेना और सरकार के निश्चय के आगे आख़िरकार झुकना ही पड़ा।  

क़रीब दस हफ्तों से बातचीत द्वारा डोकलाम मुद्दे को सुलझाने की कोशिश हो रही थी।  जहाँ भारत सेना पीछे करने की बात कह रहा था, वहीँ चीन ज़िद पर अड़ा कड़े बयान जारी करने में लगा था। सोमवार के दिन भारत की सेना जैसे-जैसे पीछे हट रही थी, चीन भी अपने निर्माण का सामान पीछे करता जा रहा था। बता दें कि 16 जून से सेनाओं का ये टकराव जारी था, जब दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटने से इनकार कर चुकी थी।  

सांकेतिक चित्र

दरअसल यह बातचीत काफी दिनों से चल रही थी। पहली बातचीत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने चीन जाकर की थी, फिर विदेश सचिव एस. जयशंकर ने राजनयिक वार्ता का नेतृत्व किया। इसमें विजय गोखले जो कि भारत से चीन के लिए राजदूत हैं. उनका एक बड़ा योगदान है, उन्होंने पिछले दो महीनों से तत्परता और धीरज के साथ मामले को सुलझाने का अथक प्रयास किया ताकि दोनों देशों की सहमति से शांतिपूर्वक ये मुद्दा सुलझ जाए। परिणामस्वरूप जो चीन कई सालों से जो सड़क निर्माण करना चाह रहा था विवादित डोकलाम क्षेत्र में, अब उसे वह निर्माण-कार्य रोकना पड़ गया है। चीन ने समझौते में सड़क निर्माण रोकने की बात मान ली है।  भारत के लिए ये एक बड़ी जीत है। 

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 2012 की बात का ज़िक्र करते हुए कहा कि त्रि-संगम क्षेत्र पर बातचीत द्वारा फैसला लेने बात की गई थी, जबकि आजतक उसपर कोई चर्चा नहीं की गयी है और जबतक तीनों देशों की सहमति से कोई फैसला नहीं हो जाता, कोई भी देश अकेला इसे अपना क्षेत्र नहीं कह सकता है। चीन के कड़े और भड़कीले बयान से समझौते पर असर पड़ रहा था, इसपर भारत का कहना था कि चीन राजनयिक रिश्तों को क्षति पंहुचा रहा  है, अतः उसे शांति का सन्देश देना चाहिए।  

भारत अब और सतर्क हो चुका है। सड़क निर्माण बंद होने से भारत की मांग तो पूरी हो चुकी है, पर चीन की पहरेदारी से सतर्कता बरतना बेहद आवश्यक है। चीन ने अपने अखबार में गलत ख़बर छापकर, कि भारत पीछे हट चुका है और सड़क निर्माण जारी रहेगा,  भारत को उकसाने की कोशिश की थी, पर भारत और विदेशी अख़बारों जैसे वाशिंगटन पोस्ट, अल जज़ीरा, में सही ख़बर छपने के बाद चीन को इसे स्वीकारना पड़ा। भूटान ने मामले को और न भड़काने की कोशिश में चुप रहना ठीक समझा।

मोदी सरकार की विदेशनीति और कूटनीति की सफलता का ये एक और उदाहरण है, जिसके तहत भारत शांति  की बात तो कर ही  रहा था साथ ही सेना को पीछे हटने से भी रोक रहा था। चीन समझ चूका था कि भारत पीछे नहीं हटेगा और न ही उसे सड़क निर्माण करने देगा, लिहाज़ा चीन को ब्रिक्स समिट और चुनाव को ध्यान में रखते हुए जल्दी ही भारत की मांगों के आगे झुकना पड़ा।

(लेखिका डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में इंटर्न हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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