गौरी लंकेश की हत्या पर बोलने वाले बुद्धिजीवी केरल की वामपंथी हिंसा पर मुंह में दही क्यों जमा लेते हैं?

यह गजब संयोग है कि केरल में पहली राजनीतिक हत्या 28 अप्रैल, 1969 को संघ कार्यकर्ता वी. रामकृष्ण की हुई थी। इस हत्या के आरोपी पिनराई विजयन वर्तमान में केरल के मुख्यमंत्री हैं और एक अन्य आरोपी के.बालकृष्णन वर्तमान में माकपा की राज्य इकाई के सचिव हैं। ऐसे में यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि जिस राज्य के मुख्यमंत्री व सत्तारूढ दल के प्रमुख पदाधिकारी हत्यारोपी हों, उस प्रदेश में राजनीतिक हिंसा पर लगाम कैसे लग सकती है? यह तथ्य भी आश्चर्यजनक है कि अब तक सर्वाधिक हत्याएं केरल के कन्नूर जिले में हुई हैं। यह जिला राज्य के मुख्यमंत्री विजयन का गृह जिला है। मुख्यमंत्री के गृह जिले में बड़े पैमाने पर हो रही इन नृशंस हत्याओं के लिए कौन जिम्मेदार है?

300 से अधिक राजनीतिक हत्याएं और हजारों लोग हिंसा के शिकार। चौंकाने वाला आंकड़ा है। मगर, यह आंकड़ा न तो कुख्यात आतंकवादी संगठन आइएस प्रभावित इराक या सीरिया का है और ना ही तालिबान प्रभावित किसी देश का है। यह आंकड़ा उस देश का है, जहाँ एक वामपंथी और घोषित रूप से हिंदुत्व विरोधी पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या पर ऐसा बवाल मचाया जाता है कि मानों देश में सब कुछ असुरक्षित है। वहीं दूसरी तरफ, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) शासित राज्य केरल में इतनी बड़ी व भयावह राजनीतिक हत्याओं पर चुप्पी साध ली जाती है। हत्या को किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। मगर, क्या हत्याओं के विरोध को लेकर दोमुंहापन रखना उचित है?

देश में असहिष्णुता का राग अलापने वाले बुद्धिजीवियों, वामपंथियों व हिन्दू विरोधी मीडिया ने गौरी लंकेश की हत्या पर जिस प्रकार से हो-हल्ला मचाया उससे यह स्पष्ट हुआ कि हत्या व हिंसा पर उनकी सोच मृतक की पृष्ठभूमि देखकर तय होती है। राष्ट्रवादी ताकतों को गौरी लंकेश की हत्या के लिए अनर्गल ढंग से आरोपित करने का दुष्प्रयास भी किया गया। यह संयोग है कि जिस कर्नाटक में गौरी की हत्या हुई, वहां कांग्रेस की सरकार थी। अन्यथा वामपंथ प्रेरित बुद्धिजीवी व मीडिया भाजपा व राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को पूरी तरह से गौरी की हत्या का दोषी ठहरा ही चुके होते।

गौरी की हत्या प्रकरण को कुछ ही क्षणों में पूरे देश का मुद्दा बना देने वाली इस जमात को केरल में वामपंथियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में की जा रही संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं क्यों नहीं दिखती हैं? अवार्ड वापसी गैंग इन राजनीतिक हत्याओं पर क्यों मौन है? असहिष्णुता के नाम पर तिल का ताड़ बनाने वाले वे तमाम बुद्धिजीवी केरल में व्याप्त तालीबानी हिंसा पर मुंह में दही क्यों जमा लेते हैं?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व लोकतंत्र की दुहाई देने वाले पत्रकार व मीडिया हाउस ऐसी रक्तरंजित राजनीति पर क्यों नहीं लेख लिखते हैं और टी.वी. चैनलों पर बहस क्यों नहीं दिखाते? एक हत्या पर इतना बवाल काटने वालों ने पिछले 13 महीनों में 14 संघ कार्यकर्ताओं की हत्या पर सांत्वना के लिए ही सही, एक शब्द क्यों नहीं बोला?

दरअसल, इन सवालों का जवाब खोजने से पहले कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। दोमुंहेपन की प्रवृत्ति के पीछे दोष वामपंथी विचारधारा व प्रवृत्ति का है। वामपंथी विचार थोपने के लिए अन्य विचार के लोगों की हत्याएं करनेमें कम्युनिस्ट कुख्यात हैं। वामपंथी विचार के मूल में तानाशाही व हिंसा है। विश्वपटल पर ही देख लीजिए। रूस से लेकर चीन, कोरिया व क्यूबा तक वामपंथ का रक्तरंजित इतिहास रहा है। जो विचारधारा मानती हो कि सत्ता बंदूक की नोक से मिलती है, उससे उनकी मंशा समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। अपनी विचारधारा को थोपने और दूसरी को नेस्तानाबूद करने के लिए वामपंथी किसी भी हद तक जा सकते हैं।

वामपंथियों में अपने वैचारिक प्रतिद्वंदियों के प्रति नफरत व हिंसा का भाव किस कदर भरा होता है, इसको केरल में हुई हत्याओं के तौर-तरीकों से समझा जा सकता है। अपने राजनीतिक विरोधियों को तड़पा-तड़पा कर मारना, उनके टुकडे़-टुकड़े करना, अंग-भंग कर देना उनकी घृणित कार्रवाई का हिस्सा है। वामपंथियों की इस क्रूर हत्या शैली को देख कर कुख्यात आतंकी संगठन आइएसआइएस के लड़ाके चुल्लू भर पानी में डूब मर जाएंगे। ताज़ातरीन उदाहरण विगत 29 जुलाई को मारे गए संघ कार्यकर्ता ई. राजेश का है। राजेश के शरीर पर चाकू के 89 घाव पाये गए और उनका बाॅया हाथ काट दिया गया।

केरल में कम्यूनिस्टों की राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना है। वर्ष 1942 में वामपंथियों ने संघ के द्वितीय सर संघचालक माधवराव सदाशिवराव ‘श्री गुरूजी’ के केरल प्रवास के दौरान गड़बडी फैलाने का प्रयास किया था। वामपंथियों का अपने वैचारिक प्रतिद्वंदियों के प्रति यह रवैया तब से आज तक लगातार बना रहा।

यह गजब संयोग है कि केरल में पहली राजनीतिक हत्या 28 अप्रैल, 1969 को संघ कार्यकर्ता वी. रामकृष्ण की हुई थी। इस हत्या के आरोपी पिनराई विजयन वर्तमान में केरल के मुख्यमंत्री हैं और एक अन्य आरोपी के.बालकृष्णन वर्तमान में माकपा की राज्य इकाई के सचिव हैं। ऐसे में यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि जिस राज्य के मुख्यमंत्री व सत्तारूढ दल के प्रमुख पदाधिकारी हत्यारोपी हों, उस प्रदेश में राजनीतिक हिंसा पर लगाम कैसे लग सकती है? यह तथ्य भी आश्चर्यजनक है कि अब तक सर्वाधिक हत्याएं केरल के कन्नूर जिले में हुई हैं। यह जिला राज्य के मुख्यमंत्री विजयन का गृह जिला है। मुख्यमंत्री के गृह जिले में बड़े पैमाने पर हो रही इन नृशंस हत्याओं के लिए कौन जिम्मेदार है?

यह सर्वविदित है कि पश्चिम बंगाल छिनने के बाद वामपंथियों में अपना गढ़ व अस्तित्व बचाने की चुनौती है। केरल में माकपा के गढ़ में संघ व भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण वामपंथियों में असुरक्षा का भाव घर कर गया है। जहाँ एकतरफ आज केरल में संघ की शाखाओं का व्यापक विस्तार हुआ है, वहीं दूसरी ओर भाजपा ने अपनी स्थिति को बेहतर किया है। यह बात वामपंथी ब्रिगेड को पच नहीं रही।

विगत विधानसभा चुनाव में भाजपा केरल में अपना खाता खोलने में सफल हुई है। पार्टी का एक विधायक केरल विधानसभा में पहुँचा है। इस कारण वामपंथियों की बैचेनी और बड़ गयी है। नतीजतन हिंसा की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। मगर, इस हिंसा पर सब मौन हैं। हमारे देश के ही अधिकांश लोग इन हत्याओं से अनजान हैं, क्योंकि ये घटनाएं कभी मुख्यधारा के मीडिया की सुर्खियां नहीं बनती हैं । शायद यही कारण रहा कि केरल में व्यापक राजनीतिक हिंसा पर देशवासियों व मीडिया का ध्यान खींचने के लिए विगत दिनों संघ के सह सर कार्यवाह दतात्रेय हौसबोले को बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करनी पड़ी।

उन्होंने केरल के लाल गलियारे में रक्तपात की भयावह तस्वीर देश के सामने रखी। केरल की विभिषिका का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भयाक्रांत जनता और संघ व भाजपा कायकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए केंद्रीय वित मंत्री अरूण जेटली को पिछले माह वहां का दौरा करना पड़ा। जेटली ने संघ कार्यकर्ता ई.राजेश के परिजनों से मुलाकात की और उनकी शोकसभा में शामिल हुए।

जेटली ने केरल की हिंसा को लेकर जो टिप्पणी की उससे स्थिति की गंभीरता का पता चलता है। उन्होंने कहा कि ऐसी क्रूर हत्याओं को देखकर आंतकवादी भी शर्मसार हो जाएंगे। उन्होंने यहाॅ तक कहा कि एक दुश्मन देश भी ऐसा बर्ताव नहीं करता, जैसा एक राजनीतिक दल केरल में कर रहा है। जेटली ने केरल मामले में उन लोगों की चुप्पी पर सवाल उठाए, जो ऐसे मामलों में हल्ला मचाते हैं।

केंद्रीय मंत्री की यह प्रतिक्रिया भी अहम है, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर किसी भाजपा शासित राज्य में ऐसा होता तो हंगामा मच जाता। बहरहाल, कम्युनिस्टों की रक्तरंजित राजनीति के बावजूद केरल में राष्ट्रवादी शक्तियों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। मगर, कम्युनिस्टों को यह समझ लेना चाहिए कि हिंसा के बल पर ज्यादा समय तक सत्ता में नहीं बना रहा जा सकता। जनता अब उनकी असलियत समझ गई है।

(लेखक उत्तराखंड भाजपा के मीडिया संपर्क विभाग के प्रमुख व स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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