भारत-जापान के बीच बढ़ रही नजदीकी से परेशान चीन

जापान के प्रधानमंत्री शिजो आबे की ताजा भारत यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है। जापान, भारत के बुलेट ट्रेन एवं महत्वपूर्ण शहरों के बीच हाई स्पीड लिंक बनाने के सपने को हकीकत में बदलने में मदद देने के लिये तैयार है। देश की पहली मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की तो आधारशिला भी शिंजो आबे की इस यात्रा के दौरान रख दी गयी। इसके लिये 1.10 लाख करोड़ रूपये की लागत से मुंबई एवं अहमदाबाद के बीच हाई स्पीड रेल लिंक बनाया जायेगा।

भारत और जापान के सम्बन्ध शुरू से अच्छे रहे हैं। जापान में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव होने के कारण दोनों देशों के बीच संबंधों में और भी प्रगाढ़ता आई है। भारत की आजादी के लिये किये जा रहे संघर्ष में भी जापान की शाही सेना ने सुभाष चंद्र बोस की मदद की थी। आजादी मिलने के बाद से दोनों देशों के बीच सौहाद्र्पूर्ण संबंध रहे हैं, जबकि भारत और जापान दोनों देशों के चीन के साथ कमोबेश तल्खी वाले रिश्ते रहे हैं। इस नजरिये से एशिया में शक्ति संतुलन को बराबर बनाये रखने के लिये दोनों देशों के बीच मधुर संबंध का होना जरूरी है। अब भारत-जापान के इन अच्छे संबंधों में मोदी सरकार के आने के बाद से एक नयी ताजगी का संचार हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर सबसे पहले जापान की यात्रा वर्ष 2014 के अगस्त एवं सितंबर महीने में की। उक्त यात्रा में कई महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे रक्षा, सूचना एवं प्रौद्योगिकी, असैन्य परमाणु ऊर्जा, द्विपक्षीय व्यापार आदि पर एक-दूसरे को सहयोग देने पर सहमति बनी थी। पुनश्च: वर्ष 2016 में फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की यात्रा की, जिसमें दोनों देशों के बीच नाभिकीय ऊर्जा पर करार किया गया। वर्तमान में जापान की कई कंपनियां भारत में उत्पादन कर रही हैं। सोनी, टोयटा, होंडा, सुजुकी आदि का नाम इस संबंध में प्रमुखता से लिया जा सकता है। दिल्ली मेट्रो की संकल्पना को साकार करने में भी जापान ने तकनीकी एवं आर्थिक दोनों क्षेत्रों में भारत की मदद की थी।  

अहमदाबाद में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे द्वारा बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला रखी गयी

शिंजो आबे की भारत यात्रा

जापान के प्रधानमंत्री शिजो आबे की ताजा भारत यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है। जापान, भारत के बुलेट ट्रेन एवं महत्वपूर्ण शहरों के बीच हाई स्पीड लिंक बनाने के सपने को हकीकत में बदलने में मदद देने के लिये तैयार है। देश की पहली मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की तो आधारशिला भी शिंजो आबे की इस यात्रा के दौरान रख दी गयी। इसके लिये 1.10 लाख करोड़ रूपये की लागत से मुंबई एवं अहमदाबाद के बीच हाई स्पीड रेल लिंक बनाया जायेगा। अहमदाबाद से 170 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित हंसलपुर में भी 3,000 करोड़ रूपये की लागत से सुजुकी कार निर्माण कारख़ाना खोलने वाली है। अब तक जापान गुजरात में 1 बिलियन यूएस डॉलर का निवेश कर चुका है, जिसके वर्ष 2020 तक 3 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है।

जापान, दक्षिणी चीन सागर के मुद्दे पर भारत के विचारों का समर्थन करता है। गौरतलब है कि दक्षिणी चीन सागर पर चीन अपना अधिपत्य समझता है। इस आधिपत्य को खत्म करने के लिये जापान और अमेरिका चीन की नीतियों के विरोधी देशों के साथ निकट संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे, जापान के साथ हाथ मिलाने के भारत के अपने फायदे हैं।

भारत-जापान की बढ़ती नजदीकी से बौखलाया चीन

दक्षिण चीन सागर भारत के लिये इसलिए भी अहम है, क्योंकि भारत के जहाज वहाँ से होकर गुजरते हैं। भारत मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम आदि देशों को विविध उत्पादों का निर्यात करता है। इस मुद्दे पर जापान का समर्थन हासिल होने से भारत को कारोबार करने में आसानी होगी। मौजूदा समय में जापान के साथ कारोबार करना इसलिए भी मुफीद है, क्योंकि जापान की मुद्रा येन की कीमत में किये जा रहे अवमूल्यन से जापान के उत्पाद सस्ते हो गये हैं। अब भारत-जापान की इस बढ़ती नजदीकी से चीन बौखलाया हुआ है और उसकी तरफ से तरह-तरह के बयान सामने आ रहे हैं।

तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद भी चीन, भारत के साथ व्यापारिक संबंध को बनाये रखना चाहता है, क्योंकि भारत के साथ कारोबार करके चीन आर्थिक रूप से सबल हो रहा है। इतना ही नहीं, चीन भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना में भी गहरी रुचि दिखा रहा है। उसने भारत के समक्ष दिल्ली से चेन्नई के बीच बुलेट ट्रेन की परियोजना को मूर्त रूप देने में मदद करने  का प्रस्ताव भी रखा है। ज्ञात हो कि यह परियोजना जापान की बुलेट परियोजना से तीन गुना ज्यादा बड़ी है। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अहमदाबाद व मुंबई हाई स्पीड लिंक परियोजना का जापान के हाथों में चला जाना चीन के लिये एक बड़ा आर्थिक नुकसान है।  

हालाँकि, चीन के साथ भारत की तनातनी एक लंबे समय से चली आ रही है। भारत भी वस्तुस्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ है। वह जानता है कि चीन पर उसकी पूर्ण निर्भरता खतरे से खाली नहीं है। इसलिए, सामरिक रूप से संतुलन को बनाये रखने के लिये एवं दबाव की कूटनीतिक चाल के तहत वह जापान के साथ  रिश्ते को और भी मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है।

एक तरफ चीन को भारत एवं जापान के बीच बढ़ते संबंध नागवार गुजर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वह खुद जापान के साथ आर्थिक और वाणिज्यिक कारोबार बढ़ा रहा है। वह जरूरत पड़ने पर जापान से तकनीकी एवं आर्थिक मदद लेने से भी गुरेज नहीं कर रहा है। चीन की इसी नीति का परिणाम है कि हाल ही में जापान में चीनी पर्यटकों की संख्या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।

कहा जा सकता है कि मौजूदा समय में भारत वैसी विदेश नीति की राह पर चल रहा है, जिससे “साँप भी मर जाये और लाठी भी नहीं टूटे”। इसके तहत जापान के साथ पहले से बने  मधुर रिश्तों को एक नया आयाम दिया जा रहा है, ताकि एशिया में शक्ति संतुलन बराबर बना रहे साथ ही साथ अमेरिका भी दबाव में रहे। समग्र रूप से जापान का यह साथ भारत के लिए हर प्रकार से लाभकारी ही दिखाई देता है।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के कॉरपोरेट केंद्र, मुंबई में मुख्य प्रबंधक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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