रामनवमी विशेष : कम्पनियों के सीईओज को लेनी चाहिए राम के जीवन से सीख

सीईओ, टीम लीडर या बात अगर सियासत की करें तो आगे वे ही बढ़ते हैं, जो सबको साथ लेकर चलते हैं। राम ने यही तो किया था। आप पाएंगे कि सफल से सफल इंसान के जीवन में भी वह दौर आता है, जैसा राम को वनवास के रूप में झेलना पड़ा था। दरअसल, इस दौर में जो व्यक्ति राम की तरह से विपरीत हालातों का सामना जुझारू प्रतिबद्धता से करता है, वही आगे सफलता प्राप्त कर पाता है।

श्रीराम का जीवन यूँ तो न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के भी अनेक देशों में आदर्श के रूप में स्थापित और स्वीकृत है. लेकिन, यहाँ आज की जरूरतों के संदर्भ में एक अलग दृष्टिकोण से हम उसकी विवेचना करें तो श्रीराम का जीवन किसी कंपनी के सीईओ के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। राम अगर किसी बड़ी कंपनी के सीईओ होते तो खासे सफल रहते।

वे सफल इसलिए होते क्योंकि वे अपने जूनियर साथियों का सम्मान करते हैं, उनके किए असाधारण कार्यों को याद रखते हैं। वे बार-बार इस तरह के उदाहरण पेश करते हैं, जिन्हें कॉरपोरेट जगत का बिग बॉस अपनाए तो उसे बड़ा लाभ  हो सकता है। लीडरशिप के गुणों के अलावा राम का जीवन उन सीईओज और कंपनियों के लिए भी उदाहरण पेश करता है, जिन्हें उनके साथी-सहयोगी छोड़कर अन्य कंपनियों  का रुख कर लेते हैं।

सफलता और संघर्ष के मित्र

आमतौर पर इंसान के सफलता और संघर्ष के दौर के मित्र अलग-अलग होते हैं। राम उन साथियों का सम्मान करते हैं, जो उनके साथ आड़े वक्त में खड़े थे। इसका एक बेजोड़ उदाहरण रामचरित मानस में मिलता है। राम अपनी सेना के साथ वापस अयोध्या लौटते हैं। रावण और उसके साथियों का वध करने के बाद राम के अयोध्या लौटने पर आनंद का वातावरण है। सब बड़ी विजय मिलने से प्रसन्न हैं। अयोध्या में आलोकसज्जा हो रही है। इस क्रम में कुछ सप्ताह गुजर जाते हैं, उसके बाद जिंदगी पटरी पर लौटने लगती है।

सांकेतिक चित्र

तब राम एक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। उसमें वे उन सभी साथियों के प्रति आभार जताते हैं, जो रणभूमि में उनके साथ थे। जिन्होंने उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर शत्रु सेनाओं को धूल चटाई थी। सब योद्धा खड़े हैं। राम सबके पास जाकर उन्हें उपहार देते हैं। उनके प्रति कृतज्ञता दर्शाते हैं साथ ही उनसे विदा लेते हैं। एक प्रकार से कहते हैं कि अब चलिए अपने घरों की तरफ। अपने कामकाज में लग जाइये।

अंत में वे हनुमान जी के पास पहंचते हैं। पर, राम यहां पर ठिठकते हैं। हनुमान जी उनके चरणस्पर्श करते हैं। उन्हें गले लगाते हुए राम कहते हैं कि मैं आपके ऋण से मुक्त नहीं होना चाहता। आपको मेरे साथ यहां पर रहना होगा। हनुमान जी तो यही सुनना चाहते थे। वे राम से दूर जाने के लिए तैयार कहां थे। उन्होंने राम का साथ तो दिया था। उन्होंने राम की वानर राजा सुग्रीव से मैत्री करवाई। सीता को खोजा। युद्ध में लक्ष्मण के घायल होने के बाद संजीवनी बूटी लेकर आए। ये तो कुछेक उदाहरण है हनुमान जी के राम के प्रति उनकी भक्ति के।

हनुमान जी को रखा साथ

बहरहाल, जो श्रीराम ने हनुमान जी से जो कहा, उसे ताजा संदर्भों से जरा जोड़िए। अगर कोई बॉस अपने जूनियर के साथ इसी तरह का व्यवहार करे जैसा राम ने हनुमान जी के साथ किया तो वह जीवन भर उस बॉस और कंपनी के प्रति निष्ठा दिखाने लगेगा। पर, व्यवहार में ऐसा कहाँ होता है। प्राय: बॉस तो अपने जूनियर से काम निकलवाकर उसे भूल जाते हैं। उसके हितों का ख्याल कहां करते हैं। वे सालाना एप्रिजल में अपनी सैलरी तो बढ़वा लेते हैं, पर जूनियर को कह देते हैं ‘ देखों कंपनी के मर्जिन घट रहे हैं। इस बार इतना ही ले ले। आगे देख लेंगे।’ अगली बार आने से पहले ही उस बेचारे जूनियर का कंट्रेक्ट समाप्त कर दिया जाता है। जाहिर है, इस तरह के बॉस को सम्मान कौन देगा।

आजकल अगर नौकरियों में छंटनी सामान्य बात हो गई है, तो यह भी सच है कि पेशेवर लंबे समय तक एक जगह नहीं टिकते। वे स्थायी भाव से बेहतर अवसरों की तलाश में रहते हैं। अगर नौकरी जाने से किसी पेशेवर के सामने संकट पैदा होता,तो दूसरी स्थिति में मंजे हुए पेशेवर के कंपनी को छोड़ने से कंपनी को नुकसान होता है। अगर कोई शख्स राम के जीवन से शिक्षा लेकर अपनी कंपनी या दफ्तर को चलाए तो वह अपने साथी मातहतों को प्रोत्साहित कर सकता है। वे उनसे ज्यादा काम ले सकता है।

राम का जीवन शिखर लोगों के साथ-साथ उन सभी के लिए शानदार उदाहरण पेश करता है, जो सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं। वे बहुत से साथियों के साथ मिलकर काम करते हैं। राम  सबको साथ लेकर चलने में यकीन भी करते थे। रावण के साथ युद्ध में सब उनके साथ थे। कहीं-किसी स्तर पर गड़बड़ नहीं। अब रावण को लीजिए। उसका अपना भाई विभीषण ही उसके खिलाफ हो गया। यानी कि उसमें ज्ञान और बल होने के बावजूद नेतृत्व के गुण मौजूद नहीं थे।

सांकेतिक चित्र

सीईओ, टीम लीडर या बात अगर सियासत की करें तो आगे वे ही बढ़ते हैं, जो सबको साथ लेकर चलते हैं। राम ने यही तो किया था। आप पाएंगे कि सफल से सफल इंसान के जीवन में भी वह दौर आता है, जैसा राम को वनवास के रूप में झेलना पड़ा था। दरअसल, इस दौर में जो व्यक्ति राम की तरह से विपरीत हालातों का सामना जुझारू प्रतिबद्धता से करता है, वही आगे सफलता प्राप्त कर पाता है।

वनवास से राजा तक

किसी भी शख्स के जीवन में आए निराशा और अंधकार के दौर का मतलब जीवन समाप्ति नहीं माना जा सकता। राम को भी जीवन के 14 वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था। पर, वे वहां से वापस लौटकर अयोध्या के राजा बने। ये उदाहरण निराशा में  डूबे किसी भी शख्स के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। आमतौर पर होता यह है कि इंसान छोटे-मोटे झटकों के बाद निराशा के सागर में डूबने लगता है। उसे छोटी-मोटी नौकरी के जाने या बिजनेस में घाटा खाने के बाद लगता है कि जीवन में कुछ नहीं बचा। उसे चारों तरफ अँधेरा नजर आता है।

राजधर्म का निर्वाह

राम का अयोध्या से जाना और फिर अयोध्या लौटकर राजधर्म का निर्वाह करना वास्तव में बेहद प्रेरणाप्रद है। पिता के वचन का पालन करने के लिए वे वनवास के लिए निकले। अयोध्या की प्रजा उन्हें रोकती है। पर पिता के वचन का पालन करना है। वे गए। तमाम झंझावत झेले। उन पर विजय पाई। उसके बाद फिर से अयोध्या के राजा बने। राज भी इस तरह का किया जिसका अब भी रामराज कहकर उदाहरण दिया जाता है। महाभारत में भी राम के अयोध्या से वनवास जाने से मिलता-जुलता उदाहरण मिलता है।

कृष्ण ने पांडवों को इंद्रप्रस्थ राज्य की स्थापना में मदद की। पर, पांचों भाइयों ने कृष्ण की अनुपस्थिति में उसे जुए में गंवा दिया। इस कारण पांचों पांडव भाइयों को 12 वर्षो तक अज्ञातवास में धक्के खाने पड़े। उस दौर में जब युधिष्ठर अपनी भूल के लिए अपराधबोध से ग्रस्त होते थे, तब उन्हें राम का ही उदाहरण दिया जाता था। जिन्हें अकारण ही 14 साल तक कष्ट झेलना पड़ा। इस दौर ने सभी भाइयों को बहुत कुछ सिखाया।

बुरे वक्त में सकारात्मक रुख 

दरअसल विपरीत हालात इंसान को बहुत कुछ देकर-सिखाकर जाते हैं। असफलता के दौर में इंसान को गुजरा हुआ समझा जाता है। उसका जिक्र ‘था’ या ‘थे’ में होने लगता है। बेशक, किसी भी शख्स के लिए ये दौर कड़वी यादें छोड़ जाता है। पर, जो लोग राम की तरह से बुरे वक्त में भी सकारात्मक रहते हैं, उन्हें आगे चलकर सफलता मिलती है। वे अपने सपनों को साकार कर पाते हैं। वे राख के ढेर से फिर से मजबूती के साथ उभरने में कामयाब हो जाते हैं।

संदेश बहुत साफ है कि निराशा और असफलता स्थायी नहीं है, इसलिए जिंदगी से हार नहीं मानना चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राम का जीवन किसी भी इंसान के लिए एक पाठशाला की तरह है। उनके जीवन पर चलकर इंसान जीवन के समस्त झंझावतों का सामना करते हुए अच्छाई और सफलता के मार्ग पर चल सकता है।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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