जनरक्षा यात्रा : कम्युनिस्ट हिंसा को भाजपा का लोकतान्त्रिक जवाब

भाजपा की इस जनरक्षा यात्रा का निहितार्थ केवल शक्ति प्रदर्शन करना भर नहीं है, बल्कि इस माध्‍यम से सूक्ष्‍म संकेत देना है कि केरल में अब भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में जमीनी तौर पर स्थापित हो चुकी है। निश्‍चित ही पार्टी के दिग्‍गजों की मौजूदगी से स्‍थानीय कार्यकर्ताओं में बल, सुरक्षा व उत्‍साह का संचार हुआ है और हिंसात्‍मक ताकतों को लोकतान्त्रिक ढंग से करारा जवाब मिला है।

इसमें दो राय नहीं है कि राजनीति मौजूदा समाज का दर्पण है। समाज के प्रचलित मूल्‍य राजनीति में भी झलकते हैं। जहां तक वर्तमान राजनीति की बात है, यह उस दौर से गुजर रही है जो पहले कभी नहीं देखा गया। ऐसा प्रतीत होता है मानो भाजपा सरकार की सफलता से भयाक्रांत होकर सारे विपक्षी दल लामबंद होकर नफरत एवं हिंसा के सतही  हथकंडों पर उतर आए हैं।

भाजपा के प्रति राजनीतिक दलों की नफरत की राजनीति की आंच यूं तो देश भर में अलग-अलग रूपों में है, लेकिन इनमें केरल ऐसा राज्‍य है जो कि हिंसात्मक प्रतिक्रियावादी ताकतों का गढ़ कहा जा सकता है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने जब पशु खरीद-फरोख्‍त को लेकर कड़ा कानून बनाया तो केरल से ही सबसे पहले प्रतिक्रियात्‍मक विरोध के स्‍वर उभरे। यहां हिंसात्‍मक ताकतों ने सरेआम एक गोवंश को काटकर अपने विरोध का वीभत्स परिचय दिया।

यहां संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं पर हमलों एवं उनकी हत्या की एक लंबी श्रृंखला-सी चली आई है। लेकिन इसकी दिल्लीवासी मीडिया में कभी कोई विशेष चर्चा नहीं होती और बौद्धिक बिरादरी में भी इसपर खामोशी ही रहती है। इस दुष्‍चक्र को भाजपा देख-समझ रही थी और इसके चलते ही जनरक्षा यात्रा का यह अहम कदम उठाया गया।

भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह की अगुवाई में केरल में जनरक्षा यात्रा का आरंभ किया गया और हिंसक तत्‍वों को संदेश दिया गया कि भाजपा लोकतान्त्रिक ढंग से उनकी हिंसा का करारा जवाब देगी। इस यात्रा को हिंसात्‍मक राज्‍य में भाजपा का शांति मार्च या फ्लैग मार्च भी कहा जा सकता है, क्‍योंकि यही वह महत्‍वपूर्ण एवं निर्णायक समय है जब पार्टी यहां अपना जनाधार, जनसमर्थन व बल दिखा सकती है।

यह एक सही समय पर किया गया सही काम है। केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन के क्षेत्र कन्‍नूर से इसका आरंभ किया गया। शाह ने यहां भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ पैदल यात्रा शुरू की और संकेत दिया कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं के प्रति हिंसा को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। यह भाजपा की ही विशेषता है, परंपरा है, संस्‍कार है और साहस है कि उसके नेता हमेशा भीड़ के बीच खुलेआम चलते हैं। चाहे वह बड़े पद वाला नेता हो या छोटे पद वाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी स्‍वयं खुले वाहन में चलकर जनता से मुखातिब होते हैं। इसके उलट कांग्रेस के नेता सदा भयाक्रांत रहते हैं एवं जनता से दूरी बनाकर चलते हैं।

केंद्रीय पर्यटन मंत्री केजे अल्‍फोंसे को साथ लेकर चले अमित शाह ने लोगों को संबोधित भी किया। उन्‍होंने राज्‍य की वामपंथी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि, ‘जबसे यहां वामपंथी सरकार आई है, तभी से हिंसा भड़क रही है। इस राजनीतिक हिंसा की भेंट भाजपा कार्यकर्ता चढ़ रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार पिछले कुछ दिनों में यहां 130 से अधिक कार्यकर्ताओं की जान गई है। लेकिन भाजपा इससे घबराने वाली नहीं है। पार्टी इससे जूझकर जीतकर आएगी।’

शाह के इस साहसी कदम को आगे बढ़ाते हुए उत्‍तरप्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ भी इस अभियान से जुड़े और उन्‍होंने किचेरी से कन्‍नूर तक मार्च किया। दस किलोमीटर की इस पदयात्रा के लिए हालांकि सुरक्षा के इंतजाम किए गए थे, लेकिन यह योगी का साहस ही है कि वे केरल जैसा हिंसात्मक क्षेत्र में खुलेआम निडर भाव से निकले।

अपने भाषण में योगी ने केरल सरकार को बुरी तरह लताड़ा। उन्‍होंने लोकतांत्रिक मूल्‍यों का जिक्र करते हुए केरल सरकार को कठघरे में ला खड़ा किया। उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री विजयन, ममता बनर्जी जैसे नेताओं के दोहरे चरित्र को भी उजागर किया और कहा कि केरल, पश्चिम बंगाल की सरकारें लोकतंत्र की खूब दुहाई देती हैं, लेकिन इनकी नीतियां हिंसात्‍मक और दमनकारी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्‍यमंत्री विजयन के ही जिले में 20 से अधिक हत्‍याएं होना इस बात का प्रमाण है कि यहां हत्‍यारों को संरक्षण प्राप्‍त हो रहा है।

इसमें कोई शक नहीं है कि केरल के मुख्‍यमंत्री पी. विजयन एक विफल नेतृत्‍व वाले नेता हैं। एक संवैधानिक पद पर रहते हुए भी वे तटस्‍थ नहीं हैं और उनके ही कार्यकाल में कम्‍युनिस्‍ट सरकार से हुए गठबंधन ने राज्‍य में भाजपा व आरएसएस के हिंसात्मक दमन का सुनियोजित षडयंत्र किया है। ऐसे में यह जनरक्षा यात्रा समय की जरूरत थी। देखा जाए तो केरल ही नहीं, इस प्रकार के आयोजनों की आवश्‍यक्‍ता पश्चिम बंगाल में भी है। वहां ममता बनर्जी जैसी हिंदू विरोधी और मुस्लिम तुष्टिकरण में अंधी मुख्‍यमंत्री हैं।

भाजपा की इस जनरक्षा यात्रा का निहितार्थ केवल शक्ति प्रदर्शन करना भर नहीं है, बल्कि इस माध्‍यम से सूक्ष्‍म संकेत देना है कि केरल में अब भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में जमीनी तौर पर स्थापित हो चुकी है। निश्‍चित ही पार्टी के दिग्‍गजों की मौजूदगी से स्‍थानीय कार्यकर्ताओं में बल, सुरक्षा व उत्‍साह का संचार हुआ है और हिंसात्‍मक ताकतों को लोकतान्त्रिक ढंग से करारा जवाब मिला है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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