ये जनता की चिंताओं और समस्याओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील सरकार है !

भारतीय कंपनी सचिव संस्थान के कार्यक्रम में दिए अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री ने परेशानियों से इंकार नहीं किया,  बल्कि इसे स्वीकारते हुए इससे उभर आने का वादा किया। मोदी ने तथ्यों से लैस प्रेजेंटेशन देकर एक नया उदाहरण दिया है। साथ ही, जनता की समस्याओं आदि पर बात करके दर्शाया है कि ये सरकार जनता की चिंताओं और समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील है। प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के बाद छोटे व्यापारियों की समस्याओं को देखते हुए जीएसटी की दरो व प्रावधानों में सरकार द्वारा लाया गया बदलाव उपर्युक्त बात का एकदम ताज़ा और सटीक उदाहरण है।

नरेंद्र मोदी के रूप में देश ने ऐसा प्रधानमंत्री चुना है, जो जनता की नब्ज़ को पहचानता है तथा जिसे आरोपों का पलटवार प्रमाणपूर्वक करना आता है। कई दिनों से, विशेषकर विपक्षी नेताओं द्वारा, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी ‘जीएसटी’ की आलोचना हो रही थी। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आई थोड़ी गिरावट के बहाने देश की अर्थव्यवस्था के चरमराने की बात कही जा रही थी। सरकार की नीतियों को गलत बताया जा रहा था।  

पिछले दिनों भारतीय कम्पनी सचिव संस्थान (आईसीएसआई ) की पचासवीं वर्षगांठ पूरी होने के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने तथ्यों के साथ इन सब आरोपों का जोरदार जवाब दिया। वे आलोचकों के हर बात का तथ्यपरक और माक़ूल जवाब देते गए तथा श्रोता तालियों से और मोदी-मोदी के नारे से उनके जवाब को सराहते गए। उन्होंने बताया कि जीडीपी का नकद राशि अनुपात गिर कर 12% से 9% तक आ चुका है। इसका अर्थ ये है कि बाज़ार में नकद राशि कम हो चुकी है और डिजिटल रूप में ज़्यादा इस्तेमाल की जा रही है। अब जब रक़म डिजिटल रूप में ज़्यादा इस्तेमाल हो तो मतलब यह है कि पैसों के इस्तेमाल की पारदर्शिता बढ़ गई है। 

इसके अलावा प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि  शुरुआत में भले ही थोड़े नकारात्मक परिणाम दिखे, लेकिन ऐसी प्रक्रिया लम्बे समय के लिए लाभकारी है। विमुद्रीकरण की वजह से कुछ क्षेत्रों में गिरावट दर्ज की गई, लेकिन उसका अर्थ ये है कि उत्पादन और बाकी क्षेत्रों में काले धन का निवेश न के बराबर हो चुका है। देश और अर्थव्यवस्था को सुधार की आवश्यकता थी और सुधार लाने में थोड़ा उलटफेर, उतार-चढ़ाव तो लाज़मी है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी बताया कि देश में निवेश तेज़ गति से बढ़ता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार भारी-भरकम वृद्धि के साथ  $30,000  करोड़ से बढ़कर $40,000 करोड़ तक पहुंच चुका है।

इसके अलावा मुद्रा-प्रसार यानी इन्फ्लेशन घटते हुए 2.5 प्रतिशत पर आ चुका है, करंट अकाउंट डेफिसिट 4% से 1% हो चूका है और सड़क योजना, हाईवे का बजट, रिन्यूएबल, सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर आदि सबके बजट लगभग दोगुना बढ़ा दिए गए हैं।  ज़ाहिर सी बात है कि आलोचकों को ये सारे तथ्य नहीं दिख रहे और  जीडीपी की अस्थायी व मामूली गिरावट को मुद्दा बनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री का मानना है कि सरकार जीडीपी के लिए फैसले लेने को प्रतिबद्ध है, क्षमतावान है और तैयार भी है। 

दूसरी तरफ हाल ही में पत्रकारों से बातचीत में वर्ल्ड बैंक के प्रेसिडेंट जिम योंग किम ने भी जीएसटी और विमुद्रीकरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि जल्द ही भारत में इसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगेंगे, अस्थाई अवरोधों के कारण जीडीपी में कमी तो हुई है लेकिन सुधार की ओर भारत का ये क़दम प्रशंसनीय है और इससे न केवल भारत,बल्कि विश्व भर की अर्थव्यवस्था पर असर होगा।

बड़ा बदलाव लाने के लिए अर्थव्यवस्था को उतार-चढ़ाव से तो गुज़रना पड़ेगा – यही प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का मूल सन्देश था। प्रधानमंत्री ने परेशानियों से इंकार नहीं किया,  बल्कि इसे स्वीकारते हुए इससे उभर आने का वादा किया।  मोदी ने तथ्यों से लैस प्रेजेंटेशन देकर एक नया उदाहरण दिया है और ये दर्शाया है कि ये सरकार जनता की चिंताओं और समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील है और हर फैसले देश के हित में लिए जाएंगे। प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के बाद छोटे व्यापारियों की समस्याओं को देखते हुए जीएसटी की दरो व प्रावधानों में सरकार द्वारा लाया गया बदलाव उपर्युक्त बात का एकदम ताज़ा और सटीक उदाहरण है।

(लेखिका आरआईएस में इंटर्न हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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