स्क्रिप्ट राइटर नेता नहीं बनाते, नेता ‘परफॉर्म’ करके बना जाता है राहुल गांधी जी !

एक तरफ राहुल गांधी और दूसरी तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। एक तरफ नेहरू  खानदान का वारिस और दूसरी तरफ कभी चाय बेचने वाला आम आदमी। एक तरफ वह शख्स जो तीन बार गुजरात का मुख्यमंत्री रहा और अपने नेतृत्व में पार्टी को केंद्र में पूर्ण बहुमत दिलवाया। दूसरी तरफ वह नेता जिसके रहते-रहते पार्टी 43 सीटों पर सिमट गयी। एक तरफ वह नेता जिसने भारतीय जनता पार्टी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया। कैडर के हिसाब से देखें तो भारतीय जनता पार्टी आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। वहीं दूसरी तरफ वो नेता जिसके नेतृत्व में कांग्रेस अब कुछ गिने-चुने राज्यों में ही शेष रह गयी है। 

इन दिनों खबर मिल रही है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने स्क्रिप्ट राइटर बदल लिए हैं। अब वो लोग उनके लिए लिखने लगे हैं जो फिल्मों के लिए डायलॉग्स लिखते हैं और पहली कतार में बैठे लोगों की तालियाँ बटोरते हैं। राहुल गांधी सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए आजकल सस्ते फ़िल्मी हथकंडे का सहारा ले रहे हैं। चुटकुले, कहानियाँ और पहेलियाँ सुनाना उनका शगल हो गया है, जनता उन्हीं को सुनकर मनोरंजन कर ले रही है। कांग्रेस के जो लोग राहुल गांधी के पीछे खड़े हैं, वे भी तमाशा देखकर खुश हो रहे हैं कि वाह! राहुल कितनी बड़ी- बड़ी बातें करने लगे हैं।  

सांकेतिक चित्र

राहुल गांधी की माँ  सोनिया गांधी ने पिछले दिनों खबर दी कि राहुल गाँधी कभी भी कांग्रेस पार्टी के प्रेसिडेंट बन सकते हैं। इस देश के लिए वाकई उस दिन बहुत बड़ी खबर होगी, जिस दिन राहुल गांधी देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष बना दिए जायेंगे। इस बात पर दिमाग लगाने का कोई मतलब नहीं है कि आखिर राहुल गांधी ने इस मुकाम तक पहुँचने में कितनी मेहनत  की होगी?

कांग्रेस और भाजपा में क्या फर्क है?

राहुल गांधी अगर आम कांग्रेसी कार्यकर्ता होते तो इस पद तक नहीं पहुँच पाते, क्योंकि यह पार्टी सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार की जागीर रही है, इस बात को कांग्रेस के कार्यकर्ता अच्छी तरह से समझते हैं। भाजपाध्यक्ष अमित शाह से जब भी पूछा जाता है कि कांग्रेस-भाजपा में क्या अंतर है, तो वे एक बात कहते हैं कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा ये सबको पता है, लेकिन भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन होगा ये किसीको नहीं पता – इस बात से कांग्रेस और बीजेपी में मूल तौर पर क्या फर्क है, इसको समझना मुश्किल नहीं है। पिछले दिनों कई प्रदेश कांग्रेस समितियों की तरफ से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि राहुल गाँधी ही पार्टी के प्रेसिडेंट बनें और 2019 के लोक सभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करें। दरअसल ये सब तय योजना के मुताबिक औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं।

राहुल नेहरू-गांधी परिवार की उम्मीद, मोदी आम लोगों के आस और विश्वास

एक तरफ राहुल गाँधी और दूसरी तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। एक तरफ नेहरू  खानदान का वारिस और दूसरी तरफ कभी चाय बेचने वाला आम आदमी। एक तरफ वह शख्स जो तीन बार गुजरात का मुख्यमंत्री रहा और अपने नेतृत्व में पार्टी को केंद्र में पूर्ण बहुमत दिलवाया। दूसरी तरफ वह नेता जिसके रहते-रहते पार्टी 43 सीटों पर सिमट गयी। एक तरफ वह नेता जिसने भारतीय जनता पार्टी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना दी। कैडर के हिसाब से देखें तो भारतीय जनता पार्टी आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। वहीं दूसरी तरफ वो नेता जिसके नेतृत्व में कांग्रेस अब कुछ गिने-चुने राज्यों में ही शेष रह गयी है।

कांग्रेस खास लोगों की पार्टी, बीजेपी में चाय वाला भी पीएम

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक गरीब घर से आते हैं, उनके परिवार का कोई व्यक्ति सियासत या सत्ता के आस पास भी नहीं है। वहीं नेहरू-गांधी परिवार के आस पास जितने भी लोग हैं, वह सभी बड़े लोग हैं। उनका देश की जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं है। आज कांग्रेस की हालत देखें तो ज्यादातर राज्यों में वैसे लोग पार्टी की अगुवाई कर रहे हैं, जो पहले से ही सुविधा संपन्न हैं, किसी राजघराने से ताल्लुक रखते हैं, या किसी रियासत से उनका वास्ता रहा है। ऐसी पार्टियों में सामान्य परिवारों के आगे आने की संभावना नहीं के बराबर रह जाती है।

मोदी सशक्त प्रशासक, राहुल एक दशक से ट्रेनिंग पर

पिछले एक दशक से ज्यादा समय से कांग्रेस परिवार की लगातार यह कोशिश रही है कि राहुल गाँधी किसी तरह से राजनीति का क-ख-ग सीख जायें। इसके लिए उन्होंने दर्जनों दलितों के परिवारों में रात्रि विश्राम किया, उनकी जीवन पद्धति को समझने की कोशिश की। लेकिन कांग्रेस में ऐसे नेता राहुल के सिपहसलार हैं, जिन्हें गन्ना और आलू की खेती में कोई फर्क नज़र नहीं आता है।

राहुल गाँधी खुद ग्रामीण भारत की समझ नहीं रखते, उनको हमेशा फीडबैक की जरूरत रहती है।राहुल के खिलाफ एक बात जाती है कि वह राजनीति को गंभीरता से कभी नहीं लेते, उनका राजनीति को लेकर पार्ट टाइम एप्रोच रहता है, जिससे जनता उनको मजाक का पात्र समझती है। राहुल के लिए प्रधानमंत्री बनना एक तरह से असंभव ही है।

राहुल को समझना चाहिए कि लच्छेदार भाषण देकर नेता नहीं बना जाता, उसके लिए ‘परफॉर्म’ करना पड़ता है, जिस मामले में वे अबतक पूरी तरह से फिसड्डी साबित हुए हैं। इसलिए उन्हें चाहिए कि फ़िलहाल किसी राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिए मेहनत करें, यदि सत्ता मिलती है तो कोई दायित्व संभाले और अपनी क्षमता व योग्यता सिद्ध करने की कोशिश करें। मोदी से मुकाबले की सोचना अभी उनके लिए हाथ से आकाश छूने की कोशिश की तरह है, जिसमें विफलता के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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