अमेरिका की अफगानिस्तान नीति पर भारत के सधे हुए कदम

भारत की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि वह अफगानिस्तान में अपने सैनिक नहीं भेजेगा। भारत का कहना है कि वह अफगानिस्तान में सुरक्षा मजबूत करने के लिए जानकारी साझा करने और सुरक्षाकर्मियों को प्रशिक्षण देने के जरिए अमेरिका के साथ काम मिलकर करेगा। अफगानिस्तान के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति मजबूत करने, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स तैयार करने और अफगानिस्तान सरकार की क्षमता बढ़ाने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। स्पष्ट है कि अमेरिका की अफगानिस्तान नीति पर भारत बेहद संतुलित और सधे हुए ढंग से कदम बढ़ा रहा है। 

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति हमेशा चौंकाने वाली होती है। फिर चाहे वो डोकलाम विवाद के समय चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान अनपेक्षित मुलाकात हो या फिर सारे पूर्वाग्रहों को तोड़ते हुए इजरायल का दौरा करने का निर्णय हो। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने अमेरिका के शीर्ष थिंक टैंक  सीएसआईएस में अपने संबोधन में कहा था कि  हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान अपने देश में मौजूद उन आतंकवादी संगठनों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करेगा, जो उसके अपने लोगों और सीमावर्ती क्षेत्र के लिए खतरा बन गए हैं। आतंकवाद की मुसीबत से निपटना हर सभ्य देश की जिम्मेदारी है और यह पसंद का मामला नहीं है। अमेरिका और भारत इस क्षेत्रीय कोशिश की मिलकर अगुवाई कर रहे हैं।

गौरतलब है कि अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी द्विपक्षीय दौरे पर भारत आ रहे हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राष्ट्रपति गनी ने भारत आने की घोषणा ठीक उसी दिन की, जिस दिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री खुर्रम दस्तगीर ने कहा कि अफगान में भारत की कोई भूमिका उनके देश को स्वीकार्य नहीं है। अमेरिका की तरफ से भी लगातार पाकिस्तान को यह संकेत दिया जा रहा है कि अमेरिकी अफगानिस्तान नीति में अब भारत की भूमिका बेहद अहम है।

अशरफ गनी

दरअसल  अमेरिका अफगानिस्तान का सबसे बड़ा सहयोगी ही नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई का लीडर भी है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान और भारत दो स्वतंत्र व अच्छे पड़ोसी के तौर पर अपने रिश्तों को मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में, पाकिस्तान जैसे किसी दूसरे देश की आपत्तियों का कोई महत्व ही नहीं है। भारत-अमेरिका और भारत -अफगानिस्तान की यह बैठकें इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होंगी जब नई दिल्ली में तीनों देशों के बीच अलग अलग स्तर पर अफगानिस्तान में स्थायी शांति स्थापित करने, आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने और अफगानिस्तान में विकास कार्यो को आगे बढ़ाने पर बात करेंगे।

उल्लेखनीय है कि विदेश मंत्री टिलरसन की यात्रा से पहले अमेरिकी विदेश विभाग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस यात्रा में अफगानिस्तान में सहयोग को लेकर बेहद अहम बात होगी। तीन हफ्ते पहले अमेरिका के रक्षा मंत्री जिम मैटिस जब भारत के दौरे पर आये थे, तब उनकी रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से भी अफगानिस्तान में सहयोग पर काफी बात हुई थी, जिसमें अमेरिका-भारत-अफगानिस्तान के बीच नए समीकरण बनाने की भी बात थी।

भारतीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ अमरीकी रक्षा मंत्री जिम मेटिस

भारत की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि वह अफगानिस्तान में अपने सैनिक नहीं भेजेगा। भारत का कहना है कि वह अफगानिस्तान में सुरक्षा मजबूत करने के लिए जानकारी साझा करने और सुरक्षाकर्मियों को प्रशिक्षण देने के जरिए अमेरिका के साथ काम मिलकर करेगा। अफगानिस्तान के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति मजबूत करने, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स तैयार करने और अफगानिस्तान सरकार की क्षमता बढ़ाने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

गौरतलब है कि भारत और अमेरिका आतंकवादियों पर नियंत्रण करने के लिए आपसी सहयोग भी बढ़ा रहे हैं साथ ही एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव पर लगाम कसने  के लिए अमेरिका चाहता है कि भारत इस महाद्वीप में एक मजबूत देश बने। अमेरिका की शायद यह भी इच्छा है कि भारत अफगानिस्तान की क्षमताओं और संस्थानों को मजबूत करने में मदद करे ताकि अफगानिस्तान पाकिस्तान में जड़ जमाए बैठे तालिबान से निपटने में सक्षम हो सके।

(लेखक कॉरपोरेट लॉयर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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