योगी की मॉरीशस यात्रा का क्या है हासिल ?

योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री मात्र नहीं हैं, वह गोरक्षपीठाधीश्वर भी हैं। मॉरीशस के लोग उन्हें अपने बीच पाकर भावविह्वल थे। इनमें से बहुत लोगों के पूर्वज इस पीठ से जुड़े थे। पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ पहली बार यहां आए थे। लोगों के आनन्द का अनुमान लगाया जा सकता है। योगी आदित्यनाथ ने भी अपने दोहरे दायित्व का बखूबी निर्वाह किया। पीठाधीश्वर के रूप में उन्होने यहां सांस्क़ृतिक संबंधों पर बल दिया। मुख्यमंत्री के रूप में निवेश और आर्थिक, व्यापारिक रिश्ते मजबूत बनाने का सन्देश दिया। योगी की इस यात्रा को इन दोनों सन्दर्भो में देखना होगा।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मॉरीशस यात्रा से द्विपक्षीय रिश्तों का नया अध्याय लिखा है। उन्होने आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों पर ही जोर नहीं दिया, बल्कि सांस्कृतिक रिश्तों को भी आगे बढ़ाया है। इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मॉरीशस गए थे, उस दौरान कई विषयों पर आपसी सहमति बनी थी। योगी ने उनको भी न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उसकी सफलता के लिए उत्तर प्रदेश के योगदान को भी सुनिश्चित किया है।

योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री मात्र नहीं हैं, वह गोरक्षपीठाधीश्वर भी हैं। मॉरीशस के लोग उन्हें अपने बीच पाकर भावविह्वल थे। इनमें से बहुत लोगों के पूर्वज इस पीठ से जुड़े थे। पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ पहली बार यहां आए थे। लोगों के आनन्द का अनुमान लगाया जा सकता है। योगी आदित्यनाथ ने भी अपने दोहरे दायित्व का बखूबी निर्वाह किया। पीठाधीश्वर के रूप में उन्होने यहां सांस्क़ृतिक संबंधों पर बल दिया। मुख्यमंत्री के रूप में निवेश और आर्थिक, व्यापारिक रिश्ते मजबूत बनाने का सन्देश दिया। योगी की इस यात्रा को इन दोनों सन्दर्भो में देखना होगा।

अनेक ऐसे देश हैं, जिनसे भारत के रिश्ते दोस्ती नहीं, बन्धुत्व पर आधारित हैं।  इसका अनुभव शासन, सत्ता, विदेश नीति के ही नहीं, समाज के भी स्तर पर किया जाता है। एक दूसरे देशों के सुख-दुख का भावनात्मक असर होता है। भौगोलिक दूरी बहुत ज्यादा होने के बावजूद भावनात्मक लगाव बना रहता है। मॉरिशस ऐसा ही देश है। उसे भारत से गए लोगों ने सजाया-सँवारा है। कई पीढ़ी पहले श्रमिक बन कर भारत से गए लोगों ने ही इस भूखण्ड को इंसानों के रहने लायक बनाया। आज यहॉ सभी आधुनिक संसाधन उपलब्ध हैं।

योगी की इस यात्रा के क्रम में दो बिंदु भी गौरतलब हैं। इनका मॉरीशस यात्रा के विश्लेषण से सीधा कोई संबन्ध नहीं है। लेकिन इस पर ध्यान आकृष्ट होता है। मॉरीशस जाने के पहले योगी लखनऊ के पासपोर्ट कार्यालय में सामान्य नागरिक के तौर पर पहुंचे। पासपोर्ट बनवाने की औपचारिकता पूरी की। इसका मतलब है कि पांच बार लोकसभा सदस्य रहने के बावजूद वह विदेश नहीं गए थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद वह कुछ समय पहले म्यांमार अवश्य गए थे। जब संसद के सदस्य थे, तब उस दायित्व के निर्वाह में इतने व्यस्त रहे कि विदेश जाने का समय नहीं निकाल सके। मुख्यमंत्री के रूप में म्यांमार और मॉरीशस गए तो वहां उत्तर प्रदेश के विकास को भी अपने एजेंडे में रखा।

इसी के साथ दोनों देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधो को भी मजबूत बनाने में योगदान किया। दूसरा, प्रसंग भी उनकी सादगी से जुड़ा है। नरेंद्र मोदी भी ऐसे ही निर्णय लेते हैं। मॉरीशस जाने के क्रम में योगी को रात्रि विश्राम मुम्बई में करना था। इसके लिए उन्होनें किसी महंगे होटल में रुकने से इनकार कर दिया। वह मुम्बई स्थित उत्तर प्रदेश सरकार के गेस्ट हाउस में रुके। इसका निर्माण उत्तर प्रदेश के धन से किया गया। योगी के इस निर्णय से अन्य नेताओं को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। उत्तर प्रदेश भवन मुम्बई में रात्रि विश्राम करने वाले योगी पहले मुख्यमंत्री हैं।

योगी की मॉरीशस यात्रा को कई सन्दर्भो में देखा जा सकता है। इसमें आर्थिक, सामाजिक और सांस्क़ृतिक पक्ष समाहित हैं। सामाजिक आधार पर भारत और मॉरीशस का रिश्ता करीब एक सौ सत्तर वर्ष पुराना है। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से सात-आठ वर्ष पहले अंग्रेजो ने पूर्वी उत्तर प्रदेश से श्रमिको को मॉरीशस भेजने शुरुआत की थी। यह क्रम करीब सत्तर वर्षो तक चलता रहा। गिरमिटिया मजदूर के रूप में पचास लाख से ज्यादा मजदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश से गए थे।

पोर्टलुइस के अस्थाई निवास को अप्रवासी घाट कहा जाता है। प्रत्येक दो नवम्बर को अप्रवासी दिन मनाया जाता है। इसका मतलब है कि कई पीढ़ी बीतने के बावजूद यहां के लोग भारत से अपने जुड़ाव को भूलना नहीं चाहता। वहां के सामान्य नागरिक से लेकर राष्ट्रपति तक जब अपने पूर्वजों का गांव तलाश करते है, तब भारत को खुशी और गर्व की अनुभूति होती है। योगी इसी अप्रवासी दिवस में शामिल होने के लिए वहां गए थे।

मोंरीशस में ओसीआई कार्ड वितरित करते योगी आदित्यनाथ

यह सामाजिक रिश्तों को याद करने का अवसर था। इसमें गोरक्षा पीठाधीश्वर की उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण थी। योगी अप्रवासी सम्मेलन में शामिल होने के अलावा गंगा तोला स्थित महादेव मंदिर, रामायण सेंटर, विश्व हिंदू सचिवालय, महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट भी गए। इन सभी स्थानों का प्रतीकात्मक रूप में महत्व था। सभी जगह लघु भारत में होने का अनुभव कराती है। इसके पहले अप्रवासी सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्रालय का प्रतिनिधित्व होता था। इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बतौर मुख्यातिथि बुलाया गया था। इस आमंत्रण के पीछे सामाजिक रिश्तों की ही प्रेरणा थी। योगी ने इस दायित्व का बखूबी निर्वाह किया। वह जहां भी गए भारतीय मूल के लोगों से मिले। संवाद का अलग से भी कार्यक्रम रखा गया था।

मुख्य रूप से यह अप्रवासी सम्मेलन में शामिल होने  की यात्रा थी। लेकिन अवसर चाहे जो हो योगी उत्तर प्रदेश की भलाई और विकास साथ लेकर चलते हैं। म्यांमार में भी उन्होने ऐसा ही किया था। वहां बौद्ध सम्मेलन में शामिल होने के बाद उन्होने निवेशकों से मुलाकात की थी। उन्हें उत्तर प्रदेश में निवेश हेतु आमंत्रित किया। मॉरीशस में भी योगी तैयारी के साथ गए थे।

यहां भी भारतीय अधिकारियों के साथ उन्होने निवेशकों से मुलाकात की। यह बताया कि उन्हें उत्तर प्रदेश में निवेश संबन्धी सुविधाएं दी जाएंगी। योगी ने वहां प्रवासियों को प्रवासी भारतीय नागरिकता कार्ड वितरित किया। यह कार्ड देने की घोषणा मोदी सरकार ने की थी। इस पर क्रियान्वयन शुरू हुआ। इसके तहत प्रवासियों को मतदान के अलावा अन्य नागरिक अधिकार मिलेंगे। उन्हें भारत आगमन पर कई प्रकार की सुविधाएं मिलेंगी। भारतीय मूल के अप्रवासी को आजीवन वीजा की सुविधा स्वतः मिल जाएगी। उत्तर प्रदेश सरकार उन्हें पूर्वजो के गांव ढूढने में मदद करेगी।  जाहिर है कि योगी की मॉरीशस यात्रा बहुत सफल रही है।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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