ईरान-पाकिस्तान में बढ़ रही तल्खियां, भारत के लिए है बड़ा अवसर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान की दो दिवसीय यात्रा पर गए थे।  ईरान के राष्ट्रपति डॉ. हसन रूहानी के निमंत्रण पर हुई उस यात्रा में मोदी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अल खुमैनी से भी मिले थे। खुमैनी आमतौर पर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से मिलते नहीं है। लेकिन वे मोदी से मिले थे। साफ है कि ईरान ने मोदी की यात्रा को खासी तरजीह दी थी। भारत के लिए ईरान एक बहुत महत्वपूर्ण देश है। ईरान न केवल तेल का बड़ा व्यापारिक केन्द्र है, बल्कि मध्य-एशिया, रूस तथा पूर्वी यूरोप जाने का एक अहम मार्ग भी है। भारत ऊर्जा से लबरेज ईरान के साथ अपने संबंधों में नई इबारत लिखने का मन बना चुका है।

पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने बीते दिनों ईरान की यात्रा की। ये कोई सामान्य औपचारिक यात्रा नहीं थी बाजवा की। दरअसल ईरान-पाकिस्तान के संबंधों में लगातार तल्खी आ रही है। पिछले साल जिस दिन भारतीय सेना ने आजाद कश्मीर में आतंकी शिविरों को बर्बाद किया था, उसी दिन ईरान ने भी पाकिस्तान पर हमला किया था। दरअसल 28-29 सितंबर, 2016 की रात पाकिस्तान को लंबे समय तक याद रहेगी। उस रात भारतीय सेना के कमांडोज ने आजाद कश्मीर में घुसकर 38 आतंकी मार गिराए थे। उसी समय पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर ईरान ने मोर्टार दागे थे। ईरान के बॉर्डर गार्ड्स ने सरहद पार से बलूचिस्तान में तीन मोर्टार दागे।

पाकिस्तान और ईरान के बीच 900 किलोमीटर की सीमा है। याद रखिए कि यह वही ईरान है, जिसने 1965 में भारत के साथ जंग में पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था। ईरानी नेवी साथ दे रही थी पाक नेवी का। लेकिन तब से स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। एटमी गुंडे यानी पाकिस्तान से उसके कई पड़ोसी नाराज हैं, क्योंकि वो हर जगह आतंकवाद फैलाता है सऊदी अरब की मदद से। और सऊदी अरब के ताजा हालातों से जहां पाकिस्तान की नींद उड़ी होगी, वहीं ईरान चाहेगा कि वो ( सऊदी अरब) गृह युद्ध में नष्ट हो जाए ताकि खाड़ी क्षेत्र में उसका वर्चस्व हो जाए।

बहरहाल, ईरान इसलिए भी पाकिस्तान से नाराज है क्योंकि दोनों देशों की सीमा पर तैनात ईरान के दस सुरक्षाकर्मियों को पिछले साल आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था। ये मानकर चलिए कि ईरान-पाकिस्तान के बीच संबंध कभी सामान्य नहीं होंगे। कारण ये है कि पाकिस्तान पक्का दरबारी है ईरान के शत्रु सऊदी अरब का।

प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी नेता अयातुल्लाह अल खुमैनी

अवसर भारत के लिए

ये भारत के लिए अनुपम अवसर है ईरान से अपने संबंधों को मजबूती देने का। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान की दो दिवसीय यात्रा पर गए थे।  ईरान के राष्ट्रपति डॉ. हसन रूहानी के निमंत्रण पर हुई उस यात्रा में मोदी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अल खुमैनी से भी मिले थे। खुमैनी आमतौर पर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से मिलते नहीं है। लेकिन वे मोदी से मिले थे। साफ है कि ईरान ने मोदी की यात्रा को खासी तरजीह दी थी। भारत के लिए ईरान एक बहुत महत्वपूर्ण देश है। ईरान न केवल तेल का बड़ा व्यापारिक केन्द्र है, बल्कि मध्य-एशिया, रूस तथा पूर्वी यूरोप जाने का एक अहम मार्ग भी है। भारत ऊर्जा से लबरेज ईरान के साथ अपने संबंधों में नई इबारत लिखने का मन बना चुका है।

कीमतें तेल की

वर्तमान में भारत मुख्य रूप से कच्चे तेल को सऊदी अरब और नाइजीरिया से आयात करता है। मोदी की यात्रा से ईरान को ये संदेश मिल गया था कि भारत उसके साथ आर्थिक और सामरिक संबंधों को मजबूती देना चाहता है। भारत और अमेरिका के बीच 2008 में हुए असैन्य परमाणु करार के बाद ईरान के साथ बहुत सारी परियोजनाओं को या तो रद्द कर दिया गया था या टाल दिया गया था। ईरान से प्रतिबंध हटने के बाद माना जा रहा है कि अब तेल की कीमतों में और कमी आएगी। भारत को इसका सीधा लाभ मिलेगा।

ये भी सच है कि भारत और ईरान के बीच मतभेद और गलतफमियां रही हैं। ईरान इस वजह से भारत से नाराज था क्योंकि भारत ने 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में ईरान के परमाणु रिकॉर्ड के खिलाफ नाकारात्मक वोट किया था। भारत ने अमेरिका के दबाव में ईरान के खिलाफ वोट किया था।

शिया-सुन्नी मसला

इस बीच, ईरान-पाकिस्तान में इसलिए भी तनातनी रही है, क्योंकि ईरान शिया तो पाकिस्तान सुन्नी मुस्लिम देश है। पाकिस्तान की सऊदी अरब से नजदीकियां कभी भी ईरान को रास नहीं आई हैं। लेकिन, पाकिस्तान पक्का बेशर्म मुल्क है, इसलिए वो सऊदी से नाता नहीं तोड़ता। इसकी कुछ ठोस वजहें भी हैं। पहली, सऊदी में लाखों की तादाद में पाकिस्तान के मजदूर नौकरी करते हैं।

अगर ये वापस पाकिस्तान भेज दिए जाएं तो पाकिस्तान में हाहाकार मच जाएगा। दूसरा, पाकिस्तान को सऊदी से कच्चा लेत आराम से मिल जाता है। उसे कच्चा तेल तो ईरान, नाइजरिया या और किसी और देश से भी मिल सकता है, पर उसके नागरिकों को नौकरी और कोई देश नहीं दे सकता। इसलिए पाकिस्तान उसके साथ चिपका रहता है।

झूठ इस्लामिक गठबंधन का

ईरान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बड़ा बदलाव तब आया जब दिसंबर, 2015 मेंसऊदी अरब ने आतंकवाद से लड़ने के लिए 34 देशों का  एक ‘इस्लामी सैन्य गठबंधन’ का फैसला किया। लेकिन इस गठबंधन में शिया बहुल ईरान शामिल नहीं किया गया। इसमें सऊदी अरब ने पाक को प्रमुखता के साथ जोड़ा।

इस कारण ईरान काफी नाराज हुआ पाकिस्तान से। इस गठबंधन का चीफ बनाया गया पाकिस्तान का पूर्व आर्मी चीफ जनरल राहिल शरीफ को। ये गठबंधन कभी कायदे से अपना काम नहीं कर सका। इस गठबंधन को ईरान विरोधी के रूप में भी देखा गया, जो सऊदी अरब का मुख्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी है। खैर,अभी  नहीं लगता कि ईरान-पाक के संबंधों में सुधार होने वाला है। ये मौका है जब भारत करीब आ जाए ईरान के। इस दिशा में भारत बढ़ भी रहा है।

संबंधों की नई इबारत

ईरान भी भारत से संबंधों को मजबूती देना चाहता है। भारत तेल एवं गैस का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और वह ईरान से अधिकतम तेल एवं गैस खरीदना चाहता है। ईरान भी चाहता है कि उसे भारत जैसा बड़ा खरीददार मिल जाए। इस बीच, उसने भारत को चाबहार शहर में बंदरगाह बनाने काम सौंपा है।

भारत इसका प्रबंधन भी देखेगा। इसे बनाने में भारत लगभग 8.5 करोड़ डॉलर खर्च करेगा। यह विदेश में स्थित भारत का पहला बंदरगाह होगा जो भारत के मुन्द्रा पोर्ट से केवल 940 किमी की दूरी पर है। बेशक भारत तथा ईरान के निजी स्वार्थ शामिल हैं चाबहार पोर्ट को बनाने में। इसके निर्माण के बाद भारत के माल को मध्य-एशिया, ईरान की खाड़ी तथा पूर्वी-यूरोप तक एक तिहाई समय में पहुंचाने का काम करेगा और किराए में भी कटौती होगी। कुल मिलाकर बात ये है कि भारत को ईरान-पाकिस्तान के संबंधों में आई कड़ुवाहट का लाभ लेना चाहिए।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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