दंगों की राजनीति में माहिर रही है कांग्रेस

अंग्रेजों की “बांटो और राज करो” की नीति को कांग्रेस ने आजादी के बाद बखूबी इस्‍तेमाल किया। इसे गुजरात के उदाहरण से अच्‍छी तरह समझा जा सकता है। कांग्रेस शुरू से ही गुजरात में माफियाओं, दंगाइयों को संरक्षण देकर वोट बैंक की राजनीति करती रही है। आजादी के बाद गुजरात का सबसे भीषण दंगा 1969 में अहमदाबाद में हुआ जिसमें पांच हजार मुसलमान मारे गए। उस समय गुजरात के कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री थे हितेंद्र भाई देसाई और भारत की प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। दंगों के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके नेता मुसलमानों के रहनुमा के रूप में सामने आते और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर सत्‍ता हासिल करने में कामयाब रहते।

जो कांग्रेस पार्टी पिछले पंद्रह वर्षों से देश भर में होने वाले चुनावों में गुजरात दंगों की माला जपती रही है, वही कांग्रेस गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव में गुजरात दंगों का भूलकर भी नाम नहीं ले रही है। क्योंकि गुजरात में ये दाँव उसे ही नुकसान पहुंचाएगा। एक ओर कांग्रेसी नेता केरल में सरेआम गाय काटकर उसका मांस परोस रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी गुजरात में मंदिरों, मठों में माथा टेक रहे हैं।

स्‍पष्‍ट है, कांग्रेस नारा भले ही विकास का दे रही है, लेकिन वह वोट बैंक की राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है। अंतर बस यही आया है कि इस बार मुस्‍लिम वोट बैंक के बजाय उसका निशाना हिंदू वोट बैंक है। यह स्‍थिति इसलिए पैदा हुई है कि 2014 के लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने मुस्‍लिम वोट बैंक ध्‍वस्‍त कर दिया है। कांग्रेस जानती है कि गुजरात में अभी मुसलमान केरल की भांति निर्णायक स्‍थिति में नहीं हैं, इसलिए वह गुजरात में भगवा रंग ओढ़ने की नौटंकी कर रही है।

सांकेतिक चित्र

अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति को कांग्रेस ने आजादी के बाद बखूबी इस्‍तेमाल किया। इसे गुजरात के उदाहरण से अच्‍छी तरह समझा जा सकता है। कांग्रेस शुरू से ही गुजरात में माफियाओं, दंगाइयों को संरक्षण देकर वोट बैंक की राजनीति करती रही है। आजादी के बाद गुजरात का सबसे भीषण दंगा 1969 में अहमदाबाद में हुआ जिसमें पांच हजार मुसलमान मारे गए। उस समय गुजरात के कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री थे हितेंद्र भाई देसाई और भारत की प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। दंगों के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके नेता मुसलमानों के रहनुमा के रूप में सामने आते और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर सत्‍ता हासिल करने में कामयाब रहते।

गुजरात में दूसरा बड़ा सांप्रदायिक दंगा फरवरी 1985 में हुआ जो 21 महीने तक चलने के बाद अक्‍टूबर 1986 में खत्‍म हुआ। इस दौरान कांग्रेस के मुख्‍यमंत्री थे माधव सिंह सोलंकी और देश के प्रधनमंत्री थे राजीव गांधी। 1987 में कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री अमर सिंह चौधरी के कार्यकाल में फिर दंगे भड़क उठे जिन पर बड़ी मुश्‍किल से काबू पाया जा सका। इसके बाद तो तकरीबन हर साल गुजरात का कोई न कोई शहर सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलसने लगा। कांग्रेसी मुख्‍यमंत्रियों के संरक्षण में होने वाले इन दंगों ने बहुसंख्‍यक हिंदुओं में असुरक्षा की भावना पैदा किया जिसका नतीजा यह हुआ कि हिंदुओं का ध्रुवीकरण शुरू हुआ।

हिंदुओं के बीच सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न हो, इसके लिए कांग्रेस ने जातिगत विभाजन को बढ़ावा देने की कुटिल चाल चली। 1981 में कांग्रेस ने आरक्षण हेतु “खाम फार्मूला” लागू किया। इससे गुजरात में जातिगत संघर्ष शुरू हो गया। आगे चलकर इस जातिगत संघर्ष ने सांप्रदायिक रूप धारण कर लिया। इससे कांग्रेस की साजिश पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई और जमीनी स्‍तर पर हिंदुओं के बीच पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ। मुस्‍लिम तुष्‍टीकरण की नीतियों के चलते हिंदुओं के बीच पनप रही असुरक्षा की भावना ने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और विश्‍व हिंदू परिषद के लिए उर्वर जमीन मुहैया कराई जिसका नतीजा यह निकला कि गुजरात की बागडोर कांग्रेस के हाथ से निकल गई।

अब सत्‍ता हासिल करने का कांग्रेसी फार्मूला पिट चुका था, इसलिए कांग्रेस ने 2002 के दंगों की माला जपनी शुरू कर दी। दुर्भाग्‍यवश कांग्रेस की इस रणनीति का उलटा असर हुआ और मुस्‍लिम ध्रुवीकरण के बजाय हिुदओं का ध्रुवीकरण होने लगा। इससे कांग्रेस की रही-सही जमीन भी जाती रही।

चूंकि अब कांग्रेस की बांटो और राज करो की नीति नाकाम हो चुकी है, इसलिए वह दूसरे टोटकों का सहारा ले रही है, लेकिन उसकी रणनीति ‘बांटो और राज करो’ से आगे नहीं बढ़ पाई है। सवा सौ साल पुरानी राजनीतिक पार्टी में इतना दम नहीं बचा है कि वह अपने दम पर चुनावी मैदान में उतर सके। इसीलिए वह अल्‍पेश ठाकुर, हार्दिक पटेल और जिग्‍नेश मेवाणी जैसे चुनावी बुलबुलों के सहारे चुनावी नाव पार करने की जुगत भिड़ा रही है।

इतना ही नहीं, कांग्रेस गुजरात में जातीय विभाजन को हवा दे रही है ताकि नरेंद्र मोदी का हिंदू वोट बैंक ध्‍वस्‍त हो जाए। इसीलिए राहुल गांधी मंदिरों-मठों पर माथा टेक रहे है और गुंजरात दंगों का नाम नहीं ले रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी भूल रहे हैं कि गुजरात की जनता कांग्रेस की कुटिल चाल और दंगों की राजनीति से  अच्‍छी तरह परिचित है। स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी की लाख कोशिशों और विघटनकारी राजनीति के बावजूद गुजरात में कमल खिलना तय लग रहा है।

(लेखक केन्द्रीय सचिवालय में अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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