मूडीज रेटिंग : अर्थव्यवस्था के विकास पर सवाल उठा रहे विपक्ष की बंद हुई बोलती !

मोदी सरकार ने जिन आर्थिक सुधारों को लागू किया, उनके क्रियान्‍वयन के आधार पर ही मूडीज द्वारा रेटिंग बढ़ाई गई है। इसे पहले से बढ़ाया गया है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े ऐलानों के अलावा पुर्नपूंजीकरण, दिवालिया कानून, इन्‍साल्‍वेंसी लॉ, बैंकिंग आदि आर्थिक सुधारों में इजाफा देखा गया, जिसके चलते मूडीज ने सॉवरेन की रेटिंग को अपग्रेड करने जैसा अहम फैसला लिया, जिसका अर्थ है कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था उन्‍नति के पथ पर अग्रसर है।

यह सप्‍ताहांत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कई अर्थों में सकारात्‍मक और लाभदायी रहा। व्‍यक्तिगत रूप से और शासनगत रूप से दोनों मोर्चों पर वे प्रसिद्धि के नए सोपान चढ़े। अव्‍वल तो अमेरिकी सर्वेक्षण संस्‍था प्यू ने उन्‍हें लोकप्रियता के शिखर पर बताया, वहीं अंतरराष्‍ट्रीय रेटिंग संस्था मूडीज की रेटिंग ने मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों का समर्थन किया है।

देश की अर्थव्‍यवस्‍था को लेकर विपक्षी दलों द्वारा किए जाने वाले मौखिक हमलों और आलोचनों को धता बताते हुए अंतरराष्‍ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की रेटिंग में इस बार बढ़ोत्तरी की है। भारत का प्रदर्शन इतना अच्‍छा आंका गया कि बताया जाता है कि करीब 13 साल बाद मूडीज ने भारत की रैंकिंग में सुधार किया है। यानी देश ने मोदी सरकार विरोधी सभी आधारहीन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी आर्थिक उन्नति का लोहा मनवाया है।

अर्थशास्‍त्र की भाषा में इसे सावरेन रेटिंग कहा जाता है, यानी किसी भी देश में मौजूदा अर्थव्यवस्था को आंकने का यह एक पैमाना होता है। मूडीज ने भारत के लिए यह रेटिंग अपग्रेड कर दी है। वास्‍तव में यह इतनी बड़ी उपलब्धि है कि इसके बारे में समझने के लिए तकनीकी रूप से गहराई में जाना होगा, लेकिन यदि मोटे तौर पर समझा जाए तो मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों को वैश्विक स्‍तर पर ना केवल उम्‍दा सराहना मिली है, बल्कि उसे एक मिसाल के तौर पर अन्‍य देशों के सामने भी दिखाया जा रहा है। कैसी विडंबना है कि एक ओर मूडीज जैसी ग्‍लोबल एजेंसी भारत के आर्थिक सुधारों की सफलता को मुहर लगाकर प्रमाणित कर रही है, वहीं हमारे ही देश के भीतर विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल सरकार की अर्थनीति का अतार्किक ढंग से जब-तब मखौल उड़ाने से बाज नहीं आते।

सांकेतिक चित्र

असल में, उन्‍हें इस बात का एक प्रतिशत भी अंदाजा नहीं है कि वे कहां चूक कर रहे हैं। प्रत्‍येक नई पहल सदा विरोध के साथ शुरू होती है। यदि यह विरोध स्‍वस्‍थ आलोचना से निकला हो तो यह सुधार की दिशा में मार्ग प्रशस्‍त करता है, लेकिन जब इस विरोध में दुर्भावना जुड़ जाए तो यह विरोध नहीं यह वैर का रूप ले लेता है। केंद्र सरकार के साथ यही हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो सालों में लगातार क्रमश: नोटबंदी एवं जीएसटी जैसे बड़े निर्णय लिए।

निश्‍चित ही नोटबंदी का निर्णय पूरे देश को हिला देने वाला था। शुरुआती दिनों में लोगों को परेशानी आई लेकिन जल्‍द ही सब कुछ बदल गया। बड़े पैमाने पर कालेधन का खात्‍मा हो गया। आतंकवादियों को फंडिंग करने वाली ताकतों की कमर टूट गई। घरों में बेहिसाब धन जमा करके रखने वालों की शामत आ गई और उन्‍हें अपनी आय-व्‍यय का ब्‍योरा आयकर विभाग को देना ही पड़ा। इस बड़े आर्थिक सुधार की विश्‍व भर में जमकर सराहना हुई, लेकिन हमारे ही देश में विपक्ष में बैठी कांग्रेस और वामपंथियों ने बिना आधार के नोटबंदी का खुलकर विरोध किया।

विरोध करने के लिए विपक्षियों ने भाषा का स्‍तर गिरा दिया और सतहीपन पर उतर आए। पेशेवर हास्‍य कलाकारों को फीस चुकाकर सरकार के विरोध में कार्यक्रम आयोजित कराए। जनता के मन में उन्‍होंने नोटबंदी को लेकर ऐसा हौव्वा खड़ा करने की कोशिश की मानो नोटबंदी के बाद से देश बरबाद होता जा रहा हो। लेकिन, इसका उल्‍टा ही हुआ।

नोटबंदी के बाद से देश में मेहनतकश और ईमानदार नागरिक को कभी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। नोटबंदी से पहले भी उनका जीवन वैसा ही था, जैसा अब है। वास्‍तव में नोटबंदी होने से उन लोगों के मंसूबे ध्‍वस्‍त हो गए हैं, जिन्‍होंने कालाधन छुपा रखा था। ऐसे कई कारोबारी, उद्योगपति थे जो कि अनुपातहीन संपत्ति लेकर बैठे हुए थे और आयकर विभाग की आंखों में धूल झोंक रहे थे।

नोटबंदी के बाद कर अपवंचन का अपराध कर रहा बड़ा वर्ग हाशिये पर आ गया। ऐसे में, इन्‍होंने अपनी खीझ मिटाने के लिए सरकार पर दोषारोपण करना, आरोप लगाना, विरोध करना शुरू कर दिया। अभी यह वर्ग नोटबंदी के झटके से उबरा नहीं था कि इस साल पहली छमाही समाप्‍त होते ही मोदी सरकार ने जीएसटी जैसा ऐतिहासिक बिल लागू कर दिया। इसके बाद उन सभी बड़े व्‍यापारियों की बन आई जो कि रोजाना लाखों रुपयों का लेनदेन करते थे, लेकिन बिलों में गड़बड़ी कर दिया करते थे। इस गड़बड़ी को सुधारने के लिए जीएसटी बहुत कारगर साबित हुआ है।

सांकेतिक चित्र

देश में अचानक एक साल के भीतर दो बड़े आर्थिक सुधारों की आहट देश ही नहीं, दुनिया में भी गूंजी। बाहर के सभी देशों ने पीएम मोदी की साहसिक निर्णय लेने की क्षमता की सराहना की और उनके द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों से स्‍वयं कुछ सीखने की कोशिश की। यह बहुत गर्व से भरी बात है कि मूडीज जैसी सर्वोच्‍च एजेंसी ने भी मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ की।

मूडीज द्वारा सॉवरेन रेटिंग अपग्रेड किया जाना एक पुख्‍ता और ठोस प्रक्रिया है। यह किसी लहर, दबाव या उत्‍साह में आकर किया गया कार्य नहीं है। इसका आकलन इस बात से किया जा सकता है कि भारत सरकार ने जिन आर्थिक सुधारों को लागू किया, उनके क्रियान्‍वयन के आधार पर ही ये रेटिंग दी गई है। इसे पहले से बढ़ाया गया है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े ऐलानों के अलावा पुर्नपूंजीकरण, दिवालिया कानून, इन्‍साल्‍वेंसी लॉ, बैंकिंग आदि आर्थिक सुधारों में इजाफा देखा गया, जिसके चलते मूडीज ने सॉवरेन की रेटिंग को अपग्रेड करने जैसा अहम फैसला लिया, जिसका अर्थ है कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था उन्‍नति के पथ पर अग्रसर है। सॉवरेन रेटिंग इसका एकमात्र मापदंड है।

रेटिंग बढ़ते ही तत्‍काल प्रभाव भी सामने आने लगे। शेयर मार्केट में बढ़त, डॉलर की तुलना में रुपया उछला और ट्रेडिंग सेक्‍टर में भी इजाफा देखा गया। सबसे खास बात यह है कि अब यह रेटिंग बढ़ने के बाद देश में विदेशी निवेश अधिक आसानी से हो सकेगा। हालांकि अभी भी सरकार के सामने राजकोषीय घाटे से उबरने की चुनौती बनी हुई है और निवेशक इसका लाभ लेने का भरपूर प्रयास करेंगे। पूर्ववर्ती सरकार के समय बार-बार हो रहे करोड़ों-अरबों के घोटालों में तो देश की इकॉनामी बुरी तरह बैठ गई केंद्र में सरकार बनने के महज तीन साल में मोदी सरकार ने देश की अर्थव्‍यवस्‍था को शिखर पर पहुंचाने का दुसाध्‍य कार्य कर दिखाया है, जिसके लिए निस्संदेह सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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