यूपी निकाय चुनावों की शर्मनाक हार के बाद तो अपनी नकारात्मक राजनीति से बाज आए कांग्रेस !

अब जिस तरह से यूपी के निकाय चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ है, वो उसकी राजनीति दुर्दशा के चरम की ही कहानी कहता है। कांग्रेस को समझना चाहिए कि सिर्फ भाजपा या मोदी का अंधविरोध करके जनादेश नहीं पाया जा सकता। नोटबंदी, जीएसटी और आखिर में ईवीएम के विरोध से जनता को अपने साथ लाने की कोशिश केवल समय की बर्बादी है। इस वक़्त जनता मोदी सरकार और उसकी नीतियों के साथ है, कांग्रेस को चाहिए कि वो इस तथ्य को स्वीकारते हुए रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाए तथा नकारात्मक राजनीति से बाज आए।

उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा ने अपना परचम लहराया और कांग्रेस-सपा आदि दलों को बुरी तरह से मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस की हार को तवज्जो देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अमेठी जो कल तक पार्टी का गढ़ माना जा रहा था, वहां से भी उसे हार का गहरा जख्म मिला है। निकाय चुनावों में पराजय इस बात का संकेत है कि कांग्रेस को जनता ऊपर से नीचे तक पूरी तरह से खारिज करती जा रही है। ये हार विशेष रूप से कांग्रेस के लिए इस कारण भी चिंताजनक है, क्योंकि गुजरात विधानसभा चुनाव सिर पर हैं।

ये वो दौर है, जब पार्टी जीत को अपने खाते में लाने के लिए एड़ी-चोटी का दम लगा रही है। पार्टी के युवराज राहुल गाँधी मोदी पर प्रहार कर रहे हैं। एक पूरी टीम भाजपा को फॉलो करते हुए सोशल मीडिया पर दिन-रात सक्रिय रह रही है तो फिर कमी कहां हैं, ये सवाल हर कांग्रेसी नेता के जहन में है। पैसा और वक्त दोनों ही पानी की तरह बहाया जा रहा है, परन्तु सवाल अब भी वहीं बरकरार है कि कुछ असर क्यों नहीं हो रहा।

इस प्रश्न की तह तक जाने के लिए अगर थोड़ा पीछे जाएं तो 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी का सबसे ज्यादा फोकस यूपी पर रहा, अखिलेश का हाथ थामे राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस विकास, जातिवाद जैसे लगभग हर मुद्दे पर भाजपा को कठघरे में खड़ा करती आई। इतने मुद्दे उठाने के बाद भी कांग्रेस समेत पूरे विपक्षी खेमे को यूपी विधानसभा चुनाव में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद अब जिस तरह से यूपी के निकाय चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ है, वो उसकी राजनीति दुर्दशा के चरम अवस्था की ही कहानी कहता है। इसके बाद तो कांग्रेस को अपनी हार के कारणों पर तुरंत मंथन चाहिए। कांग्रेस को समझना चाहिए कि सिर्फ भाजपा या मोदी का अंधविरोध करके जनादेश नहीं पाया जा सकता। नोटबंदी, जीएसटी और आखिर में ईवीएम के विरोध से जनता को अपने साथ लाने की कोशिश केवल समय की बर्बादी है। इस वक़्त जनता मोदी सरकार और उसकी नीतियों के साथ है, कांग्रेस को चाहिए कि वो इस तथ्य को स्वीकारते हुए रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाए तथा नकारात्मक राजनीति से बाज आए।

विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी के पास ना तो कोई नई रणनीति है और ना ही अब कोई ऐसा चेहरा दिखता है जो उसे दुबारा मंच पर खड़ा करने के लिए सहारा दे सके। परिवारवादी राजनीति में जकड़ी कांग्रेस नेतृत्व के नाम पर राहुल गाँधी को जबरन नेता बनाने पर तुली हुई है। कांग्रेस में ये राहुल का काल चल रहा है। राहुल के बयानों में जो नासमझी दिखती है, वो उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता और बचकानेपन का ही प्रमाण है। जब-जब राहुल कोई बयान देते हैं, तब-तब ऐसा कुछ बवंडर हो ही जाता है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मीडिया के समक्ष सफाई देनी पड़ती है। अब जिस शख्स के सिर पर पार्टी अध्यक्ष का ताज सजने वाला है, वो ही गंभीर नहीं है तो पार्टी की दुर्दशा स्वाभाविक ही है।

(लेखिका पेशे से पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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