कांग्रेस में राहुल राज : कांग्रेस को अब लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करना छोड़ देना चाहिए !

कांग्रेस को लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करनी छोड़ देनी चाहिए, जिसे पूरे देश में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर एक युवा नहीं मिल सका, जो कांग्रेस का नेतृत्व कर सके। कांग्रेस अब भी बंदी बनी हुई है अपने सोच की, अपनी मानसिकता की। लगता है, युवा कांग्रेसियों को उस दौर का इंतजार ही करना होगा, जब कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के चंगुल से मुक्त होगी।

कांग्रेस का इतिहास सौ साल से ज्यादा पुराना है, इन सौ सालों में यह पार्टी इतनी कमजोर कभी नहीं थी, जितनी अभी है। राज्यों की विधान सभाओं और संसद में ही नहीं, जमीनी स्तर पर भी कांग्रेस पार्टी का सफाया हो चुका है। गावों में, कस्बों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा हुआ है। पार्टी संगठन छिन्न-भिन्न हो चुका है। देश की राजनीती में कांग्रेस ने अपना केंद्रीय स्थान खो दिया है।

आज जब कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा रहा है, यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राहुल गांधी पार्टी में बहुत समय से महसूस की जा रही बदलाव की जरूरत को को पूरा करने की ओर बढ़ सकेंगे? आखिर वह बदलाव को कैसे अंजाम देंगे? क्योंकि, बदलाव का पहला सवाल तो उस वंशवाद पर ही है, जिसके सहारे वे अध्यक्ष बन रहे हैं। इस पर पार्टी के अंदर और बाहर से सवाल उठते रहे हैं।

सवाल यह भी है कि इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कांग्रेस के अन्दर लोकतंत्र कितना बचा है? 130 करोड़ की आबादी वाले देश में कांग्रेस अध्यक्ष बनने का सपना क्या देश का कोई अन्य युवा, पार्टी का कोई अन्य नेता नहीं देख सकता? वाकई नहीं देख सकता है! कांग्रेस की यही हकीकत है। ऐसे में, यह व्यवस्था राजशाही-सामंतशाही व्यवस्था नहीं है तो क्या है? जिसमें राजा का बेटा ही राजा बनता है, सामंत का बेटा सामंत बनता है, किसी जमींदार का बेटा जमींदार बनता है। वैसे अध्यक्ष बनने के बाद अधिकार के नाम पर उन्हें ऐसा कुछ अधिक नहीं मिल जाएगा, जो उपाध्यक्ष या अन्य पदों पर रहते हुए उनके पास नहीं था। हर पद पर रहते हुए वे कांग्रेस में सर्वाधिक अधिकारसंपन्न नेता थे। अध्यक्ष पद सिर्फ एक रस्म अदायगी भर है।

सांकेतिक चित्र

कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने कहा, क्या मुग़लकाल में चुनाव होते थे? सही है, तब सबको पता होता था कि हुमायु से अकबर, अकबर से जहाँगीर के बाद शाहजहाँ और शाहजहाँ के बाद औरंगजेब को सत्ता मिलेगी। पर वो लोकतंत्र नहीं था, आज लोकतान्त्रिक व्यवस्था है। मगर, कांग्रेस में मोतीलाल नेहरू के समय से ऐसा होता आया है। मोतीलाल नेहरू के बाद उनके बेटे जवाहरलाल कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने। नेहरू के बाद इंदिरा बनीं, इंदिरा के बाद राजीव, राजीव के बाद सोनिया गांधी और अब सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी। योग्यता के अन्य सभी पहलू गौण रहे, नेहरू-गांधी परिवार का होना ही इस पद की योग्यता का आधार बन गया।

यह उस ब्रिटिश राजनीति का हिस्सा लगता है, जिसमें सैकड़ों सालों से एक ऐसी शासकीय व्यवस्था चली आ रही है, जिसमें राजा ही देश की सत्ता का असली कस्टोडियन माना जाता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, प्रधानमंत्री बदलते रहते हैं। लेकिन, भारत में तो यह एक ऐसी व्यवस्था की शक्ल ले चुका है, जिसमें माना जाता है कि नेहरू-गांधी परिवार को कांग्रेस के शीर्ष पर और सत्ता में होने पर सरकार के शीर्ष पर बने रहने का जैसे ईश्वरीय आदेश मिला हुआ हो। कांग्रेस के एक युवा नेता शहजाद पूनावाला ने जब राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने की पूरी प्रक्रिया को “फ्रॉड” बताया तो यह समझ में आ जाना चहिये कि इतनी हारों के बाद भी कांग्रेस के अन्दर राहुल इसलिए पार्टी के अध्यक्ष बनेंगे क्योंकि वह “राहुल गांधी” हैं।

मैं राहुल गांधी के सामने मौजूद चुनौतियों की आज बात नहीं करूंगा। आज सिर्फ यही कहूंगा कि कांग्रेस को लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करनी छोड़ देनी चाहिए, जिसे पूरे देश में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर एक युवा नहीं मिल सका, जो कांग्रेस का नेतृत्व कर सके। कांग्रेस अब भी बंदी बनी हुई है अपने सोच की, अपनी मानसिकता की। लगता है, युवा कांग्रेसियों को उस दौर का इंतजार ही करना होगा, जब कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के चंगुल से मुक्त होगी। न जाने वह दौर कब आएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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