राम मंदिर मामले पर सिब्बल की दलीलों से उजागर हुआ कांग्रेस का पाखण्ड !

सवाल यह उठता है कि आखिर कपिल सिब्बल राम मंदिर प्रकरण पर सुनवाई से इतना घबरा क्यों रहे हैं कि अदालत से उसे टालने की गुहार लगा रहे थे ? सवाल यह भी है कि वे अदालत में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील बनकर उतरे थे या कांग्रेस के नेता ? ये सवाल इसलिए उठ रहे, क्योंकि वकील का काम मसलों का कानूनी ढंग से निपटारा करना होता है, उसपर राजनीति होगी या उसका क्या प्रभाव होगा इससे वकील को कोई विशेष मतलब नहीं होना चाहिए। फिर सिब्बल ने अदालत में इस मसले पर ‘राजनीति होने’ का तर्क कैसे रख दिया। इस तरह तो यही जाहिर होता है कि वे अदालत में वकालत करने नहीं, राजनीति करने उतरे थे।

राम मंदिर मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों वाली विशेष पीठ ने सुनवाई की तारीख को बढ़ा दिया है। अब अगली सुनवाई आठ फ़रवरी को होगी। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल जो कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी हैं, ने यूपी सरकार के सोलिसिटर जनरल की तरफ से अदालत में प्रस्तुत तथ्यों पर संदेह जताया। सिब्बल का कहना था कि ये तथ्य पहले कभी दिखाए नहीं गए, जबकि सोलिसिटर जनरल ने  इस बात से इनकार करते हुए कहा कि ये सब तथ्य दिखाए जा चुके हैं।

अब जो भी हो, पर तथ्यात्मक संदेहों को दूर करने के लिए अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख फ़रवरी तक टाल दी। कपिल सिब्बल तो इसपर तुले हुए थे कि अदालत इस मामले की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव तक टाल दे और चुनाव के बाद सुनवाई की जाए, क्योंकि इसपर राजनीति हो सकती है, मगर अदालत ने उनकी इस मांग को अस्वीकार करते हुए सिर्फ तथ्यों की पूर्ण प्रस्तुति के लिए फ़रवरी तक तारीख बढ़ाई है।

कपिल सिब्बल

अब सवाल यह उठता है कि आखिर कपिल सिब्बल राम मंदिर प्रकरण पर सुनवाई से इतना घबरा क्यों रहे हैं कि अदालत से उसे टालने की गुहार लगा रहे थे ? सवाल यह भी है कि वे अदालत में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील बनकर उतरे थे या कांग्रेस के नेता ? ये सवाल इसलिए उठ रहे, क्योंकि वकील का काम मसलों का कानूनी ढंग से निपटारा करना होता है, उसपर राजनीति होगी या उसका कुछ और प्रभाव होगा, इससे वकील को कोई विशेष मतलब नहीं होना चाहिए।

फिर सिब्बल ने अदालत में इस मसले पर ‘राजनीति होने’ का तर्क कैसे रख दिया। इस तरह तो यही जाहिर होता है कि वे अदालत में वकालत करने नहीं, राजनीति करने उतरे थे। तीन तलाक के मसले पर भी जब वे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से इस अमानवीय प्रथा को ख़त्म न किए जाने पर दलीलें दे रहे थे, तब अदालत में उनके तर्कों के कारण कुछ ऐसे ही सवाल उठे थे। अब एकबार फिर वे सवालों के घेरे में हैं, जिनका जवाब उन्हें देना चाहिए।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रेसवार्ता कर कपिल सिब्बल के इस रवैये को आधार बनाते हुए राहुल गांधी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि एक तरफ राहुल गांधी गुजरात में मंदिरों के दौरे कर रहे, जनेऊधारी हिन्दू बन रहे और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के नेता कपिल सिब्बल राम मंदिर मामले में देरी करा रहे। अमित शाह ने राहुल गांधी से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा, जिसका ऊटपटांग सा जवाब देते हुए कांग्रेस ने भाजपा को मंथरा बता दिया। स्पष्ट है, कांग्रेस से सिब्बल के रुख पर कोई जवाब देते नहीं बन रहा, इसीलिए वो टाल-मटोल कर रही।

अमित शाह

अब कांग्रेस इन सवालों को चाहें जितना टाले, मगर कपिल सिब्बल के वकालती रवैये ने उसपर सवाल उठने का बंदोबस्त तो कर ही दिया है। कांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वो कपिल सिब्बल के अदालती रुख का समर्थन करती है? अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि सिब्बल ऐसे संवेदनशील मसले पर बिना पार्टी नेताओं से राय-मशविरा किए अदालत में सुन्नी वक्क बोर्ड की पैरवी करने उतर पड़े होंगे। कांग्रेस को इन बिन्दुओं पर बिना देरी किए अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए, अन्यथा उसपर सवाल तो उठते ही रहेंगे और कहीं ऐसा न हो कि हिंदुत्व की राजनीति और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष छवि की खींचतान में उसके हाथ कुछ भी न बचे।

कांग्रेस को यह समझ लेना चाहिए कि राम मंदिर जैसे विषय पर संदिग्ध रुख रखते हुए हिंदुत्व की राजनीति नहीं की जा सकती। राम मंदिर निर्माण के प्रश्न पर गोल-मोल बयान देने के बाद अगर वो खुद को सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति के खांचे में ढालने का प्रयत्न करेगी तो इसे सिर्फ उसका राजनीतिक पाखण्ड ही कहा जाएगा। ऐसे में कांग्रेस के लिए उचित होगा कि वो कपिल सिब्बल के अदालती रवैये और राम मंदिर निर्माण पर अपना रुख स्पष्ट करे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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