गुजरात चुनाव : मंदिर दौड़ और जातिवादी गठजोड़ के बावजूद क्यों नहीं जीत सकी कांग्रेस ?

आधिकारिक रूप से कांग्रेस की कमान संभालने के मौके पर राहुल गांधी के निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे। भारतीय जनता पार्टी पर प्रहार करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि एक बार आग लगने के बाद उसे बुझाना बहुत मुश्‍किल होता है। भाजपा ने पूरे देश में आग लगा दी है। उन्‍होंने कहा कि वो आग लगाते हैं, हम आगे बुझाते हैं। राहुल गांधी के बोल कांग्रेसियों को भले ही कर्णप्रिय लगे हों, लेकिन इतिहास को टटोलें तो देश में कभी न बुझने वाली आग लगाने का रिकॉर्ड कांग्रेस के खाते में ही दर्ज है। भारतीय इतिहास में इसके असंख्‍य उदाहरण मिल जाएंगे। कांग्रेस ने शुरू से ही सांप्रदायिक उभार के आगे समर्पण कर आग लगाने का काम किया, जिसका नतीजा अनगिनत सांप्रदायिक दंगों, देश विभाजन और लाखों हिंदुओ-सिखों के कत्‍लेआम के रूप में सामने आया।

कांग्रेस के नवनियुक्‍त अध्‍यक्ष राहुल गांधी की मंदिर दौड़ और जातिवादी नेताओं से गठजोड़ के बावजूद कांग्रेस को गुजरात में पराजय का मुंह देखना पड़ा। 132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी आज इतनी कमजोर हो गई है कि वह गुजरात में अकेले चुनाव में उतरने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाई और हार्दिक पटेल, अल्‍पेश ठाकोर, जिग्‍नेश मेवानी जैसे जातिवादी  नेताओं से गठजोड़ करने पर मजबूर हुई। इसके बावजूद उसकी दाल नहीं गली, क्‍योंकि जनता कांग्रेस की असलियत जान चुकी है। कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्‍या है कि वह अपनी कमियों को दूर न कर भाजपा-मोदी विरोधी रवैया अपनाकर अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाना चाहती है, उसकी लगातार नाकामी की असली वजह भी यही है। 

राहुल गांधी

आधिकारिक रूप से कांग्रेस की कमान संभालने के मौके पर राहुल गांधी के निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे। भारतीय जनता पार्टी पर प्रहार करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि एक बार आग लगने के बाद उसे बुझाना बहुत मुश्‍किल होता है। भाजपा ने पूरे देश में आग लगा दी है। उन्‍होंने कहा कि वो आग लगाते हैं, हम आगे बुझाते हैं। राहुल गांधी के बोल कांग्रेसियों को भले ही कर्णप्रिय लगे हों, लेकिन इतिहास को टटोलें तो देश में कभी न बुझने वाली आग लगाने का रिकॉर्ड कांग्रेस के खाते में ही दर्ज है। भारतीय इतिहास में इसके असंख्‍य उदाहरण मिल जाएंगे। कांग्रेस ने शुरू से ही सांप्रदायिक उभार के आगे समर्पण कर आग लगाने का काम किया, जिसका नतीजा अनगिनत सांप्रदायिक दंगों, देश विभाजन और लाखों हिंदुओ-सिखों के कत्‍लेआम के रूप में सामने आया।

इन वीभत्‍स घटनाओं के बाद भी कांग्रेस का मन नहीं भरा और उसने सेकुलरिज्‍म के नाम पर मुस्‍लिम धर्मांधता, तुष्टिकरण और अलगाववाद को बढ़ावा देना जारी रखा। कांग्रेस की इन कुटिल चालों के खिलाफ जब जनमत बनने लगा, तब उसके दमन के लिए जवाहर लाल नेहरू ने सेक्युलर मार्च निकालकर अपने पक्ष में समर्थन बनाया। अपनी कमियों को छिपाने के लिए कांग्रेसी सरकारों ने इतिहास में छेड़छाड़ किया और वामपंथियों के साथ गठजोड़ करके सच को जनता के सामने नहीं आने दिया।

उदाहरण के लिए 1947 में देश विभाजन के दौरान मानव इतिहास का भीषणतम कत्‍लेआम हुआ लेकिन इतिहास की किताबों में यही पढ़ाया जाता है कि बंटवारा या सत्‍ता का हस्‍तांतरण शांतिपूर्ण ढंग से संपन्‍न हो गया। इसी तरह नेहरू की सरपरस्‍ती के चलते हैदराबाद के निजाम ने हिंदुओं पर बेइंतहा जुल्‍म ढाया। इस दौरान हैदराबाद रियासत में एक भी हिंदू महिला नहीं बची थी, जिसका बलात्‍कार रजाकरों की इस्‍लामी सेना ने न किया हो।

ये तो गनीमत रही कि गृह मंत्री सरदार पटेल ने दूरदर्शिता दिखाते हुए हैदराबाद में सेना भेजकर उसका भारत में विलय करा लिया अन्‍यथा आज हैदराबाद दूसरा कश्‍मीर होता। कश्‍मीर समस्‍या तो पूरी तरह नेहरू से अदूरदर्शिता का नतीजा है, यह बताने की जरूरत नहीं है। इसी तरह इतिहास में कितनी छेड़छाड़ करते हुए मुस्‍लिम आक्रमणकारियों को मसीहा के रूप में प्रस्‍तुत किया गया।

कांग्रेसी नेताओं ने सेकुलरिज्‍म के नाम पर मुसलमानों में धर्मांधता को बढ़ावा देकर उन्हें शिक्षा-रोजगार से दूर किया ताकि उनका वोट बैंक सुरक्षित रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस की सत्‍ता तो बनी रही, लेकिन मुस्‍लिम समुदाय देश की मुख्‍यधारा में पिछड़ता चला गया। धर्मांधता पर कांग्रेस के समर्पण को शाहबानो मामले से समझा जा सकता है।

राजीव गांधी और शाहबानो (सांकेतिक चित्र)

पांच बच्‍चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने तीन तलाक के बाद गुजारा भत्‍ता पाने के लिए कानून की शरण ली। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने अपराध दंड संहिता की धारा 125 के तहत निर्णय दिया जो हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से संबंध रखता हो। न्‍यायालय ने शाहबानो के हक में फैसला देते हुए उसके पूर्व पति मोहम्‍मद खान को गुजारा भत्‍ता देने का आदेश दिया। इस फैसले के बाद देशभर में कांग्रेस पोषित कट्टरपंथियों में उबाल आ गया। तत्‍कालीन राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिया और एक साल के भीतर मुस्‍लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनयम 1986 पारित कर सुप्रीम कोर्ट के प्रगतिशील फैसले को पलट दिया।

जो कांग्रेस शाहबानो मामले में कट्टरंपथियों के सामने घुटने टेक दी थी, वही कांग्रेस आज ट्रिपल तलाक पर मुस्‍लिम महिलाओं के पक्ष में बोल रही है तो इसका कारण है कि मोदी ने 2014 के लोक सभा चुनावों में मुस्‍लिम वोट बैंक ध्‍वस्‍त कर दिया। यदि नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम वोट बैंक ध्‍वस्‍त न किया गया होता, तो आज कांग्रेस ट्रिपल तलाक के पक्ष में आंदोलन कर रही होती।

कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है सत्‍ता। इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है। नेहरूकालीन कांग्रेस में तो थोड़ी-बहुत नैतिकता बची थी, लेकिन उसके बाद के कांग्रेसियों ने सत्‍ता के आगे लोकतांत्रिक मूल्‍यों की तिलांजलि दे दी। इसे पंजाब के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब पंजाब में क्षेत्रीय दल के रूप में अकाली दल का उदय हुआ, तब कांग्रेस के हाथ से पंजाब की सत्‍ता जाती रही। चूंकि कांग्रेस सत्‍ता के बिना जी नहीं सकती, इसलिए उसने अकाली दल के खिलाफ कट्टरपंथी नेता जनरैल सिंह भिंडरावाले की हर तरह से मदद करना शुरू किया। जब भिंडरावाले मजबूत बन गया तब उसने अकाली दल को छोड़कर भारतीय राष्‍ट्र के खिलाफ अलगाववादी आंदोलन छेड़ दिया। इस प्रकार पंजाब समस्‍या को पैदा करने और उसे विकराल बनाने का श्रेय कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्‍ता लोभी राजनीति को जाता है।

सामरिक दृष्‍टि से अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण पूर्वोत्‍तर आज गरीबी, बेकारी, अलगाववाद से जूझ रहा है, तो इसका श्रेय कांग्रेसी सरकारों को जाता है। सत्‍ता के लोभ में कांग्रेस ने स्‍थानीय जनजातियों को मोहरा बनाकर आपसे में लड़ाया। इससे यहां हिंसक संघर्ष आम हो गया। आज समूचा पूर्वोत्‍तर सड़क, रेल, उद्योग, शिक्षा संस्‍थान जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है, तो इसके लिए कांग्रेस की सत्‍तावादी राजनीति और भ्रष्‍टाचार ही जिम्‍मेदार है।

चूंकि कांग्रेसी सरकारें सत्‍ता की राजनीति में लिप्‍त रहीं, इसलिए शिक्षा,  स्‍वास्‍थ्‍य,  रोजगार,  बिजली,  ग्रामीण विकास, पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं को पूरा करने की ओर ध्‍यान ही नहीं दिया गया। इन असुविधाओं से जनता का असंतोष न भड़के इसके लिए दान-दक्षिणा वाली योजनाएं शुरू की गईं, जैसे काम के बदले अनाज योजना, जवाहर रोजगार योजना, मनरेगा। क्‍या यह शर्म की बात नहीं है कि आज जब दुनिया उच्‍च शिक्षा की गुणवत्‍ता पर बहस कर रही है, उस समय हम निरक्षरता से जूझ रहे हैं।

स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस आग बुझाने का नहीं, आग लगाने का काम करती रही है। चूंकि अब उसके सामने भारतीय जनता पार्टी जैसा संगठित राष्‍ट्रवादी राजनीतिक दल है, इसलिए उसकी पुरानी जुगत काम नहीं कर रही है। जालीदार टोपी लगाकर रोजा-इफ्तार देने वाले आज मंदिरों का चक्‍कर काट रहे हैं, तो उसकी वजह भाजपा व मोदी ही हैं। इसीलिए राहुल गांधी भाजपा व मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे हैं।

(लेखक केन्द्रीय सचिवालय में अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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