तीन तलाक बिल : ये देश कट्टरपंथियों के फतवों से नहीं, संविधान से चलेगा!

जो लोग ये समझते थे कि मजहबी उन्माद फैलाकर वो इस सरकार को राजीव गांधी सरकार की ही तरह झुकने पर मजबूर कर देंगे, वो समझ लें कि मोदी सरकार फतवों के आगे झुकने वाली नहीं है। ये देश संविधान से चलेगा, शरीअत से नहीं चलेगा। वो लोग और थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए संसद का सम्मान गिरवी रख दिया था। अब गुरु गोलवलकर की शाखा से निकले लोग लाल किले पर झंडा फहरा रहें हैं, सो फ़तवे अब देश की तकदीर तय नहीं करेंगे।

भारत की संसद का देश की सर्वोच्च विधायिक संस्था होने के नाते देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अपना एक महत्व है, हमारी संसद की आवाज़ पूरे देश की आवाज़ है। एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य में संसद देश की संप्रभुता का प्रतीक है, ये कभी भी किसी बाहरी या आंतरिक दबाव के आगे नहीं झुकती, पर ये विडम्बना ही है कि कांग्रेसी सरकार की वोट बैंक की राजनीती ने कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी विधायिक संस्था को एक बेचारी शाहबानो को गुजारा भत्ते के चंद रुपये न मिलें, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने के लिए विवश कर दिया था। देश की संसद को सांप्रदायिक फतवों की कठपुतली बना दिया गया था, हम कहने को विवश थे कि  –

ये कैसा परिवर्तन था सत्ता के आचरणो में

संसद का सम्मान पड़ा था चरमपंथ के चरणों में

आज इस पर लिखने की आवश्यकता शायद इसलिए पड़ रही है, क्योंकि देश के हालात अब बदलते हुए दिख रहे हैं, मोदी सरकार आज लोकसभा में  मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) आन मैरिज, 2017 विधयेक पास करा कर ट्रिपल तलाक को गैर-जमानती अपराध बनाने की तैयारी कर चुकी है। एक साथ तीन तलाक देने पर तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान भी किया गया है, संसद में इस  विधयेक के पारित होते ही तीन तलाक अपराध हो जाएगा और ये सुप्रीम कोर्ट के २२ अगस्त, २०१७ के फैसले को मजबूत करेगा। इसके साथ ही भारत की संसद द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ यानि शरीअत में संविधान के मूलभूत अधिकारों के अनुरूप सुधार करने की प्रक्रिया का भी आरम्भ हो जाएगा।

सांकेतिक चित्र

इस विषय से जुड़े राजनैतिक पहलू का विश्लेषण करें तो ये आज़ाद भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम है। देश की ये पहली ऐसी सरकार है, जिसने फतवों के आगे सर झुकाने से मना कर दिया है, इस्लामिक चरमपंथियों के आगे झुकने से सरकार ने साफ़ इंकार करते हुए पर्सनल लॉ बोर्ड से लेकर देवबंद तक सबको ये सन्देश दिया है कि देश संविधान से चलेगा, शरीअत से नहीं। सरकार को जहाँ लगेगा कि पर्सनल लॉ का कोई भी प्रावधान लैंगिक भेदभाव वाला है या मूलभूत अधिकारों के विरुद्ध है, सरकार उसमे निश्चित ही दखल देने से नहीं हिचकेगी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शायद लोगों को सरकार का यह कदम साधारण नज़र आ रहा हो, पर जो लोग पर्सनल लॉ की जटिलता को जानते हैं, वो ये समझते होंगे कि ये कदम उठाने के लिए कितनी राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। इसी देश में शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सम्मान को कुचलते हुए संसद को कट्टरपंथियों की कठपुतली बना दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए तत्कालीन केंद्रीय मत्री और कांग्रेस सांसद जियाउररहमान अंसारी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के बारे में आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल करते हुए कहा था – राजीव जी, अगर इन से  कुरान की आयतें बंचवाओगे तो यही हाल होगा

मजहबी कट्टरपंथियों के आगे झुकते हुए संसद के सम्मान से समझौता कर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) आन डाइवोर्स एक्ट, 1986 पारित कर दिया था।  जिस संसद का काम संविधान में प्रदत्त मूलभूत अधिकारों के लिए कानून बनाना है, वही ससद अगर तब मूलभूत अधिकारों से वंचित करने का कानून कट्टरपंथियों के दबाव में बनाने को विवश हो गयी थी, तो इसके पीछे और कुछ नहीं, तत्कालीन सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति थी।

सांकेतिक चित्र

ऐसा नहीं है कि संविधान किसी भी रूप में अदालतों को या संसद को पर्सनल लॉ में दखल देने से रोकता था, बल्कि संविधान आर्टिकल  13  में ये अधिकार अदालत को देता है कि वह मूलभूत अधिकारों के विरुद्ध किसी भी कानून को असंवैधानिक घोषित कर दे। यही नहीं संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूचि की एंट्री 5 में पर्सनल लॉ के किसी भी विषय पर कानून बनाने का अधिकार संविधान देता है, पर अफ़सोस से कहना पड़ रहा है कि पिछली कांग्रेसी सरकारें मुसलमानो को छूने से डरती रही थीं।

और, ये डर आज का नहीं है, इसकी आशंका तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने हिन्दू कोड बिल की चर्चा करते हुए व्यक्त की थी, जब उन्होंने नेहरू से पूछा था, आखिर सरकार मुस्लिमों को छूने से डर क्यों रही है। तब नेहरू ने हालात के आगे बेबसी का हवाला दिया था और वक्त के साथ समान नागरिक संहिता बनाने का विश्वास जताया था, पर उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी राजीव गांधी को जब अवसर मिला, तो उन्होंने जो किया उसका अपना इतिहास है।

वहीं, जब डॉ. मुख़र्जी के राजनैतिक उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी को अवसर मिला तो उन्होंने अपने वैचारिक मार्गदर्शकों के पदचिन्हों पर चलते हुए वोटबैंक की राजनीति की चिंता किये बगैर देश के संविधान को सर्वोपरि मान इस्लामिक कट्टरपंथियों के फतवों को किनारे कर दिया। जो लोग ये समझते थे कि मजहबी उन्माद फैलाकर वो इस सरकार को राजीव गांधी सरकार की ही तरह झुकने पर मजबूर कर देंगे, वो समझ लें कि मोदी सरकार फतवों के आगे झुकने वाली नहीं है। ये देश संविधान से चलेगा, शरीअत से नहीं चलेगा। वो लोग और थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए संसद का सम्मान गिरवी रख दिया था। अब गुरु गोलवलकर की शाखा से निकलकर लोग लाल किले पर झंडा फहरा रहें हैं, सो फ़तवे अब देश की तकदीर तय नहीं करेंगे।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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