मोदी की ‘आसियान नीति’ से बढ़ेगी चीन की चिंता !

महत्वपूर्ण यह है कि आसियान के सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत के निमंत्रण को स्वीकार किया। इसी के साथ एक्ट ईस्ट की नीति कारगर ढंग से आगे बढ़ी है। वस्तुतः यह सब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की  योजना के अनुरूप हुआ। ये बात अलग है कि उन्होने चीन के साथ संबन्ध सामान्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन इस मसले पर वह किसी गलतफहमी में भी नहीं थे। वे जानते थे कि चीन  विश्वास के लायक नहीं है। इसलिए मोदी ने आसियान देशों के साथ रिश्ते सुधारने पर बल दिया। मोदी की इस नीति से न केवल एशिया में चीन के वर्चस्ववादी रुख को धक्का लगेगा बल्कि उसे मौजूदा भारतीय नेतृत्व के कूटनीतिक कौशल का भी अनुमान हो जाएगा।

देश का प्रत्येक गणतंत्र दिवस अपने में खास होता है। लेकिन इस बार का मुख्य समारोह मील के पत्थर की भांति दर्ज होगा। पहले भी मुख्य अतिथि के रूप में विदेशी राष्ट्राध्यक्ष इसमें शामिल होते रहे है। किंतु इस बार  एक सम्पूर्ण क्षेत्रीय संगठन मेहमान बना। आसियान के दस राष्ट्राध्यक्ष, गणतंत्र दिवस में मुख्य समारोह के गवाह बने। यह विदेश नीति का  नायाब प्रयोग था। जिसे पूरी तरह सफल कहा जा सकता है।  इसने आसियान के साथ भारत के  आर्थिक, राजनीतिक, व्यापारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों का नया अध्याय शुरू किया है।

 

महत्वपूर्ण यह है कि सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत के निमंत्रण को स्वीकार किया। इससे समारोह की भव्यता में चार चांद लगे। इसी के साथ एक्ट ईस्ट की नीति कारगर ढंग से आगे बढ़ी है। वस्तुतः यह सब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की  योजना के अनुरूप हुआ। ये बात अलग है कि उन्होने चीन के साथ संबन्ध सामान्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन इस मसले पर वह किसी गलतफहमी में भी नहीं थे। वे जानते थे कि चीन  विश्वास के लायक नहीं है। इसलिए मोदी ने आसियान देशों के साथ रिश्ते सुधारने पर बल दिया। मोदी की इस नीति से न केवल एशिया में चीन के वर्चस्ववादी रुख को धक्का लगेगा बल्कि उसे मौजूदा भारतीय नेतृत्व के कूटनीतिक कौशल का भी अनुमान हो जाएगा।

ऐसा सोचने का पर्याप्त आधार भी था। एक तो इनमें से अनेक देश चीन की विस्तारवादी नीति को पसंद नहीं करते। यह बात आसियान में सामान्य सहमति का विषय बन सकता है। केवल इसके लिए किसी को पहल करने की आवश्यकता थी। मोदी ने साहस के साथ पहल का ये काम किया है।

दूसरी बात, भारत और आसियान देशों  के बीच अति-प्राचीन सामाजिक व सांस्कृतिक रिश्ते रहे हैं। कई आसियान देशों में बौद्ध बहुसंख्यक हैं। सिंगापुर में तो नब्बे प्रतिशत आबादी बौद्धों की है। इसके अलावा इन सभी देशों में रामकथा व्यापक रूप से प्रचलित है। यहां के  राजकीय प्रतीकों में  रामायण से संबंधित चिन्ह मिलते हैं। इंडोनेशिया के  मुसलमान भी रामायण संस्कृति पर विश्वास  करते हैं। उन्होंने उपासना पद्धति बदली है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत को नहीं छोड़ा। रामलीला का  मंचन वहाँ बहुत लोकप्रिय है। ये सब धाँगे भारत और आसियान देशों के  बीच रिश्तों को मजबूत बनाने वाले हैं।

इतना अवश्य है कि नरेंद्र मोदी के पहले इस प्रकार रिश्ते जोड़ने का  प्रयास  नहीं किया गया। भारत की आंतरिक राजनीति में तो इन विषयों को साम्प्रदायिक घोषित होने में भी देर नहीं लगती। इसलिए भी पहले एक सीमा से ज्यादा बढ़ने  का  प्रयास नहीं किया गया। लुक ईस्ट नीति का ऐलान तो किया गया, लेकिन इसमें कारगर प्रगति दिखाई नहीं दी। इसीलिए नरेंद्र मोदी ने लुक ईस्ट की जगह एक्ट  ईस्ट  नीति  बनाई और इसको क्रियान्वित भी किया।

एक्ट ईस्ट  नीति की एक अन्य कारण से भी आवश्यकता थी। वह यह कि आसियान का विस्तार भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सीमा तक हो गया था। म्यामार, कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम आसियान के सदस्य बने थे। इससे आसियान भारत के ज्यादा करीब हो गया। वैसे इस संगठन की स्थापना 1967 में हुई थी। उस समय भारत से इसकी सीमा भी दूर थी। तब इंडोनेशिया,  मलेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड,  सिंगापुर इसके सदस्य थे। ब्रुनेई,  वियतनाम, म्यांमार  बाद में सदस्य बने थे। इसीलिए मोदी ने आसियान को लेकर नीति में  बदलाव किया। 

सीमा की नजदीकी देखते हुए  भू और समुद्री परिवहन को प्रोत्साहन देने के प्रयास किये गए। भारत के सभी आठ पूर्वोत्तर  राज्यों के माध्यम से आपसी सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया। म्यांमार, थाईलैंड, भारत त्रिपक्षीय एक्सप्रेस-वे  के द्वारा पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की राजधानियां आसियान से जुड़ जाएंगी। भारत, नेपाल, बाग्लादेश, भूटान चारों को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण का कार्य जारी है। इसका भी आसियान के साथ परिवहन की दृष्टि से फायदा होगा।

नयी दिल्ली में नरेंद्र मोदी के साथ सभी आसियान देशों  के नेताओं ने आतंकवाद पर भी चिंता जाहिर की। इसके मुकाबले के लिए साझा रणनीति बनाने पर सहमति बनी। समुद्री परिवहन के नियमानुसार आजादी  का विषय भी गंभीर है। चीन समुद्री क्षेत्र में नियम विरुद्ध ढंग से अपना  हस्तक्षेप बढ़ा रहा है। वह कृत्रिम द्वीप और उनमें सैनिक अड्डों का निर्माण कर रहा है। इससे भी इस क्षेत्र के देशों की परेशानी बढ़ी है। ऐसे में समुद्री क्षेत्र में चीन की  दबंगई  के मुकाबले हेतु आसियान देश संयुक्त रूप से प्रयास करने पर सहमत हुए। यह तय हुआ कि समुद्री इलाके के न्याय संगत उपयोग के लिए साझेदारी  बढ़ाई जाएगी। भारत और आसियान के कानून पर आधारित रणनीति बनाई जाएगी।

नरेंद्र मोदी ने  इस अवसर का लाभ उठाया। आसियान में भारत का महत्व और विश्वसनीयता बढ़ी है। भारत-आसियान साझेदारी के  पच्चीस वर्ष,  शिखर सम्मेलन के पन्द्रह वर्ष  और सामरिक साझेदारी के चार  वर्ष का यह कारवां गणतंत्र  दिवस पर आगे बढ़ा। म्यांमार की स्टेट काउंसलर  आन  सांग सूकी,  फिलीपींस के राष्ट्रपति  रोड्रिगो, कम्बोडिया के हुन सेन, मलेशिया के नजीब रजाक,  सिंगापुर के  ली सैन, लाओस के त थोंग लोन सिसोलिथ,  थाईलैंड के  प्रयुत, ब्रूनेई के हसनैन बोलकिया, इंडोनेशिया के जोको  विडोगे ने भारत की सकारात्मक पहल का स्वागत किया।

चीन  की विस्तारवादी नीति के मुकाबले को सभी तैयार दिखाई दिए। क्षेत्रीय सहयोग, सुरक्षा, समुद्री नौवहन, आतंकवाद के मुकाबले पर बनी सहमति का दूरगामी प्रभाव होगा। स्पष्ट है कि भारतीय गणतंत्र दिवस के शानदार अवसर पर भारत और आसियान का कारवां आगे बढ़ा है, जिसका भविष्य में काफी बेहतर प्रभाव सामने आएगा।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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