नए भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने वाला बजट

सरकार के लिए सबसे जरूरी है कि उसकी नीतियों का जमीनी स्तर पर समुचित क्रियान्वयन हो, और इस सरकार की पूर्व नीतियों और योजनाओं के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करने के पश्चात् यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार योजनाओ को जनता तक सीधे पहुंचान में सफ़ल नही रही है। उज्ज्वला, जनधन, सौभाग्य, शौचालय निर्माण, सड़क निर्माण जैसी कई महत्वपूर्ण  योजनायें क्रियान्वयन की कसौटी पर खरी उतरी हैं। ऐसे में, पूरी उम्मीद है कि इस बजट के प्रावधान भी यथार्थ के धरातल पर सफलतापूर्वक साकार होकर नवभारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

आर्थिक समीक्षा आने के पश्चात् यह अंदाज़ा हो गया था कि वित्त मंत्री अरूण जेटली राजनीतिक लाभ-हानि से परे दूरगामी हितों पर आधारित एक विकासोन्मुखी बज़ट प्रस्तुत करेंगे, जिसमें गाँव, कृषि और रोजगार पर ज्यादा फोकस रहेगा। हुआ भी ऐसा ही, वित्त मंत्री अरूण जेटली ने 2018-19 के आम बजट में ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार और स्वास्थ्य को लेकर कई अहम योजनाओं की घोषणाएं की जो आगामी वर्षों में किसान और ग्रामीण जनता के जीवन में सकरात्मक बदलाव ला सकती हैं।

जाहिर है कि जब भी आम बजट आता है, सरकार अपने बजट को सराहती है, प्रशंसा करती है; वहीं विपक्ष बजट को लेकर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया देता है। किन्तु, आम जनता की निगाहें इसपर जरूर रहती है कि बजट में उसके लिए क्या खास है ? अमूमन यह देखने को मिलता है कि बजट को सत्ता पक्ष द्वारा सर्वसमावेशी, समग्र विकास वाला और गाँव-कृषि पर केन्द्रित बजट कहा जाता है, लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि 2018-2019 के बजट को प्रधानमंत्री ने ‘नए भारत’ का बजट कहा है।

गौरतलब है कि 2022 में भारत अपनी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगाठ मनाएगा, इस वर्ष तक प्रधानमंत्री ने एक ऐसे नए भारत की परिकल्पना की है, जिसमें रोजगार, छत, घर-घर शौचालय, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से देश का कोई क्षेत्र या तबका वंचित न रह जाए। इस दिशा में सरकार काम कर रही है। न्यू इण्डिया की परिकल्पना के आलोक में अगर हम इस बजट को समझने का प्रयास करें, तो स्पष्ट होता है कि यह बजट नए भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। बेशक सरकार के समक्ष ग्रामीण रोजगार और किसानों की चुनौतियों से निपटने की राह में तमाम मुश्किलें मौजूद हैं। किन्तु, जो ख़ाका इस बजट में दिख रहा है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाती है, तो इन लक्ष्यों को पूरा किया जा सकता है।

वित्त वर्ष 2018 -19 के लिए वित्त मंत्री ने कई अहम घोषणाएं की हैं मसलन किसानों की आमदनी को दोगुना करना, 42 मेगा फ़ूड पार्क बनाने की बात, सरकार की सफलतम योजनाओं में से एक उज्ज्वला योजना का लक्ष्य पांच करोड़ से बढ़ाकर आठ करोड़ करना आदि। इसके साथ–साथ सरकार ने बीमार स्वास्थ्य तंत्र में नयी जान फूंकने की दिशा में भी कारगर कदम उठाते हुए पांच लाख नए स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने के लिए हेल्थ वेलनेस फंड में 1200 करोड़ की मोटी राशि प्रदान करने का निर्णय लिया है। 24 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की भी घोषणा की गई है। रोजगार का विषय मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है, सरकार ने इस बजट में 70 लाख नई नौकरियों तथा पचास लाख युवाओं को फेलोशिप देने का भी निर्णय लिया है।

किसानों की समस्याओं को दूर करने की पहल  

सरकार ने घाटे का सौदा कर रहे किसानों की पीड़ा को समझते हुए उन्हें उनकी उत्पादन की लागत से कम से कम पचास प्रतिशत अधिक अर्थात लागत से डेढ़ गुना कीमत देने की बात कही है, सरकार का यह फैसला किसानों के लिए बड़ी सौगात के तौर पर देखा जा रहा है। इससे पहले सरकार ने रबी की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत का डेढ़ गुना किया था। इस बजट में सरकार ने खरीफ़ की सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत का डेढ़ गुना करने का फैसला लिया है। एमएसपी का पूरा लाभ किसानों को मिले, सरकार इस दिशा में भी काम कर रही है। इसके लिए नीति आयोग जल्द ही राज्य सरकारों के साथ चर्चा करके एक पुख्ता व्यवस्था तैयार करेगा ताकि किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिल सके।

सांकेतिक चित्र

इस बजट में ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ के तहत भू–जल सिंचाई स्कीम से वंचित 96 जिलों में इसे शुरू करने का सराहनीय फ़ैसला लिया गया है। गौरतलब है कि 96 जिलों में 30% से भी कम पानी खेतों तक पहुँच पाता है। अब योजना के समूचे लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने इसका विस्तार किया है। इस परियोजना के लिए बजट में 2600 करोड़ की धनराशि आवंटित की गई है।

किसानों की सबसे बड़ी समस्या बाजार की रही है। ज्ञात हो कि किसानों में से 86% छोटे और लघु सीमांत श्रेणी के किसान हैं। यह किसान अपने उत्पाद को ऑनलाइन अथवा बड़ी मंडी में बेचने की स्थिति में नहीं होते। सरकार ने इन किसानों की परेशानियों को समझते हुए मौजूदा 22000 ग्रामीण हाटों को ग्रामीण कृषि बाज़ार में बदलने का निर्णय लिया है। सरकार इन बाज़ारों को ई–नैम से जोड़ने की दिशा में काम करेगी। जाहिर है कि किसानों को इससे सीधे तौर पर बाज़ार मिलेगा, जिससे उनका उत्पाद आसानी से व्यापारियों तथा उपभोक्ताओं तक पहुँच जाएगा।

अगर यह योजना सफ़ल होती है, तो ग्रामीण स्तर पर किसानों के लिए तो लाभकारी होगा ही, साथ ही साथ इससे रोजगार सृजन की  संभावनाएं भी पैदा होने की संभावना दिखाई दे रही हैं। जब हाटों को बाज़ार के रूप में विकसित किया जाएगा तो वहाँ लघु एवं कुटीर उद्योगों की भी शुरुआत होगी। किसान खुद अपना उत्पाद तो बेचेगा ही इसके साथ दूकान आदि के जरिये छोटे व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा। बजट में जैविक कृषि को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है।

ज्ञात हो कि टमाटर, प्याज और आलू आदि दैनिक उपयोग की सब्जियां हैं, किन्तु इन्हें उगाने वाले किसान प्राय: कभी मौसम की मार तो कभी अत्यधिक पैदावार की वजह से अपने उत्पाद को कौड़ियो के दाम बेचने को मजबूर हो जाते हैं। इसका एक कारण यह है कि ये सब्जियां मौसमी होती हैं और कम समय में खराब हो जाती हैं। दूसरा कारण कि किसानों के पास इनके स्टोरेज तथा रख–रखाव की व्यवस्था नहीं होती। ऊपर से फसलों का कुछ हिस्सा ऐसा बच जाता है जो न खराब होता है और न ही उपभोक्ता उसे खरीदना चाहता है। इस द्वन्द में किसानों और उपभोक्ताओं में नोक–झोंक भी देखने को मिलती है।

सरकार ने  किसानों की इस समस्या को भी बजट में शामिल करते हुए यह घोषणा की है कि ऑपरेशन फ्लड के तर्ज पर वो “ऑपरेशन ग्रीन” शुरू करेंगी। इसके लिए 500 करोड़ की राशि को मंजूरी दी गयी है। इसके द्वारा फसलों के रख–रखाव अथवा कोल्ड स्टोरेज का निर्माण किया जा सकेगा। गौरतलब है कि किसानों की एक प्रमुख समस्या ऋण को लेकर रही है। इस  दिशा में सरकार ने कृषि क्षेत्र में संस्थागत ऋण को दस लाख करोड़ से बढाते हुए ग्यारह लाख करोड़ करने की घोषणा की है साथ में पट्टाधारी किसानों की दिक्कतों को समझते हुए उन्हें साहूकारों के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए सरकार नीति आयोग और राज्य सरकारों से परामर्श करने के बाद सुलभता से ऋण देने की दिशा में कदम उठाने जा रही है।

ग्रामीण रोजगार

नोटबंदी और जीएसटी के बाद विपक्ष यह आरोप लगातार लगाता रहा है कि सरकार ने ग्रामीण लघु एवं कुटीर उद्योगों को बर्बाद कर दिया है, जिससे रोजगार को लेकर विकराल संकट पैदा हुआ है। इस बजट में सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के ज्यादा से ज्यादा अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। आजीविका की आधारभूत सुविधाओं के सृजन के लिए 14.34 लाख करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। सरकार ने छोटे–छोटे ही सही, किन्तु रोजगार की दिशा में सार्थक कदम इस बजट में उठाए हैं। मसलन, डेयरी उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ–साथ ‘मत्स्य क्रांति अवसंरचना विकास कोष’ तथा पशुपालन क्षेत्र की आवश्यकताओं को समझते हुए आधारभूत सुविधा कोष की स्थापना की है। यह छोटे–छोटे निर्णय निश्चित तौर पर रोजगार पैदा करेंगे।

सरकार ने पशुपालन और मत्स्य पालन को किसान क्रेडिट कार्ड से जोड़ने का निर्णय लिया है। गौरतलब है कि पशुपालन और मत्स्य पालन ग्रामीण स्तर के लोग अपनी रोजी–रोटी के लिए करते हैं, किन्तु पूंजी की कमी के कारण उन्हें यह आइडिया तथा बाज़ार होते हुए भी आय के अभाव के दौर से गुजरना पड़ता है। सरकार, किसान क्रेडिट कार्ड से जैसे ही इन्हें जोड़ेगी ऋण के साथ–साथ सरकारी सब्सिडी का लाभ आसानी से मिलने लगेगा, जिससे वह अपना व्यापार शुरू कर सकेंगे। इसी तरह सरकार ने राष्ट्रीय बाँस मिशन के तहत 1290 करोड़ रूपये का परिव्यय निर्धारित किया है। यह किसानों और ग्रामीणों को शुद्ध लाभ देने वाली योजना है। इसी तरह मुद्रा योजना, गोवर्धन योजना जैसे कई कदम सरकार ने इस बजट में उठाये हैं, जो सीधे तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाएंगे।     

सरकार के लिए सबसे जरूरी है कि उसकी नीतियों का जमीनी स्तर पर समुचित क्रियान्वयन हो, और इस सरकार की पूर्व नीतियों के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करने के पश्चात् यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार योजनाओ को जनता तक सीधे पहुंचान में सफ़ल नही रही है। उज्ज्वला, जनधन, सौभाग्य, शौचालय निर्माण, सड़क निर्माण जैसी कई महत्वपूर्ण  योजनायें क्रियान्वयन की कसौटी पर खरी उतरी हैं। ऐसे में, पूरी उम्मीद है कि इस बजट के प्रावधान भी यथार्थ के धरातल पर सफलतापूर्वक साकार होकर नवभारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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