‘शासन के मोर्चे पर विफल केजरीवाल को टकराव की राजनीति का ही सहारा है’

केजरीवाल की टकराव की राजनीति का ही कुपरिणाम है कि यह सरकार पूर्ण बहुमत में रहने पर भी अबतक जनता के हित की दृष्टि से कोई ढंग का कार्य नहीं कर सकी है। दिल्ली का विकास लगभग अवरुद्ध-सा हुआ पड़ा है। इस सरकार के वादों का हश्र जानने के लिए यह एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा कि जिस जनलोकपाल आन्दोलन के नाम पर केजरीवाल का राजनीतिक वजूद स्थापित हुआ, उसकी चर्चा तक उनकी इस सरकार में नहीं सुनाई देती। ऐसे में, कहना न होगा कि शासन के हर मोर्चे पर विफल केजरीवाल के लिए अब टकराव की राजनीति जवाबदेही से बचने का एक सहारा बन गयी है।

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आए तीन साल का समय हो गया है, इस कालखंड में अगर उनकी सरकार पर नजर डालें तो उसके खाते में काम कम, विवाद ही ज्यादा दिखाई देते हैं। राज्यपाल और केंद्र से टकराव हो या विधायकों का लाभ के पद मामले में अयोग्य सिद्ध होना हो अथवा विपक्षी नेताओं पर उल-जुलूल आरोप लगाकर केजरीवाल का मानहानि के मुकदमों में फँसना हो, ऐसे तमाम मामले हैं जो इस सरकार की छवि को विवादास्पद बनाते हैं। अब ताजा विवाद सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से सम्बंधित है। अंशु प्रकाश ने आप विधायकों पर उनके साथ मारपीट करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अरविन्द केजरीवाल के साथ हो रही मीटिंग में मुख्यमंत्री के सामने ही आप विधायक अमानतुल्ला और प्रकाश जारवाल ने उनके साथ मारपीट की।

इस आरोप के बाद से आइएस अधिकारियों का समूह केजरीवाल सरकार के प्रति बेहद आक्रोश में आ गया है और सरकार को बर्खास्त करने की मांग करने लगा है। मगर, हरबार की तरह इसबार भी आम आदमी पार्टी द्वारा पूरे मामले पर कोई जिम्मेदाराना रुख दिखाने की बजाय इसे केंद्र की साज़िश करार दे दिया गया है। खैर, आरोपी अमानतुल्ला और प्रकाश जारवाल को तो पुलिस ने अपनी हिरासत में ले लिया है, परन्तु आम आदमी पार्टी द्वारा इस पूरे प्रकरण को केंद्र की साज़िश बताना दिखाता है कि केजरीवाल अपनी अंधविरोध और टकराव की राजनीति में कोई परिवर्तन लाने के लिए किसी भी हाल में तैयार नहीं हैं।

दरअसल केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शासन के लिए आवश्यक समन्वय और सहमति की भावना उसमें दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। यह सरकार बिना किसी प्रकार के नियंत्रण में रहे मनमाने ढंग से काम करना चाहती है, परन्तु जब उसकी इस स्वच्छंदतावादी कार्यप्रणाली पर व्यवस्था द्वारा स्थापित विधानों का अंकुश लगता है, तो सरकार के मुखिया अरविन्द केजरीवाल बौखलाकर कभी राज्यपाल तो कभी केंद्र सरकार पर आरोप लगाने लगते हैं।

दरअसल केजरीवाल आज तक इस संवैधानिक सत्य को नहीं स्वीकार पाए हैं कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है। यह देश की राजधानी है, अतः यहाँ की व्यवस्थाएं और विधान अन्य राज्यों से भिन्न हैं। अबतक सभी सरकारें उन्हीके हिसाब से शासन करती आई हैं। हालांकि केजरीवाल से पहले तक दिल्ली में राज्य और केंद्र में अलग-अलग दल की सरकार रहने पर भी कभी किसी प्रकार का कोई टकराव उत्पन्न नहीं हुआ।

उदाहरण के तौर पर उल्लेखनीय होगा कि दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित की सरकार के दौरान जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, तब भी शीला दीक्षित का केंद्र के साथ कोई विवाद नहीं हुआ था। चूंकि, शीला दीक्षित को संविधान द्वारा निर्धारित अपने अधिकारों और मर्यादाओं का पता था तथा वे उन्हीके अंतर्गत रहकर कार्य करती थीं, ऐसे में केंद्र से किसी प्रकार के विवाद के होने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे में, अगर आज केजरीवाल को अपने अधिकार कम लग रहे, तो इसका यही अर्थ निकलता है कि वे काम करना ही नहीं चाहते, बल्कि केवल आरोप-प्रत्यारोप के जरिये अपने जवाबदेही से बचना चाहते हैं।  

केजरीवाल की टकराव की राजनीति का ही कुपरिणाम है कि यह सरकार पूर्ण बहुमत में रहने पर भी अबतक जनता के हित की दृष्टि से कोई ढंग का कार्य नहीं कर सकी है। दिल्ली का विकास लगभग अवरुद्ध-सा हुआ पड़ा है। इस सरकार के वादों का हश्र जानने के लिए यह एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा कि जिस जनलोकपाल आन्दोलन के नाम पर केजरीवाल का राजनीतिक वजूद स्थापित हुआ, उसकी चर्चा तक उनकी इस सरकार में नहीं सुनाई देती। कहना न होगा कि टकराव की राजनीति में डूबे केजरीवाल की यह सरकार अबतक शासन के लगभग सभी मोर्चों पर विफल ही सिद्ध हुई है।

कुल मिलाकर निष्कर्षतः कह सकते हैं कि अन्ना आन्दोलन के दौरान चली भ्रष्टाचार विरोधी लहर और अपने व्यवस्था परिवर्तन के वादे पर सवार होकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने वाले अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद से जो राजनीति की है, वो न केवल किसी भी आन्दोलन के प्रति लोगों में अविश्वास की भावना को जन्म देने वाली है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक भी है। केजरीवाल सुधर जाएं तो ठीक, अन्यथा चुनाव में जनता उनका हिसाब अवश्य करेगी, जिसके संकेत पंजाब आदि राज्यों सहित दिल्ली के निकाय चुनावों में उन्हें मतदाताओं ने दे भी दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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