2019 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की बात किस आधार पर कह रही हैं, सोनिया गांधी !

पिछले दिनों सोनिया गाँधी ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा कि 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सरकार बन रही है, लेकिन क्या सोनिया गांधी हवा में ये बात कह रही हैं ? क्योंकि, राजनीतिक यथार्थ के धरातल पर तो इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती। अगर राहुल के नेतृत्व में वे एक गठबंधन की उम्मीद लगाए बैठी हैं, तो उन्हें पुनः विचार करना चाहिए क्योंकि जिन राहुल गांधी के खाते में सिवा पराजयों के कुछ नहीं है, उनके नेतृत्व में एकजुट होने को विपक्ष शायद ही तैयार होगा।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, जिसके लिए मायावती और अखिलेश यादव ने चुनावी समझौता कर लिया। अच्छा ही किया, लेकिन गजब यह है कि अखिलेश ने ये समझौता करते वक़्त अपने दोस्त राहुल गाँधी को पूछा तक नहीं। उत्तर प्रदेश में राहुल और अखिलेश की जोड़ी सोशल मीडिया पर खूब हिट रही थी. लेकिन साल भर में ऐसा क्या हो गया कि दोस्त, दोस्त न रहा ? ऐसा क्या हो गया कि यूपी विधानसभा के दौरान बने एक भाई ने दूसरे भाई को भुला दिया! आखिर राहुल और अखिलेश, दो युवा चेहरे, जो मिलकर विपक्ष के गठबंधन का नेतृत्व करने वाले थे, उस सपने का क्या हुआ ? आखिर दोनों के बीच आपसी विश्वास क्यों टूट गया ?

इसी मुद्दे पर बहस को आगे बढ़ाते हैं, कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने एक टीवी प्रोग्राम में दावा किया कि कांग्रेस ही 2019 में अगली सरकार बनाने वाली है, सोनिया ने नरेंद्र मोदी पर जबरदस्त आक्षेप लगाते हुए 2019 लोकसभा चुनाव कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ने के लिए विपक्षी दलों का आह्वान किया।

मगर, यह आह्वान करते समय शायद वो यह भूल गईं कि पार्टी की कमान अब उनके बेटे राहुल गाँधी के हाथ है। वो राहुल गाँधी जो उनके भी ‘बॉस’ हैं, जैसा कि उन्होंने पिछले दिनों कहा था। लेकिन, विपक्ष क्या राहुल गांधी को बॉस मानने को तैयार होगा ? ऐसे में, कयास लगाये जा रहे हैं कि विपक्षी एकता के लिए सोनिया को फिर से कहीं कमान संभालनी न पड़ जाए!

क्या नरेंद्र मोदी को 2019 में यह बिखरा विपक्ष चुनौती दे पाएगा ? जैसे जैसे लोकसभा चुनाव 2019  की आहट करीब आ रही है, यह सवाल बलवती होने लगा है कि क्या विपक्ष राहुल गाँधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगा ? विपक्षी पार्टियां जो अब तक महागठबंधन के सपने संजोने में लगी थीं, एकाएक उनमें भी सुगबुगाहट होने लगी है। विपक्ष के बीच यह सजगता इसलिए है, क्योंकि वह येन-केन-प्रकारेण नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रभाव को रोकना या कम करना चाहता है।

उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के एक प्लेटफार्म पर आने का मतलब यही है कि एकदूसरे को किस तरह लाभ पहुँचाया जाए। लेकिन, ख़ास बात यह है कि इस गठबंधन में कांग्रेस को कोई महत्त्व नहीं दिया गया है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस गठबंधन की तुलना सांप और नेवले के इकट्ठे होने से की है, तो इसमें गलत भी क्या है ? मायावती ने खुद कहा है कि यह गठबंधन केवल इसलिए है ताकि इस हाथ दें और उस हाथ लें। मायावती भी अपना वजूद बचाना चाहती हैं और अखिलेश यादव भी राजनीतिक तौर पर जिन्दा रहना चाहते हैं। लेकिन, क्या निजी स्वार्थों पर आधारित ऐसी राजनीति के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन होगा ?

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव तो एक ऐसा गठबंधन चाहते हैं जिसमें कांग्रेस हो ही नहीं, यानि कांग्रेस मुक्त गठबंधन की बात भी चल रही है। कांग्रेस को छोड़ अन्य पार्टियां एक छतरी के नीचे आकर भाजपा से भिड़ेंगी। पिछले दिनों सोनिया गाँधी ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा कि 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सरकार बन रही है, लेकिन क्या सोनिया गांधी हवा में ये बात कह रही हैं ? क्योंकि, राजनीतिक जमीन पर तो इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती। अगर राहुल के नेतृत्व में वे एक गठबंधन की उम्मीद लगाए बैठी हैं, तो उन्हें पुनः विचार करना चाहिए क्योंकि जिन राहुल गांधी के खाते में सिवा पराजयों के कुछ नहीं है, उनके नेतृत्व में एकजुट होने को विपक्ष शायद ही तैयार होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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