श्रीलंका से सीरिया तक दुनिया भर में लड़ क्यों रहे, मुसलमान !

अब देखना है कि श्रीलंका में बौद्धों से पिट रहे मुसलमानों के हक में हमारे सेक्युलरवादी कब बोट क्लब पर कैंडिल मार्च निकालेंगे ? रोहिंग्या मुसलमानों के लिए भारत में भी बहुत सारे सेक्युलरवादी आंसू बहा रहे थे।  ये बात दीगर है कि म्यांमार के सबसे करीबी पड़ोसी और इस्लामिक देश बांग्लादेश ने भी उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया था। उसे भी अच्छी तरह मालूम है ,इनकी हरकतें। बांग्लादेश के एक मंत्री मोहम्मद शहरयार ने कहा था कि, “ये रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं।” जब बांग्लादेश ऐसा कह रहा था, तब भारत में रोहिंग्याओं को शरण देने की वकालत करने वाले हर रोज़ पैदा होते रहे थे।

श्रीलंका में शांति प्रिय बौद्ध पीछे पड़ गए हैं मुसलमानों के। श्रीलंका के कैंडी जिले में इस हिंसा की शुरुआत हुई। मुसलमानों पर आरोप लग रहे हैं कि वे सीधे-सरल बौद्ध धर्मावलंबियों को मुसलमान बनाने की मुहिम चला रहे हैं। इससे पहले भारत के एक अन्य पड़ोसी देश म्यांमार में भी बौद्धों ने मुसलमानों को खदेड़ना चालू कर दिया था। रोहिंग्या मुसलमानों पर आतंकवाद में सीधे तौर पर शामिल होने के आरोप हैं। यही नहीं,  ये रोहिंग्या मुसलमान बौद्ध बच्चियों से बलात्कार के बाद उनकी वीभत्स हत्या कर उनकी अंतड़ियों को निकाल फेंकने से भी गुरेज नहीं करते। म्यांमार में बौद्ध भिक्षु विराथु वैसे तो शांति के उपासक रहे हैं, मगर उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों के सामूहिक क्रूर अत्याचार के खिलाफ म्यांमार में आंतरिक युद्ध छेड़ दिया है।

सांकेतिक चित्र

क्यों दुनिया इनसे परेशान है

दरअसल सवाल ये है कि मुसलमानों से हर जगह शेष दुनिया क्यों परेशान है? दूसरा सवाल ये भी है कि ये आपस में क्यों लड़ते-मरते हैं?  खाड़ी में सऊदी अरब बनाम ईरान के बीच संघर्ष है। वहां पर ही ये मुसलमान इजराईल और यहूदियों से भी लड़ रहे हैं। भारत में भी ये चैन से बैठने को राजी नहीं हैं। इन्हें हर चीज से शिकायत है। ये चिर असंतुष्ट हैं। इन्हें लगता है कि इनके साथ भारत में जुल्म हो रहा है। ऐसा कहते वक्त इन्हें चीन की स्थिति नहीं याद आती जहाँ की सरकार अपने देश में मुसलमानों पर कठोर कार्रवाई कर रही है। चीन में रह रहे मुस्लिम लोगों को रमजान के महीने में रोजा रखने तक की इजाजत नहीं दी गई। चीनी सरकार की तरफ से रमजान में रोजा रखने पर बैन लगा दिया गया है।

यह बैन खासकर उन जगहों के लिए है जहां पर मुस्लिम लोग बहुल संख्या में रहते हैं। इसके साथ ही रमजान के पूरे महीने में खाने-पीने की दुकानों को भी बंद नहीं रखने का फरमान सुनाया गया था। चीन में मुसलमानों के नागरिक अधिकार छीने जाते हैं, पर इस्लामिक देश चुप्पी साधे रहते हैं। सऊदी अरब, ईरान,पाकिस्तान जैसे अपने को खास इस्लामिक देश कहने वाले चीन के खिलाफ जुबान भी नहीं खोलते। इन्हें बस भारत जहाँ इनकी दशा बहुत बेहतर है, में अपने लिए जब-तब खतरा महसूस होते रहता है।

हर तरफ मार-काट

आबादी के लिहाज से इंडोनेशिया, भारत और बांग्लादेश वास्तव में बड़े देश हैं। इन्हें छोड़ दिया जाए तो जिधर मुसलमानों की आबादी अच्छी है, वहां पर मार-काट मची है। ये हर जगह लड़ रहे हैं या इन पर एक्शन हो रहा है। ये शिया-सुन्नी के आधार पर भी एक-दूसरे का खून कर रहे हैं। अब सीरिया की बात करें तो वहां पर मासूम लोग गाजर-मूली की तरह मर रहे हैं। कत्लेआम’ में अभी 32 बच्चे भी मारे गए।

सीरिया में हथियारबंद चरमपंथी मुसलमानों को ही मार रहे हैं।राष्ट्रपति अल असद के खिलाफ पिछले साल से विरोध शुरू होने के बाद से हजारों लोग मार दिए गए।  क्यों 50 से अधिक मुसलमान देश सीरिया में खून-खराबा बंद नहीं करवा पा रहे हैं? इन्हें इस सवाल का जवाब ईमानदारी से खोजना होगा।

बोको हराम (सांकेतिक चित्र)

डरावने इस्लामिक चरमपंथी संगठन

जहां ये आपस में या फिर किसी अन्य पक्ष से नहीं लड़ रहे हैं, वहां इस्लामिक चरमपंथी संगठन मार-काट कर रहे हैं। नाइजीरिया में कट्टरपंथी संगठन बोको हराम के आतंक से सारी दुनिया सहमी हुई है। बोको हराम नाइजीरिया को इस्लामिक देश में तब्दील बनाना चाहता है। बोको हराम का मानना है कि ‘जो भी अल्लाह की कही गई बातों पर अमल नहीं करता है वो पापी है।’ नाइजीरिया में मुस्लिम राष्ट्रपति होने के बावजूद बोको हराम संतुष्ट नहीं है।

अब बात करते हैं ईस्ट अफ्रीकी देश केन्या की। वहां कुछ समय पहले इस्लामिक चरमपंथियों ने दिल-दहलाने वाला खून-खराबा किया था। उनके हमले में वहां बसे कुछ भारतवंशी भी मारे गए थे। वहां हजारों भारतवंशी रहते हैं। पूर्वी अफ्रीका में सर्वाधिक भारतीय केन्या में ही रहते हैं। ये ज्यादातर गुजरात या पंजाब से संबंध रखते हैं। ये 100 सालों से भी अधिक समय से इधर बसे हुए हैं। इऩ्होंने यहां पर रेलवे लाइनें बिछाने से लेकर व्यापार की नींव रखी थी।

अंग्रेजों के दौर में भारतीय केन्या गए थे। केन्या में चरमपंथियों ने चुन-चुनकर गैर-मुस्लिमों को मौत के घाट उतारा था। वे मॉल में मौजूद लोगों से कुरान की आयतों से लेकर इस्लाम से जुड़ी बाकी जानकारियां ले रहे थे। जो उनके सवालों के जवाब नहीं दे पाए, उन्हें बदले में मिली मौत। नैरोबी हमले में घाना के प्रसिद्ध कवि कोफ़ी आवानर भी मारे गए हैं, जो नैरोबी में साहित्य महोत्सव में भाग ले रहे थे।

ये हमलावर चरमपंथी सोमालिया के अल शहाब संगठन के थे। पड़ोसी  पाकिस्तान में चरमपंथी कत्लेआम करते वक्त कुछ देख ही नहीं देखते। ये शिया, अहमदिया, ईसाइयों, हिन्दुओं सबको को तो मार रहे हैं। पर, अफसोस कि पाकिस्तानी सरकार इन पर लगाम नहीं लगा सकी। पाकिस्तान में तो सरकार चरमपंथियों को खाद-पानी देती हैं। चरमपंथी जब चाहते है,जिसको चाहते हैं, मार देते हैं। अलकायदा प्रमुख ओसमा बिल लादेन पाकिस्तान में ही मिला था।

सांकेतिक चित्र

ईरान-इराक युद्ध

कौन भूल सकता है ईरान-इराक युद्ध को। 22 सितंबर, 1980 को शुरू हुआ युद्ध आठ साल तक चला था। इराक़ ने ईरान पर हमले का कारण शत अल अरब नहर पर विवाद को बताया था। ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद ईरान मेंआयतुल्ला खुमैनी का कब्जा हो गया था। वो मानते थे कि सद्दाम हुसैन अपने देश के शिया मुसलमानों को मार रहे हैं। आयतुल्ला ख़ुमैनी चाहते थे कि सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया जाए। इस लिए दोनों इस्लामिक देश भिड़ गए थे। खाड़ी युद्ध में लाखों लोग मारे गए थे। 

खैर, अब देखना है कि श्रीलंका में बौद्धों से पिट रहे मुसलमानों के हक में हमारे सेक्युलरवादी कब बोट क्लब पर कैंडिल मार्च निकालेंगे ? रोहिंग्या मुसलमानों के लिए भारत में भी बहुत सारे सेक्युलरवादी आंसू बहा रहे थे।  ये बात दीगर है कि म्यांमार के सबसे करीबी पड़ोसी और इस्लामिक देश बांग्लादेश ने भी उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया था। उसे भी अच्छी तरह मालूम है ,इनकी हरकतें। बांग्लादेश के एक मंत्री मोहम्मद शहरयार ने कहा था कि, “ये रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं।” पर, भारत में इन्हें शरण देने की वकालत करने वाले हर रोज़ पैदा होते रहे थे। अब देखने वाली बात है कि श्रीलंका के बौद्धों को बुरा-भला कहने वाले हमारे यहां कब सड़कों पर उतरते हैं ? इन बौद्ध धर्मावलंबियों का कसूर ये है कि ये अपने देश के अपराधी प्रवृत्ति के मुसलमानों को कस रहे हैं।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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