भाजपा : एक विचारधारा के फर्श से अर्श तक पहुँचने की संघर्षपूर्ण यात्रा !

भाजपा के लिए शुरूआती दौर संघर्ष का दौर था। अटल और अडवाणी के नेतृत्व में जब भाजपा ने पहली बार चुनाव लड़ा तो उसे 1984 में सिर्फ दो सीटें मिलीं। लेकिन, देश की सोच में कांग्रेस को लेकर बड़ा नकारात्मक भाव तब दिखा, जब 1989 में भाजपा की सीटें बढ़कर 85 हो गईं। उस समय इस यात्रा को “शून्य से शिखर की यात्रा” का नाम दिया गया। लेकिन, तब किसे यह अनुमान रहा होगा कि यह तो महज़ शुरुआत भर है, पार्टी की असली उड़ान अभी शेष है।

आज भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है; 6 अप्रैल, 1980 को भाजपा की स्थापना हुई थी। इन 38 वर्षों की यात्रा को कुछ शब्दों में पिरोना आसान नहीं होगा, क्योंकि इतना बड़ा संगठन कभी भी एक व्यक्ति की मेहनत का नतीजा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं के खून और पसीने का योगदान होता है, जिनके चेहरे कभी अख़बारों में या टेलीविज़न के परदे पर नहीं नज़र आते। भाजपा की संघर्ष-यात्रा को समझने के लिए हमें आज़ादी के सालों में वापस जाना होगा।

आज़ादी के शुरूआती दो-तीन दशकों तक भारत में ज़्यादातर एकदलीय शासन ही रहा। कहने भर को कांग्रेस एक लोकतान्त्रिक और सेक्युलर पार्टी थी, लेकिन इस पर नेहरू खानदान का दबदबा था। 1970 के दशक तक भी यह सोचना लगभग नामुमकिन ही था कि कोई अन्य पार्टी कभी कांग्रेस का विकल्प बन सकेगी।

1970-80 के दशक में देश की सियासत में एक गुणात्मक बदलाव देखने को मिला, जब जनता पार्टी और जनसंघ ने कांग्रेस की विचारधारा के समानांतर लोगों को एक वैचारिक मंच दिया। 1980 में विपक्ष की इस वैचारिक एकता में भटकाव आया, जब जनता पार्टी और जनसंघ ने वैचारिक कारणों से अलग-अलग रास्ता अख्तियार कर लिया। उस वक़्त जनता दल के खेमे की तरफ से दबाव था कि संघ से रिश्ता तोड़ लें, लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि एक बार अगर स्वयंसेवक बन गए, तो हमेशा के लिए बन गए।

जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

लाल कृष्ण आडवाणी ने तब लिखा था, “जनसंघ का जनता परिवार से निष्कासन एक राहत की तरह आया, क्योंकि, इसने एक ऐसी पार्टी को आगे बढ़ने का मौका दिया जो क्षेत्रीय दलों  के प्रमुखों की निजी महत्वाकांक्षाओं के दलदल में जकड़ गई थी।” कहते हैं कि कभी-कभी अलगाव से भी विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। चुनौतियां ही अस्तित्व का संबल बनती हैं। जनता पार्टी से अलग हुए जनसंघ के साथ भी यही हुआ, जब 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक नई पार्टी का गठन हुआ, जिसका नाम रखा गया – भारतीय जनता पार्टी।   

आज़ादी के इतने सालों बाद भी, कांग्रेस ने जो सपने दिखाए थे, उनको पूरा करने में वो नाकाम ही दिख रही थी। देश में से गरीबी नहीं मिट सकी थी। दलितों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया था। अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण बढ़ता जा रहा था। औद्योगिक विकास में गति नहीं थी। कृषि क्षेत्र का विकास नहीं हो रहा था। किसानों की हालत साल दर साल बद से बदतर होती गयी थी।

भाजपा के लिए शुरूआती दौर संघर्ष का था। अटल और अडवाणी के नेतृत्व में जब भाजपा ने पहली बार चुनाव लड़ा तो उसे 1984 में सिर्फ दो सीटें मिलीं। लेकिन, देश की सोच में कांग्रेस को लेकर बड़ा नकारात्मक भाव तब दिखा, जब 1989 में भाजपा की सीटें बढ़कर 85 हो गईं। उस समय इस यात्रा को “शून्य से शिखर की यात्रा” का नाम दिया गया। लेकिन, तब शायद ही किसीको यह अनुमान रहा होगा कि यह तो महज़ शुरुआत भर थी, पार्टी की असली उड़ान अभी शेष थी। देश की सोच और सामाजिक संरचना में बदलाव परिलक्षित हो रहा था, जिसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा धीरे-धीरे केंद्रीय राजनीति में अपने लिए मुकम्मल जगह बनाने लगी।

भाजपा के देशव्यापी प्रसार का मुख्य कारण यह रहा कि इसने अपने साथ अलग-अलग पार्टियों और लोगों को जोड़ना शुरू किया। यही नहीं, भाजपा ने कांग्रेस शासन के दौरान व्याप्त भ्रष्टाचार को निशाना बनाया और जनता के सामने विचारधारा आधारित एक वैकल्पिक राजनीति को प्रस्तुत किया। 1984 के चुनाव की पराजय से  मिली सीख ने भाजपा को भारतीय राजनीति में पैर ज़माने के लिए और मजबूत मनोबल प्रदान किया। वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने जनता के सामने एक ऐसी पार्टी की छवि पेश की जो सर्वसमावेशी और मानवतावादी थी तथा सबको साथ लेकर चलने वाली थी। वहीं दूसरी तरफ, वर्ष 1989 में लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा निकाली।

इस यात्रा में भाजपा के साथ वैसे लोग खड़े हुए जो कांग्रेस द्वारा दी गई हिंदुत्व की परिभाषा से सहमत नहीं थे। आरएसएस के मार्गदर्शन में भाजपा ने अपनी सियासी जमीन पूरे देश भर में तैयार कर ली। 1990 तक आते-आते रामजन्मभूमि को लेकर देश भर में वैचारिक मंथन उफान पर था। भाजपा अब तक कई राज्यों में अपनी धमक दिखा चुकी थी। यही नहीं, भाजपा के साथ कई और राजनीतिक दल एक ही वैचारिक धरातल पर खड़े थे। इसमें मुख्यतया शिवसेना का नाम लेना प्रासंगिक है, जिसका महाराष्ट्र के एक बड़े हिस्से पर गहरा प्रभाव था।

खैर, 1984 में शुरू हुई राजनीतिक यात्रा 1996 में मंजिल पर पहुंची जब भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाने में सफल रही। 1996 से लेकर 2004 तक वाजपेयी कुछ-कुछ अंतरालों पर तीन बार प्रधानमंत्री बने। पहली बार 13 दिन के लिए, फिर 13 महीने के लिए और और अंततः पांच साल के लिए। वाजपेयी सत्ता में पांच साल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

भाजपा के लिए ‘एनडीए’ का प्रयोग कई मायनों में ऐतिहासिक महत्त्व का था, जब इस गठबंधन में वाजपेयी के नेतृत्व के अन्दर दर्जन भर पार्टियाँ शामिल हो गईं। इस प्रयोग ने इस मिथक को गलत साबित कर दिया कि भाजपा के साथ अधिक पार्टियां खड़ी नहीं हो सकतीं। जो लोग यह कह रहे थे कि भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है, वो उसके साथ मंच पर खड़े नज़र आए। भाजपा ने हमेशा एक अलग पार्टी की छवि जनता के सामने रखी, राजीव गाँधी के शासन के दौरान जब बोफोर्स घोटाला सामने आया, भाजपा ने देश के सामने जाकर सच बताया।

‘मुस्लिम विमेंस बिल’ को लेकर भी जब कांग्रेस पार्टी देश में अलगाव की राजनीति कर रही थी, भारतीय जनता पार्टी ने देश की सोच को एक सूत्र में पिरोया। जब भी देश में आपदा आयी आरएसएस ने उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, लातूर में आया भूकंप उसमें से एक था, जिसने संघ की मानवतावादी छवि लोगों के बीच स्थापित की।

भाजपा की विचारधारा की बात करें तो इसके मूल में सबसे अहम् तथ्य ये था कि विकास की धारा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुँचाया जाए। भाजपा ने अपने एजेंडे में पांच विषय सूचीबद्ध किये थे, जिनमें प्रमुख थे – राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकीकरण, लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता, अन्त्योदय की अवधारणा, मूल्य आधारित राजनीति और वास्तविक धर्मनिरपेक्षता। धर्मनिरपेक्षता को लेकर भी उस वक़्त काफी बहस चली, लेकिन भाजपा के लिए इसका मतलब था – सभी धर्मों का एकीकरण, सभी भारतीयों को एक सूत्र में पिरोना।

2004 में वाजपेयी सरकार गिर गई, नतीजतन 2004 से लेकर 2014 तक कांग्रेस ने जोड़-तोड़ की राजनीति अपनाकर सरकार चला ली। इन 10 सालों में जिस कदर भ्रष्टाचार का बोलबोला रहा, केन्द्रीय स्तर बड़े-बड़े  घोटाले सामने आए, उसने कांग्रेस के प्रति जनता में आक्रोश का संचार किया और निस्संदेह भाजपा के लिए जीत ला रास्ता आसान कर दिया।

गुजरात की राजनीति से निकलकर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देश की राजनीति में एक नया इतिहास लिख दिया। अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में कहें तो “न भूतो न भविष्यति” – देश की सियासत में ऐसा कुछ हो गया, जिसके बारे में सोचा जाना संभव नहीं था। मोदी की ईमानदार व विकासपरक छवि की लोकप्रियता और अमित शाह की मेहनत रंग लाए। भाजपा 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई। पार्टी ने कच्छ से लेकर कोहिमा तक जीत का परचम लहरा दिया। आज 22 राज्यों में भाजपा और उसके द्वारा समर्थित दलों की सरकार है। देश के 70 फीसद से ज्यादा बड़े हिस्से पर भाजपा का भगवा परचम लहरा रहा है।

जीतना अगर लक्ष्य है, तो भाजपा ने विजयध्वज फहरा दिया है, लेकिन सफलता सिर्फ इतने तक सीमित नहीं है। इन चुनावी विजयों के साथ-साथ ही अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा का सांगठनिक विस्तार भी हुआ है। हालांकि इन सफलताओं के बीच भाजपा को यह भान भी बना हुआ है कि बड़ी सफलता, बड़ा उत्तरदायित्व भी लाती है। पार्टी इसी भावना के साथ लोक-कल्याण के मार्ग पर गतिशील है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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