अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था को चोट पहुँचा रही कांग्रेस !

जिस तरह से कांग्रेस अपने मनमाफिक परिणाम नहीं आने पर हर संवैधानिक संस्था और पद की विश्वसनीयता को चोट पहुंचा रही है, वह लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। कड़ी दर कड़ी समझें तो चुनाव आयोग, प्रधानमंत्री कार्यालय, रिजर्व बैंक और अंत में सबसे स्वतंत्र और लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करना कांग्रेस की वैचारिक दशा-दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। महाभियोग पर कांग्रेस के मौजूदा महाप्रलाप ने उसके इतिहास के पन्नों में एक और काला अध्याय जोड़ दिया है।

सात विपक्षी दलों द्वारा मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ़ दिए गए महाभियोग नोटिस को उपराष्ट्रपति ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि मुख्य न्यायाधीश के ऊपर लगाए गए आरोप निराधार और कल्पना पर आधारित हैं। उपराष्ट्रपति की यह तल्ख़ टिप्पणी, यह बताने के लिए काफ़ी है कि कांग्रेस ने  किस तरह से अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए महाभियोग जैसे अति-गंभीर विषय पर अगम्भीरता दिखाई है।

महाभियोग को अस्वीकार करने की 22 वजहें उपराष्ट्रपति ने बताई हैं। दस पेज के इस फ़ैसले में उपराष्ट्रपति ने कुछ महत्वपूर्ण तर्क भी दिए हैं। पहला, सभी पांचो आरोपों पर गौर करने के बाद ये पाया गया कि यह सुप्रीम कोर्ट का अंदरूनी मामला है, ऐसे में महाभियोग के लिए यह आरोप स्वीकार नहीं किये जायेंगे। दूसरा, रोस्टर बंटवारा भी मुख्य न्यायधीश का अधिकार है और वह मास्टर ऑफ़ रोस्टर होते हैं। इस तरह के आरोपों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ठेस पहुंचती है।

तीसरा, इस तरह के प्रस्ताव के लिए एक संसदीय परंपरा है। राज्यसभा के सदस्यों की हैंडबुक के पैराग्राफ 2.2 में इसका उल्लेख है, जिसके तहत इस तरह के नोटिस को पब्लिक करने की अनुमति नहीं है, किन्तु सदस्यों ने इसका भी ख्याल नहीं रखा और नोटिस देने के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कंटेंट को साझा किया जो कि संसदीय परंपरा के विरूद्ध था। नोटिस देने वाले सांसद खुद भी अनिश्चित हैं, जो उनके संदेह, अनुमान और मान्यताएं जैसे शब्दों के प्रयोग से मालूम होता है। इस तरह उपराष्ट्रपति ने महाभियोग नोटिस को खारिज़ करने से पहले ऐसे ही 22 तर्कपूर्ण कारण बताए  हैं।

अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस ने देश के मुख्य न्यायाधीश पर ऐसे गंभीर आरोप लगाने से पहले तथ्यों की जाँच कर, पर्याप्त प्रमाण क्यों नही जुटाए? इससे शक की गुंजाइश बढ़ जाती है कि कांग्रेस जानबूझकर न्यायपालिका की साख को धूमिल कर रही है। उपराष्ट्रपति के तर्कों को समझने के बाद सहजता से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कांग्रेस महाभियोग के बहाने न्यायपालिका पर दबाव बनाने का विफ़ल प्रयास कर रही है।

ऐसा नहीं है कि उपराष्ट्रपति ने बहुत जल्दबाजी में अथवा केवल अपने विवेक के आधार पर महाभियोग नोटिस को अस्वीकार करने का निर्णय लिया हो। उपराष्ट्रपति ने कानूनविदों, राज्यसभा और लोकसभा के पूर्व महासचिवों, पूर्व विधि अधिकारियों और विधि आयोग के सदस्यों समेत प्राख्यात न्यायविदों से चर्चा और विमर्श कर मुद्दे की गंभीरता को समझने के बाद  ही यह निणर्य लिया है।

जैसे ही यह फ़ैसला आया, कांग्रेस ने बिना देर लगाए उपराष्ट्रपति के निर्णय को अवैध करार दे दिया और इस फ़ैसले के खिलाफ़ सर्वोच्च  न्यायालय जाने की बात कह डाली। यह हास्यास्पद है कि जो कांग्रेस न्यायपालिका पर भरोसा नहीं कर रही और उसकी साख पर चोट पहुंचाने के लिए हर स्तर पर प्रयास कर रही है, फिर उसी न्यायपालिका की शरण में जाने की बात भी कर रही है। यह न्यायपालिका का मजाक बनाने जैसा ही है।

कांग्रेस का यह गैर-जिम्मेदाराना रवैया और घातकीय प्रवृत्ति देश की लोकतंत्रिक प्रणाली को किस कदर नुकसान पहुँचाने वाली है, इसका अंदाज़ा शायद कांग्रेस को नहीं है। इसमें कोई दोराय नहीं कि कांग्रेस इस समय अपने आस्तित्व को बचाने की जंग लड़ रही है। ऐसे में, वह अपनी राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए किसी भी स्तर पर, किसी भी ढंग से जाने से हिचक नहीं रही है। सरकार और नरेंद्र मोदी को बदनाम करने के एकमात्र लक्ष्य को हांसिल करने के लिए कांग्रेस ने जो रास्ता अख्तियार किया है, वह लोकतांत्रिक प्रणाली में अस्वीकार्य है। इसका खामियाजा आने वाले समय में कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा।

कांग्रेस को सत्ता से गये अभी मात्र चार साल हुए हैं, किन्तु जिस तरह से वो तिलमिलाई नजर आ रही है, उससे यह अंजादा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस सब कुछ अपने अनुसार चाहती है, जिसकी वह अभ्यस्त भी रही है; लेकिन, अब उसके अधिकार सिमट कर रह गए हैं। जनता हर चुनाव में कांग्रेस को खारिज़ कर रही है। चुनाव में मिल रही हार के अलावा जिस तरह से “हिन्दू आतंकवाद’, ‘राम काल्पनिक हैं’, माले गावं ब्लास्ट, मक्का मस्जिद ब्लास्ट, तीन तलाक, जस्टिस लोया जैसे मामलों में कांग्रेस की जो वैचारिक हार हुई है, वह कांग्रेस की छटपटाहट और बौखलाहट का मुख्य कारण है।

कांग्रेस को यह प्रतीत होने लगा है कि उसके राजनीतिक वजूद पर संकट गहराता जा रहा है। अप्रासंगिकता के दौर से गुजर रही कांग्रेस ने जब यह देखा कि चुनाव आयोग समेत कई स्वायत्त संस्थाओं पर हमले के बावजूद उसकों पराजय का सामना करना पड़ रहा है, तो उसनें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग लाकर अपनी वैचारिक हार का बदला लेने का कुत्सित प्रयास किया। कांग्रेस को इस बात की भी जानकारी है कि दीपक मिश्रा चंद महीनों में रिटायर होने वालें है, किन्तु इसी बीच कई अहम फैसलों की सुनवाई उनकी बेंच को करना है। इनमें राम मंदिर मामले की सुनवाई सबसे प्रमुख है।

गौरलतब है कि इस केस की सुनवाई टालने की बेतुकी दलील पर मुख्य न्यायधीश ने कपिल सिब्बल को कड़ी फटकार लगाई थी। दूसरा सबसे अहम मामला राजनीतिक सुधार को लेकर है। इसके साथ–साथ सांसदों–विधायकों के न्यायालय में प्रेक्टिस करने पर रोक लगाने संबंधी याचिका की सुनवाई भी मुख्य न्यायधीश की बेंच को करना है। संयोगवश यह तीनों मामले कांग्रेस के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। इससे कांग्रेस घबराई हुई है। परिणामस्वरूप, वह इस तरह के रास्ते को चुनकर न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश के साथ–साथ अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति करने की कोशिश भी कर रही है।

जिस तरह से कांग्रेस अपने मनमाफिक परिणाम नहीं आने पर हर संवैधानिक संस्था और पद की विश्वसनीयता को चोट पहुंचा रही है, वह लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। कड़ी दर कड़ी समझें तो चुनाव आयोग, प्रधानमंत्री कार्यालय, रिजर्व बैंक और अंत में सबसे स्वतंत्र और लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करना कांग्रेस की वैचारिक दशा-दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस द्वारा इस तरह के राजनीतिक दुष्प्रयोग आने वाले भविष्य के लिए एक ऐसी कुप्रथा की शुरुआत कर रहे, जो समय–समय पर देश के लोकतांत्रिक मूल्यों एवं लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन करने वाली होगी। महाभियोग पर कांग्रेस के महाप्रलाप ने उसके इतिहास के पन्नों में एक और काला अध्याय जोड़ दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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