जिन्ना प्रकरण में कांग्रेस पर भी उठते हैं सवाल !

कांग्रेस बेशक अय्यर के जिन्ना की प्रशंसा करने वाले बयान से अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करे, मगर सवाल फिर भी उसपर उठते ही हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर दशकों से कैसे लगी हुई है ? देश में सर्वाधिक समय तक सत्तारूढ़ रहने वाली कांग्रेस के शासन में कभी ये विषय सामने क्यों नहीं आया ? तस्वीर क्यों नहीं हटवाई गयी ? कांग्रेस को इन सवालों का जवाब देते हुए जिन्ना पर अपना रुख साफ़ करना चाहिए।

भारत के इतिहास में जो कुछ हो गया, उसे हम और आप चाह कर भी हटा नहीं सकते।  मोहम्मद अली जिन्ना वैसे शख्स हैं, जिनके लिए भारत में कोई जगह नहीं है। भारत में अधिसंख्य लोग जिन्ना को भारत के बँटवारे के लिए जिम्मेदार मानते हैं और यही वास्तविकता भी है। उन्होंने मज़हब के नाम पर दंगे करवाए और भारत के टुकड़े करवाए। जिन्ना के इन्हीं कारनामों की वजह से भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ और बेइंतहा कत्लेआम भी हुआ।

सभी जानते हैं कि 1913 में जिन्ना कांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम लीग बनाकर मुसलमानों के रहनुमा बन गए और धर्म के आधार पर एक अलग देश बनाने की मांग अंग्रेजों के सामने रख दी। जिन्ना ने वर्ष 1920 में असहयोग आन्दोलन का विरोध किया। जिन्ना और गाँधी के रास्ते अलग होते चले गए, आगे जब भारत देश की आज़ादी के सपने पूरे होते दिख रहे थे, तो वह मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग करने में लग गए।

जिन्ना का कहनाम था कि भारत में मुसलमानों के साथ अन्याय होगा और अंत में गृहयुद्ध फैल जायेगा। 1940 के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर यह कहा गया कि मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। मौलाना अब्बुल कलाम आजाद जैसे नेताओं और जमाते-इस्लामी जैसे संगठनों ने इसकी कड़ी निन्दा की। जिन्ना ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की मदद की थी और 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया था। 1944 में गांधी जी ने मुंबई में जिन्ना से चौदह बार बातचीत की, लेकिन हल कुछ भी न निकला।

16 अगस्त, 1946 को लोग एक काले दिन के तौर पर जानते हैं, जब जिन्ना ने ‘सीधी कार्यवाही’ यानी कि डायरेक्ट एक्शन का नारा देकर मुसलमानों को दंगा करने के लिए भड़काया। हिंसा की आंधी में पूरा देश धू-धू कर जलने लगा, कोलकाता शहर के अन्दर ही 6 हज़ार से ज्यादा बेक़सूर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों का क़त्ल कर दिया गया। आखिरकार, जिन्ना ने लाशों के ढेर पर पाकिस्तान की मांग मनवा ली। अनाधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस विभाजन में कम से कम 20 लाख हिन्दू, मुसलमानों और सिखों की मौत हुई।   

जिन्ना की तस्वीर पर कैसे मचा विवाद ?

दरअसल जिन्ना की तस्वीर पर विवाद पिछले दिनों अलीगढ़ के भाजपा  विधायक सतीश गौतम के एक पत्र के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर तारिक से पूछा कि आखिर जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में क्यों लगी हुई है ? जिन्ना भारत के बंटवारे के मुख्य खलनायक माने जाते हैं, और आये दिनों पाकिस्तान की हरकतों से साफ़ हो जाता है कि पाकिस्तान की नियत भारत के प्रति कभी दोस्ताना नहीं हो सकती है। यह पत्र जब मीडिया में आया तो पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया, जो लोग जिन्ना की तस्वीर का समर्थन कर रहे थे, वह पुलिस से उलझे, और पुलिस को आखिरकर लाठी चलानी पड़ी।

जिन्ना पर रुख साफ़ करे कांग्रेस

जिन्ना प्रकरण पर विवाद अभी चल ही रहा था कि कांग्रेस के निलंबित नेता मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान में जाकर अपना जिन्ना प्रेम जाहिर कर दिया। पाकिस्तान में एक कार्यक्रम में पहुँचे अय्यर ने जिन्ना को कायदे आजम बताया और उनकी तस्वीर हटाने की मांग का विरोध किया।  मणिशंकर अय्यर के इस  बयान पर चुटकी लेते हुए भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने ट्विट किया, ‘कांग्रेस और पाकिस्तान के बीच गजब का तालमेल है। कल पाकिस्तान सरकार ने टीपू सुल्तान को याद किया, जिनकी जयंती कांग्रेस मनाती है और आज मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना की तारीफ़ कर दी।..’   

कांग्रेस बेशक अय्यर के इस बयान से अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करे, मगर सवाल फिर भी उसपर उठते ही हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर दशकों से कैसे लगी हुई है ? देश में सर्वाधिक समय तक सत्तारूढ़ रहने वाली कांग्रेस के शासन में कभी ये विषय सामने क्यों नहीं आया ? तस्वीर क्यों नहीं हटवाई गयी ? कांग्रेस का  जिन्ना पर ये गोलमोल रवैया गहरे सवाल खड़े करता है। कांग्रेस को  इन सवालों का जवाब देते हुए जिन्ना पर अपना रुख साफ़ करना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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