पंचायत चुनाव : हिंसा के सहारे कबतक अपनी राजनीतिक जमीन बचा पाएंगी, ममता !

स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल की ममता सरकार खुलेआम चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ध्वस्त करती जा रही है। अपनी राजनीतिक जमीन को सुरक्षित रखने के लिए हिंसा का सहारा लेना, लोकतंत्र में कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। लोकतंत्र में जनता का मन जीतकर  और जनता का हितसाधन करके सत्ता प्राप्त की जाती है, अतः हिंसा के जरिये भय पैदा करके राजनीतिक जमीन बचा लेने के मुगालते में यदि ममता हैं, तो उन्हें इससे बाहर आ जाना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में सोमवार को संपन्न हुए पंचायत चुनाव में कई लोगों की जानें गयीं और बहुत से लोग घायल भी हो गए। हालांकि ममता बनर्जी ने कहा कि राज्य में छह से ज्यादा लोगों की मौत नहीं हुई है, लेकिन चुनाव पूर्व और चुनाव के दौरान की हिंसा को अगर देखा जाए तो पंचायत चुनाव के दौरान कम से कम अब तक 50 लोगों की मौत हो चुकी है, यह आंकड़े 2013 में हुए चुनाव से कहीं ज्यादा भयावह हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। यही नहीं, सियासी हलकों में इस हिंसा के बाद बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने की मांग भी उठ रही है। वैसे तो पंचायत चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हिंसा होती रही है, लेकिन इस बार ममता बनर्जी सरकार की शह ने इसे  जिस तरह से रक्तरंजित कर दिया, उसके बाद स्थिति तो वाकई में राष्ट्रपति शासन जैसी ही बनती जा रही है।

संभवतः राज्य सरकार की शह से स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने मिलकर हिंसा को इस स्तर पर पहुंचा दिया, जहाँ विपक्षी पार्टियों के लिए चुनावी मैदान में खड़ा होना भी संभव न हो सके। हिंसा की इस राजनीति को शायद तृणमूल कांग्रेस ने बिना चुनाव लड़े ही जीत हासिल कर लेने का उपाय मान लिया है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि तृणमूल कांग्रेस में लड़कर चुनाव जीतने की कुव्वत नहीं बची है। 

ममता बनर्जी

तृणमूल कांग्रेस ने शायद तय कर लिया है कि अगर लोकतान्त्रिक तरीकों से विपक्ष का मुकाबला नहीं कर सकते, तो खून-ख़राब इस तरह बरपाया जाए कि विपक्ष मैदान में उतरने की हिम्मत ही न जुटा सके। ममता बनर्जी ने पंचायत चुनावों में जो किया, वह सालों तक सीपीएम करती रही थी कि विपक्षी पार्टी के लोगों को न तो मतदान करने दो और न ही उन्हें नामांकन पत्र ही भरने दो। इस बार ममता सरकार की शह से प्रेरित हिंसा का प्रभाव ऐसा रहा कि उसके 34 फीसद लोग निर्विरोध विजयी हो गए, मगर, ईवीएम के बहाने लोकतंत्र की हत्या का बेमतलब राग गाने वाली गैंग इस खौफ की राजनीति पर सन्नाटा मार गयी है।

इस हिंसा के लिए अगर ममता बनर्जी पर सवाल उठ रहे तो वो यूँ ही नहीं है, क्योंकि देखा जाए तो यह हिंसा ज़्यादातर उन इलाकों में देखने को मिली, जहाँ तृणमूल कांग्रेस का थोड़ा भी विरोध हो रहा था। ऐसा ही कुछ ट्रेंड उन दिनों में था, जब पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट शासन था। ममता के डर की वजह यह है कि जिस तरह से भाजपा ने त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंका, कहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का भी वही हश्र न हो। इसी भय के कारण शायद वे राजनीतिक हिंसा को शह देकर पंचायत चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने का प्रयास शुरू कर रही हैं।   

माना जा रहा कि लोकसभा चुनाव से पहले ममता इस कदर खौफ पैदा करना चाहती हैं कि भाजपा सहित अन्य दलों के लोग बंगाल में खुद को चुनाव के लिए तैयार ही न कर पाएं। सूत्रों का कहना है कि सरकार की तरफ से अराजक तत्वों को पूरी शह दी गयी। साथ ही, चुनाव से पहले राज्य सरकार और प्रशासन की तरफ से उन इलाकों की पहचान जान-बूझकर नहीं की गई, जिन इलाकों में पहले से ही हिंसा की सम्भावना व्यक्त की गई थी।

इस बारे में कोलकाता से प्रकाशित टेलीग्राफ अख़बार ने लिखा है कि चुनाव पूर्व ज़रूरी तैयारियों को रोकने के लिए कहीं न कहीं राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग जिम्मेदार है, जो नहीं चाहते थे कि संभावित हिंसा को रोकने के लिए कदम उठाए जाएं, जिनकी तरफ से हिंसा रोकने के तमाम  वादे किये गए।

स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल की ममता सरकार खुलेआम चुनाव जैसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को हिंसा के द्वारा ध्वस्त करती जा रही है। अपनी राजनीतिक जमीन को सुरक्षित रखने के लिए हिंसा का सहारा लेना, लोकतंत्र में कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। लोकतंत्र में जनता का मन जीतकर  और जनता का हितसाधन करके सत्ता प्राप्त की जाती है, अतः हिंसा के द्वारा भय पैदा करके राजनीतिक जमीन बचा लेने के मुगालते से ममता को बाहर आ जाना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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