’18 साल की उम्र में बीजेपी के लिए काम करोगे तो यही हश्र होगा’

त्रिलोचन महतो का मात्र एक कसूर था कि वह भाजपा का कार्यकर्ता था तथा तृणमूल के विचारों का विरोधी था। ऐसा पहली बार नहीं है कि बंगाल में भाजपा के किसी कार्यकर्ता की हत्या राजनीतिक विरोधी होने के नाते सत्ता का आश्रय पाए गुंडों ने की हो, लेकिन इस हत्या में हत्यारों ने जो निर्ममता दिखाई है, वह बंगाल में जनतंत्र की डरावनी तस्वीर को प्रदर्शित करती है।

भारत जैसे विविधताओं से भरे महान लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक हत्याओं के मामले जब सामने आते हैं, तो निश्चित तौर पर यह लोकतंत्र को मुंह चिढ़ाने वाली बात होती है। राजनीतिक हत्याएं न केवल भारत के विचार–विनिमय  की संस्कृति को चोट पहुँचाने वाला विषय हैं, बल्कि यह सोचने पर मज़बूर भी करती हैं कि राजनीति में अब सियासी भाईचारे की जगह बची है अथवा नहीं ?

रक्तरंजित राजनीति के लिए दो राज्य हमेशा चर्चा के केंद्र में रहते हैं। पहला पश्चिम बंगाल और दूसरा केरल, इनमें केरल में वामपंथी सरकार की शह से विपरीत विचारधारा के लोगों की हत्याएं होती रहती हैं, तो पश्चिम बंगाल में पहले वामपंथी शासन में राजनीतिक हिंसा को प्रश्रय मिला और उसके बाद अब तृणमूल कांग्रेस के शासन में भी वही संस्कृति फल-फूल रही है। उसी का परिणाम है कि आज रक्तरंजित राजनीति की घटनाएँ लगातार बढ़ रहीं तथा अपने स्वरूप को और भी क्रूरता  के साथ पेश करने में नहीं हिचक रहीं।

ममता बनर्जी

बंगाल की सियासत में राजनीतिक हिंसा कोई नहीं बात नहीं है, किन्तु जब वामपंथी शासन से बंगाल को मुक्ति मिली थी, तब ऐसा अनुमान लगाया गया था कि ममता बनर्जी के आने से यह कुप्रथा समाप्त होगी अथवा कमी आएगी लेकिन, आज ममता बनर्जी के शासनकाल में जिस तरह से हिंसा, आराजकता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन हो रहा है, वह किसी भी सूरतेहाल में लोकतंत्र के लिए घातक है।

बंगाल में भाजपा के बढ़ते जनसमर्थन से बौखलाई ममता तानाशाही के रास्ते पर हैं और अपने विरोधी  विचारों के लोगों पर जुल्म करने से परहेज़ नहीं कर रहीं हैं। बंगाल के पंचायत चुनाव में लोकतंत्र की कैसे धज्जियां ममता सरकार ने उड़ाई यह पूरे देश ने देखा।

राजनीति में विरोध जायज है, राजनीतिक दल आरोप–प्रत्यारोप के जरिये विपक्षी दल को पराजित करने की रणनीति अपनाते हैं, जो लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुकूल भी है। किन्तु, अब बंगाल में स्थिति कितनी भयावह है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सारी हदों को पार करते हुए भाजपा के एक दलित युवा कार्यकर्ता, जिसने अपने जीवन के मात्र 18 बसंत ही देखे थे, की क्रूरता की सारी सीमाओं को लांघते हुए हत्या कर डाली।

त्रिलोचन महतो का मात्र एक कसूर था कि वह भाजपा का कार्यकर्ता था तथा तृणमूल के विचारों का विरोधी था। ऐसा पहली बार नहीं है कि बंगाल में भाजपा के किसी कार्यकर्ता की हत्या राजनीतिक विरोधी होने के नाते सत्ता का आश्रय पाए गुंडों ने की हो, लेकिन इस हत्या में हत्यारों ने जो निर्ममता दिखाई है, वह बंगाल में जनतंत्र की डरावनी तस्वीर को प्रदर्शित करती है।

इस दलित युवा की न केवल निर्मम हत्या की गई बल्कि उसके शव को पेड़ में लटका दिया गया और उसके टीशर्ट व हत्या की  जगह से बरामद एक नोट पर लिखा है कि “18 साल की उम्र में बीजेपी के लिए काम करोगे तो यही हश्र होगा यह नफ़रत से भरी हुई राजनीति का वह रक्तरंजित चेहरा है, जिसका श्रृंगार ममता बनर्जी के संरक्षण में हो रहा है।

शव की पीठ और बरामद नोट पर लिखा था – ‘बीजेपी के लिए काम करोगे तो यही हश्र होगा’ (साभार : Navoday Times)

गौरतलब है कि हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनाव में ममता के अलोकतांत्रिक और सरकारी शक्ति के दुरुपयोग के बावजूद भाजपा की जन स्वीकार्यता बढ़ी है। त्रिलोचन ने इस पंचायत चुनाव में सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया था, जिससे वह तृणमूल के गुंडों के निशाने पर था। इस हत्या का सबसे प्रमुख कारण  बलरामपुर में बीजेपी की हुई जीत को बताया जा रहा है।

बहरहाल, बंगाल में जो राजनीतिक स्थिति बन रही है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ममता एक अहंकारी एवं तानाशाही किस्म की मुख्यमंत्री के रूप में खुद को सिद्ध करती जा रहीं हैं, जो कभी संघवाद को चुनौती दे देती हैं, तो कभी लोकतंत्र को अंगूठा दिखाने से भी परहेज़ नहीं करतीं।

दलित युवक त्रिलोचन महतों की राजनीतिक हत्या पर ममता सरकार के साथ–साथ दलित हितैषी का स्वांग रचाने वाले  झंडाबरदारों की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। आज देश के राजनीतिक माहौल में कुकुरमुत्ते की तरह कथित दलित नेताओं का उभार हो रहा है, जो दलित हितैषी तथा सामाजिक न्याय के नाम लोगों को गुमराह करके किसी भी तरह से दलित समाज को हिंसा के आन्दोलन में धकेलना चाहते हैं। वे लोग योजनाबद्ध ढंग से दलितों को बरगला रहे हैं, किन्तु त्रिलोचन महतों की हत्या पर उनकी खमोशी यह साबित करती है कि यह कबीला केवल एक विचारधारा के विरोध के लिए खड़ा है, उन्हें दलितों के सम्मान, भलाई से कोई वास्ता नहीं है बल्कि वह दलितों का इस्तेमाल अपनी राजनीति को साधने के लिए कर रहें हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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