एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने दिया ‘सिक्योर’ मंत्र

शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मलेन को संबोधित करते हुए मोदी ने एससीओ को अलग ढंग से परिभाषित करते हुए इस मंच को एक नया विजन दिया। उन्होंने एससीओ की अवधारणा को ‘सिक्योर’ शब्द का प्रयोग करते हुए समझाया कि एस यानि सिक्योरिटी फॉर सिटीजन, ई यानि इकनोमिक डेवलपमेंट, सी यानि कनेक्टिविटी इन द रीज़न, यू यानि यूनिटी, आर यानि रेस्पेक्ट फॉर सोवरेनिटी एंड इंटीग्रिटी और ई यानि एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन। इस तरह बड़ी सहजता से प्रधानमंत्री ने विश्व के सामने उभरी प्रमुख चुनौतियों के समाधान को सिक्योर शब्द के माध्यम से समझा दिया।

बीते 10 जून को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के 18वें सम्मेलन में शिरकत की। जाहिर है कि सबको इस बात का इंतजार था कि इस मंच से भारत कौन से मुद्दे को प्रमुखता से उठाता है। क्योंकि इस मंच पर पाकिस्तान और चीन के राष्ट्र प्रमुख भी मौजूद थे, वहीं दूसरी तरफ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी इसका हिस्सा थे।

शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मलेन को संबोधित करते हुए मोदी ने एससीओ को अलग ढंग से परिभाषित करते हुए इस मंच को एक नया विजन दिया। उन्होंने एससीओ की अवधारणा को ‘सिक्योर’ शब्द का प्रयोग करते हुए समझाया कि एस यानि सिक्योरिटी फॉर सिटीजन, ई यानि इकनोमिक डेवलपमेंट, सी यानि कनेक्टिविटी इन द रीज़न, यू यानि यूनिटी, आर यानि रेस्पेक्ट फॉर सोवरेनिटी एंड इंटीग्रिटी और ई यानि एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन। इस तरह बड़ी सहजता से प्रधानमंत्री ने विश्व के सामने उभरी प्रमुख चुनौतियों के समाधान को सिक्योर शब्द के माध्यम से समझा दिया।

मोदी ने बताया कि किस तरह भारत का जोर अपने पड़ोसियों के साथ संवाद और जुड़ाव पर रहता है। अपने संबोधन में आतंकवाद का जिक्र करते हुए पीएम ने यह साफ़ तौर पर स्पष्ट किया कि भारत की सुरक्षा के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं किया जायेगा। उन्होंने अफगानिस्तान में शांति के लिए किये गये मजबूत प्रयासों के लिए राष्ट्रपति अशरफ गनी की भी प्रशंसा की। साथ ही आतंकवाद को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अफगानिस्तान आतंक के प्रभाव का दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है।

ज्ञात हो कि भारत को पिछले वर्ष ही इस संगठन में बतौर सदस्य शामिल किया गया है। 2005  तक एससीओ में भारत पर्यवेक्षक के तौर पर इससे जुड़ा हुआ था। लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक स्तर पर भारत की साख को हर स्तर पर मजबूत करने में लगे हों, तब लाजिमी है कि भारत को एससीओ की सदस्यता मिलनी ही थी। वर्तमान समय में एससीओ  के पूर्ण सदस्यों में भारत, चीन, रूस, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, पाकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। अफगानिस्तान, मंगोलिया, इरान और बेलारूस पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) के तौर पर कार्य करते हैं।

पहली बार एससीओ का हिस्सा बनने और भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने को लेकर प्रधानमंत्री काफी उत्साहित दिखे। इस सम्मेलन का मकसद तमाम वैश्विक मुद्दों को आगे बढ़ाने के साथ  ही वैश्विक आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ लड़ाई में आपसी सहयोग को मजबूती देने का है। ध्यान दें तो आज भारत आतंकवाद से लड़ने जैसे गंभीर मसले पर समूचे विश्व का नेतृत्व कर रहा है। प्रधानमंत्री वैश्विक आतंकवाद के बढ़ते खतरे एवं समाधान को लेकर वैश्विक नेताओं को आगाह करते रहते हैं। 

सम्मेलन में हिस्सा लेने से पहले मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से द्विपक्षीय वार्ता भी हुई। इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने करीब एक महीने पहले वुहान में हुई अनौपचारिक बैठक में लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन पर भी चर्चा की और दोनों देशों के मुख्य समझौतों पर सहमती बनी। ब्रह्मपुत्र नदी से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने और चावल के निर्यात के नियम सरल बनाने को लेकर समझौतों पर दस्तखत भी हुए।

मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल के दौरान यह दोनों नेताओं के बीच 14वीं मुलाकात है। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई वार्ता के बाद कहा कि भारत और चीन के मजबूत संबंधों से दुनिया को स्थिरता और शांति मिलेगी। भारत हमेशा ही विश्व स्तर पर सभी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। पीएम मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन में भी कहा कि एससीओ के देश और पड़ोसियों के साथ संबंध हमारी प्राथमिकता में हैं।

नरेंद्र मोदी केवल राजनय की नहीं, अपितु सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं सभ्यतागत चीजों को इंगित करते हुए पर्यटन की संभावनाओं पर भी विस्तृत चर्चा करते हैं। एससीओ में भी प्रधानमंत्री ने पर्यटन एवं आतंकवाद को केंद्र में रखकर अपनी बात रखी। गौरतलब है कि ‘शंघाई सहयोग संगठन’ (एससीओ) में चीन और रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश होगा और निश्चित तौर पर भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगा। एससीओ जो कि इस समय दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है। जाहिर है, इससे जुड़ने से भारत को फ़ायदा होगा और भारत अपने हितों से जुड़े मुद्दों को सही रूप में उठा पाएगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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