हर शर्मिंदगी से ऊपर उठ चुके हैं केजरीवाल !

धरना प्रकरण पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्देश, उपराज्यपाल का स्पष्टीकरण, भारतीय प्रशासनिक सेवा के स्थानीय संगठन की मांग और बयान, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का सुझाव आदि सभी तथ्य अरविंद केजरीवाल को शर्मिंदा करने वाले थे। कोई और होता तो कम से कम उच्च न्यायालय की टिप्पणी के फौरन बाद ही धरना समाप्त कर देता। लेकिन अरविंद केजरीवाल  को अब ऐसी कोई शर्मिन्दगी प्रभावित नहीं करती। वह इन सब बातों से ऊपर उठ चुके हैं।

दिल्ली को राहत मिली कि उसके मुख्यमंत्री नौ दिन के वातानुकूलित धरने के बाद सकुशल वापस आ गए। इतिहास में जिस प्रकार राजा जंग या शिकार के लिए जाया करते थे, वैसे ही अरविंद केजरीवाल धरने पर चले जाते हैं। उनके साथ धरने पर बैठे उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया और मंत्री सत्येद्र जैन अस्पताल में पहुंच गए थे। खैर, अरविंद केजरीवाल ने फजीहत होती देख समझदारी दिखाई और धरना समाप्त किया।

इस प्रकरण पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्देश, उपराज्यपाल का स्पष्टीकरण, भारतीय प्रशासनिक सेवा के स्थानीय संगठन की मांग और बयान, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का सुझाव आदि सभी तथ्य अरविंद केजरीवाल को शर्मिंदा करने वाले थे। कोई और होता तो कम से कम उच्च न्यायालय की टिप्पणी के फौरन बाद ही धरना समाप्त कर देता। लेकिन अरविंद केजरीवाल  को अब ऐसी कोई शर्मिन्दगी प्रभावित नहीं करती। वह इन सब बातों से ऊपर उठ चुके हैं। 

पूरे प्रकरण से यही स्पष्ट होता है कि आप ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए अराजकता का सहारा लिया। सच्चाई यह है कि उनकी सरकार दिल्ली की मौजूदा स्थिति में कार्य ही नहीं करना चाहती। वस्तुतः उन्होंने इतने वादे कर दिए हैं, जिन्हें किसी पूर्ण राज्य के लिए पूरा करना भी आसान नहीं होता। दिल्ली तो मात्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है। वहाँ जमीन है नहीं, जबकि केजरीवाल जाने किस सोच के तहत प्रत्येक मोहल्ले में स्कूल-अस्पताल खुलवाने के वादा किये बैठे हैं। सरकार पर भ्रष्टाचार, अपने परिजनों को अनुचित ढंग से लाभ पहुंचाने के आरोप हैं। केजरीवाल खुद भी इससे अछूते नहीं हैं।

हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि आप इस तरह से किसी के दफ्तर या घर में जबरदस्ती जाकर धरने पर नहीं बैठ सकते हैं। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मसले का हल निकालना जरूरी है। कोर्ट ने इस मामले में आइएएस एसोसिएशन को भी एक पक्ष बनाया है। इस मामले में दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता और बीजेपी विधायक विजेंदर गुप्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

केजरीवाल ने यह मांग की थी कि आईएएस अधिकारियों को उनकी हड़ताल खत्म करने का निर्देश दिया जाए और चार महीनों से जो अधिकारी काम अटकाकर रखे हुए हैं, उन्हें सजा दी जाए। उन्होंने उपराज्यपाल से यह भी कहा था  कि उनकी सरकार की ‘डोर स्टेप डिलीवरी ऑफ राशन’ योजना के प्रस्ताव को मंजूरी दी जाए। उपराज्यपाल के स्पष्टीकरण से जाहिर हुआ कि केजरीवाल दोनों मुद्दों पर गलत बयानी कर रहे थे। 

उपराज्यपाल के अनुसार राशन योजना के प्रस्ताव से जुड़ी फाइल नागरिक आपूर्ति मंत्री इमरान हुसैन के पास करीब तीन महीने से पड़ी हुई है। दूसरा यह कि अधिकारी हड़ताल पर नहीं थे। उनकी नाराजगी आप की अराजकता को लेकर थी। इसे केजरीवाल को ही दूर करना था। लेकिन केजरीवाल हंगामा बनाने के लिए धरना दे रहे थे। प्रधानमंत्री और उप राज्यपाल से कथित हड़ताल समाप्त करवाने की गुहार लगा रहे थे।

दरअसल केजरीवाल सरकार से नाराज अधिकारियों की  पहली मांग है कि  उन्नीस फरवरी की घटना के लिए मुख्यमंत्री माफ़ी मांगें और दूसरी मांग है कि सरकार अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें ताकि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो। उन्नीस फरवरी को आप विधायको ने मुख्यमंत्री की उपस्थिति में मुख्यसचिव और अन्य अधिकारियों के साथ जम कर अभद्रता की थी। वैसे आप नेताओं को केजरीवाल ने ऐसे ही संस्कार दिए हैं। इसके पहले केजरीवाल से वार्ता करने गए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी से भी ऐसी ही अभद्रता की गई थी। उस समय भी केजरीवाल घटनास्थल पर मौजूद थे।

आइएएस एसोसिएशन द्वारा दिल्ली सरकार में काम करते हुए हो रही परेशानी बयान की गयी थी। केजरीवाल ने इस पर अपना पैंतरा बदला था। अधिकारियों को अपने परिवार का सदस्य बताया, उन्हें सुरक्षा देने का वादा किया।  बयान में कहा गया है कि उन्नीस  फरवरी के पहले भी अफसरों के साथ मंत्रियों और विधायकों की ओर से अभद्रता होती थी। लेकिन उस दिन की अराजकता ने हद पार कर दी थी।

यह सही है कि अधिकारियों में असुरक्षा की भावना थी, जिसे दूर करने की मुख्यमंत्री ने कोई पहल नहीं की। अधिकारियों का कहना है कि जहां तक बात प्रस्ताव, योजना और उनके क्रियान्वयन, फाइलों के निस्तारण आदि की है, तो वे यह सभी कार्य कर रहे थे। ऐसे में उनके विरोध को हड़ताल नहीं कहा जा सकता। 

पन्द्रह वर्ष तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित ने ठीक कहा कि ये सब काम न करने के बहाने हैं। केजरीवाल दिल्ली की संवैधानिक स्थिति नहीं समझेंगे तो उनकी सहायता कोई नहीं कर सकता। दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है, जो केंद्र द्वारा चलाया जाता है। हम भी काम और सहयोग कर चुके हैं। मैं भी पन्द्रह वर्ष  तक सत्ता में रही। लेकिन केंद्र और उपराज्यपाल को लेकर कोई विवाद सामने नहीं आया। जनता अच्छी सरकार चाहती है गलतियां नहीं। जब आप काम नहीं करना चाहते हैं तो इस तरह की बातें करते हैं।

केजरीवाल की अति महत्वकांक्षा भी उनकी परेशानी की वजह है। अलग ढंग की ईमानदार राजनीति करने के प्रति न उनकी दिलचस्पी है, न उनमें इसकी क्षमता है। वह दिल्ली में अपने निर्धारित कर्तव्यों के निर्वाह में विफल रहे है। केजरीवाल के चक्कर में चार राज्यों के मुख्यमंत्री भी अपनी फजीहत कर बैठे। ये दिल्ली आए थे नीति आयोग में अपने प्रदेश की भागीदारी करने, लेकिन इनकी चर्चा केवल केजरीवाल के समर्थन में पत्रकार वार्ता के लिए हुई। लगा कि इन मुख्यमंत्रियों के लिए अपने प्रदेशों के आर्थिक विकास से ज्यादा महत्वपूर्ण  केजरीवाल का नाटकीय धरना था।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने शनिवार को केजरीवाल के समर्थन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसके बाद रविवार को नीति अयोग की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की थी और जल्द गतिरोध खत्म करने के लिए दखल देने को कहा था।

नीति आयोग की महत्वपूर्ण बैठक में जब अन्य मुख्यमंत्री अपने राज्यों की भलाई के लिए प्रस्ताव कर रहे थे, उस समय केजरीवाल और चार मुख्यमंत्री राजनीति कर रहे थे। इनको अपने प्रदेश की कोई चिंता ही नहीं थी। केजरीवाल अराजक तरीकों से अपनी नाकामी छिपाने का प्रयास करते हैं। लेकिन उनकी यह असलियत अब सामने आ चुकी है। यही कारण था कि उन्हें इस बार दिल्ली के लोगों की सहानुभूति और समर्थन नहीं मिला।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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