अंग्रेजों और वामपंथियों के ऐतिहासिक झूठों को राखीगढ़ी-सिनौली की खोजों ने किया बेनकाब

राखीगढ़ी और सिनौली की खोजों से प्राप्त तथ्य कई पश्चिमी इतिहासकारों तथा उन्हिकी लीक का अनुसरण करने वाले भारतीय वामपंथी इतिहासकारों द्वारा निरूपित इतिहास को सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं। उल्लेखनीय होगा कि रथ और आर्य आगमन सिद्धांत दोनों एकदूसरे से सम्बन्ध रखते हैं, क्योंकि इतिहासकारों का ऐसा दावा रहा है कि आर्य रथों पर चढ़कर आए थे और भारत की स्थानीय सभ्यता को कुचलकर यहीं बस गए। यह भी कहा जाता है कि आर्यों के आगमन से पूर्व देश में बैलगाड़ी थी, रथ नहीं था। इन दावों पर प्रश्न तो पहले भी उठते रहे हैं, परन्तु वर्तमान खोजों के आईने में देखने पर तो ये पूरी तरह से बचकाने ही प्रतीत होते हैं।

जून, 2018 का महीना इस बात के लिए याद किया जाएगा कि इस महीने में ऐसी दो ऐतिहासिक खोजें सामने आईं, जिन्होंने भारत के प्राचीन इतिहास पर लिखी गयी अबतक की तमाम पुस्तकों को बेमानी साबित कर दिया है। हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी गाँव और उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली गाँव से सम्बंधित इन दोनों ऐतिहासिक खोजों ने वैदिक युग, आर्य आगमन सिद्धांत आदि विषयों को लेकर स्थापित मान्यताओं पर गहरे प्रश्नचिन्ह तो खड़े किए ही हैं, साथ ही देश के बहुसंख्यक जनमानस के भीतर उपस्थित भारतीय अतीत के गौरव-बोध को तथ्यों का ठोस धरातल भी प्रदान किया है।   

राखीगढ़ी की खोज

राखीगढ़ी में इतिहास संबंधी शोध कार्य लम्बे समय से चल रहा है, जिसमें अनेक प्रकार के ऐतिहासिक अवशेष सामने आते रहे हैं। इन अवशेषों के आधार पर हरियाणा के इस गाँव को इतिहासकारों द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता से सम्बंधित बताया जाता है। परन्तु, अभी पिछले दिनों यहाँ से प्राप्त अवशेषों की डीएनए जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक़, डीएनए के परीक्षण से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि भारतीय सभ्यता में पिछले दस-बारह हजार वर्षों के दौरान बहुत बड़ी संख्या में लोगों का कहीं कोई बाहरी आवागमन नहीं हुआ है। हाँ, डीएनए में कुछ मामूली विदेशी अंश अवश्य प्राप्त हुए हैं, लेकिन वे सिर्फ सामान्य आवागमन का ही संकेत देते हैं।

हालांकि अभी इस जांच की रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई है, परन्तु राखीगढ़ी में उत्खनन कार्य का नेतृत्व करने वाले पुरातत्वविद प्रोफेसर वसंत शिंदे ने इस विषय में इकॉनोमिक टाइम्स से बातचीत में बताया है कि इन जांच परिणामों के बाद आर्य आगमन सिद्धांत में कोई दम नहीं रह जाता। प्रोफेसर शिंदे के अनुसार, पुरातात्विक सामग्री से यह भी स्पष्ट होता है कि वैदिक युग पूरी तरह से स्वदेशी था।  

क्या है आर्य आगमन सिद्धांत ?

दरअसल अबतक विवादित रूप से ही सही, ऐसी ऐतिहासिक मान्यता रही है कि आर्य इस देश के मूल निवासी नहीं थे, बल्कि वे मध्य एशिया से भारत आए थे और भारत के मूल निवासी द्रविड़ों को खदेड़कर दक्षिण में पहुंचा दिए। इसके बाद वे यहीं बस गए। हालांकि आर्यों के आगमन के कालखंड को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, परन्तु ब्रिटिश हुकूमत के चहेते विद्वान् मैक्समूलर द्वारा निर्धारित लगभग 1500 से 2000 वर्ष ईसा पूर्व को ही आर्यों के आगमन काल के रूप में ज्यादातर इतिहासकारों द्वारा स्वीकृति दी गयी है।

सिनौली से प्राप्त रथ के अवशेष [साभार : जी न्यूज]

सिनौली के रथ पर सवार स्वर्णिम इतिहास

बहरहाल, राखीगढ़ी के बाद अब हम सिनौली की खोज पर आते हैं। यूपी के सिनौली गाँव में 2005 में 116 शव मिले थे, जिन्हें सिंधु घाटी संभ्यता का बताया जाता है। अब इसी स्थान के निकट खुदाई करने पर प्राचीन सभ्यता के अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं। दरअसल गत फ़रवरी में गाँव के एक किसान को अपने खेत में खुदाई करते हुए कुछ पुरानी चीजें मिलीं, जिसकी सूचना पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को दी गयी। इसके बाद विभाग ने सम्बंधित स्थान की खुदाई की योजना बनाई।

खुदाई शुरू करने के बाद आश्चर्यजनक यह रहा कि जमीन के महज ढाई फीट नीचे से ही प्राचीन वस्तुएं मिलनी शुरू हो गयीं। इस खुदाई में दो रथ, राजसी ताबूत, तलवार, मुकुट सहित 7 लोगों के शव भी प्राप्त हुए हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार इन सब वस्तुओं का कालखंड लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व का है।

इन अवशेषों में सबसे महत्वपूर्ण दो रथों को माना जा रहा है, क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप में रथ पाए जाने की यह पहली घटना है। इससे पूर्व रथों के अवशेष केवल मेसोपोटामिया, मिस्त्र और जार्जिया की सभ्यताओं में ही पाए गए थे, जिसके आधार पर इतिहासकारों ने यह मान लिया था कि भारतीय सभ्यता में रथ जैसी कोई चीज नहीं थी।

सवालों के घेरे में इतिहासकार

उपर्युक्त दोनों खोजों से प्राप्त तथ्य कई पश्चिमी इतिहासकारों तथा उन्हिकी लीक का अनुसरण करने वाले भारतीय इतिहासकारों द्वारा निरूपित इतिहास को सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं। उल्लेखनीय होगा कि रथ और आर्य आगमन सिद्धांत दोनों एकदूसरे से सम्बन्ध रखते हैं, क्योंकि इतिहासकारों का ऐसा दावा रहा है कि आर्य रथों पर चढ़कर आए थे और भारत की स्थानीय सभ्यता को कुचलकर यहीं बस गए। यह भी कहा जाता है कि आर्यों के आगमन से पूर्व देश में बैलगाड़ी थी, रथ नहीं था। इन दावों पर प्रश्न तो पहले भी उठते रहे हैं, परन्तु वर्तमान खोजों के आईने में देखने पर तो ये पूरी तरह से बचकाने ही प्रतीत होते हैं।

पहली चीज कि यदि 1500 से 2000 वर्ष ईसा पूर्व आर्यों ने आकर भारत के स्थानीय लोगों को खदेड़ दिया था, तो फिर राखीगढ़ी की खोज में दस-बारह हजार वर्षों में भारतीय सभ्यता में किसी बाहरी आवागमन व संघर्ष के चिन्ह न मिलने की बात कैसे सामने आ गयी ? दूसरी चीज कि यदि रथ आर्य लेकर आए थे, तो फिर सिनौली में पांच हजार वर्ष पूर्व का जो रथ मिला है, वो कैसा और किसका है ? इन सवालों का इतिहासकारों के पास फिलहाल कोई जवाब नहीं है।  

सांकेतिक चित्र

कोई कल्पना नहीं है महाभारत

सिनौली के अवशेषों के तार महाभारत युग से भी जोड़े जा रहे हैं। कालखंड के हिसाब से इन अवशेषों के महाभारतकालीन होने का ही संकेत मिलता है। दरअसल आर्यभट्ट सहित कई अन्य विद्वानों के मतानुसार महाभारत के युद्ध का कालखंड लगभग 3100 वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है, जो कि आज की तारीख से पांच हजार वर्ष पूर्व हो जाता है।

सिनौली से प्राप्त अवशेषों के भी पांच हजार वर्ष पूर्व के ही होने की बात कही जा रही है, अतः इसका सम्बन्ध महाभारत काल से जुड़ना स्वाभाविक ही है। दूसरी चीज कि महाभारत में रथ, हाथी, घोड़ा, राज्य, शासन, सेना, शस्त्रास्त्र  आदि से भरीपूरी और समृद्ध सभ्यता की कथा कही गयी है। 

महाभारत एक काव्य ग्रन्थ है, इस कारण निस्संदेह उसके वर्णनों में कुछ हद तक काव्यात्मक अतिश्योक्ति की भी उपस्थिति दिखती है। लेकिन, इस आधार पर उसके समग्र वर्णन को काल्पनिक कथा कहने वालों का मुंह बंद करने का काम सिनौली के ये अवशेष कर रहे हैं। हालांकि अभी इन अवशेषों का सम्बन्ध आधिकारिक रूप से महाभारत काल से जुड़े होने का दावा किसीने नहीं किया है, परन्तु पूरी संभावना है कि देर-सबेर इनके तार किसी न किसी प्रकार महाभारत युग से अवश्य जुड़ेंगे।

ऐतिहासिक भ्रांतियों के कारण

भारतीय इतिहास में जो उपर्युक्त भ्रांतियां पैदा हुई हैं, इसका कारण भारत का पिछले लगभग हजार वर्षों तक विदेशी आक्रान्ताओं के दमनकारी शासन में रहना है। तुर्कों-मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक ने हमें पराधीन कर हम पर मनमाने ढंग से शासन किया है। इस दौरान हमारी मूल पहचान को भीषण क्षति पहुँचाई गयी। तुर्कों और मुगलों के दौर में जहाँ हमारे धार्मिक उपासना प्रतीकों और बौद्धिक संपदा को निष्ठुरतापूर्वक नष्ट किया गया, तो वहीं अंग्रेजी हुकूमत ने हमारे गौरवमय इतिहास और बौद्धिक संपदा को सुनियोजित ढंग से विकृत करने का कार्य किया।

अंग्रेजों के मन में यह बात थी कि किसी भी प्रकार भारतीयों के भीतर से भारत के अतीत गौरव की भावना को समाप्त कर दिया जाए। इसके लिए उन्होंने ‘आर्य आगमन सिद्धांत’ की कल्पना करके यह भ्रामक अवधारणा स्थापित करने की कोशिश की कि भारत के पास अपना कुछ भी नहीं है और भारतीय जिस अतीत पर गौरवान्वित होते हैं, वो विदेशी मूल के आर्यों द्वारा लाया गया है।

इसका एक संदेश यह भी था कि भारत का पहले भी विदेशी शासकों ने उद्धार किया है, अतः अंग्रेजी हुकूमत भी उनकी उद्धारक बनकर आई है। आर्यों-द्रविड़ों को एकदूसरे से अलग बताते हुए आर्यों द्वारा द्रविड़ों को खदेड़ने की मनगढ़ंत स्थापना के जरिये अंग्रेजों का उद्देश्य देश में विभाजनकारी भावनाओं को बल देना भी था, जिससे उनके लिए यहाँ शासन करना सरल रहे।   

पं. जवाहर लाल नेहरू

अंग्रेज अपनी इस कोशिश में कमोबेश कामयाब भी हुए। मगर, 1947 में जब उनका शासन समाप्त हुआ और सत्ता की बागडोर भारतीय हाथों में आई, तब इस इतिहास को बदलने की दिशा में काम होना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ही कहेंगे कि आजाद भारत को प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पं. नेहरू के रूप में एक ऐसा व्यक्ति मिला, जिनकी चिंतन पद्धति पर भारतीय विचारों से अधिक आयातित विचारधाराओं का प्रभाव था। मार्क्सवादी विचारधारा के गहरे प्रभाव में रहने वाले नेहरू खुद आर्यों के आक्रमण सम्बंधित सिद्धांत के पैरवीकार थे।

उल्लेखनीय होगा कि ‘लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर’ शीर्षक से संकलित उनके अंग्रेजी आलेखों जिनका हिंदी अनुवाद प्रेमचंद ने किया है, में से एक आलेख ‘आर्यों का हिंदुस्तान में आना’ में नेहरू ने लिखा है, ‘..हिन्दुस्तान के रहनेवाले द्रविड़ कहलाते थे।… उन द्रविड़ों पर आर्यों ने उत्तर से आकर हमला किया, उस जमाने में मध्य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे। मगर वहाँ सबका गुजारा न हो सकता था इसलिए वे दूसरे मुल्कों में फ़ैल गए।…आर्य एक मजबूत लड़ने वाली जाति थी और उसने द्रविड़ों को भगा दिया।‘ इस उद्धरण से नेहरू की अभारतीय चिंतन-पद्धति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

इन नेहरू ने देश के शासन का ढंग तो मार्क्सवादी नीतियों पर रखा ही, इतिहास लेखन का दायित्व भी भारतीयता की जड़ों से कटे वामपंथी विद्वानों को ही सौंप दिया। परिणामतः इतिहास में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ और अंग्रेजों द्वारा स्थापित तमाम भ्रांतियां थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ भारतीय इतिहास का हिस्सा बनी रहीं।

इतिहास के पुनर्लेखन का समय

बहरहाल, उक्त शोधों में हुए खुलासों ने भारतीय इतिहास का पूरा स्वरूप ही बदलने का संकेत दे दिया है और उम्मीद है कि कुछ ही समय में परीक्षण के पश्चात् इस संकेत पर आधिकारिक मुहर भी लग जाएगी। इस तथ्य कि भारतीय सभ्यता में पिछले दस-बारह हजार वर्षों में कोई बाहरी आवागमन हुआ ही नहीं है, से न केवल आर्यों के आगमन का सिद्धांत निराधार सिद्ध होता है बल्कि इस बात को भी बल मिलता है कि इस देश के मूल निवासी आर्य ही थे।

यह धारणा भी मजबूत होती है कि वैदिक युगीन सभ्यता ही भारत की मूल सभ्यता थी। यह भी कहा जा सकता है कि वो वैदिक सभ्यता ही थी, जिसे आज सिन्धु घाटी सभ्यता के रूप में पहचान दी गयी है। अभी तो बस थोड़ी ही खुदाई हुई है और इस सभ्यता का कालखंड मैक्समूलरी स्थापना के 1500-2000 वर्ष ईसा पूर्व से बढ़कर पांच हजार वर्ष पूर्व तक पहुँच गया है।

अगर और व्यापक स्तर पर उत्खनन किया जाए तो ऐसे और भी अवशेष प्राप्त होने की संभावना है, जिनसे महान भारतीय सभ्यता की अनेक ऐतिहासिक कथाओं को तथ्यात्मक आधार मिल सकता है। वैसे फिलहाल जितने प्रमाण प्राप्त हुए हैं, वे भी इस बात पर बल देने के लिए नाकाफी नहीं है कि भारत के प्राचीन इतिहास का पुनर्लेखन करने का समय आ गया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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