सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसीकी हार-जीत नहीं, केजरीवाल की बहानेबाजी पर ‘ब्रेक’ है !

केजरीवाल जबसे सत्तारूढ़ हुए हैं, तबसे उन्होंने जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से बचने के लिए गतिरोध की राजनीति के रूप में एक बड़ा सरल उपाय खोज लिया है। जब भी उनके किसी वादे के न पूरे होने को लेकर उनसे कोई सवाल पूछा जाता है तो उसका ठीकरा वे सीधे-सीधे उपराज्यपाल फोड़ देते हैं। अपने स्तर पर हुई गड़बड़ियों के लिए भी उपराज्यपाल को जिम्मेदार ठहराना उनका शगल बन गया है। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय के ‘अधिकारों के संतुलन’ की मूल  भावना से पुष्ट इस फैसले के बाद केजरीवाल की बहानेबाजी की राजनीति पर ‘ब्रेक’ लगने की उम्मीद की जा सकती है।

दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच लम्बे समय से चल रही अधिकारों की जंग पर आज देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना फैसला सुनाया। इससे पूर्व यह मामला उच्च न्यायालय में भी चला था, तब उच्च न्यायालय ने उपराज्यपाल को प्रमुख प्रशासनिक शक्ति माना था। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय से जरा अलग रुख लेते हुए दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के मध्य शक्ति के संतुलन पर जोर दिया है, जिसके बाद से दिल्ली की केजरीवाल सरकार इसे अपनी बड़ी जीत बताने में जुट गयी है।

अरविंद केजरीवाल तो इतने जोश में आ गए कि उन्होंने इस फैसले को अपनी जीत से बढ़कर ‘लोकतंत्र की जीत’ ही बता डाला। वहीं भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा द्वारा इस फैसले को केजरीवाल सरकार की स्टंट राजनीति की हार बताया गया। कांग्रेस की तरफ से दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि मिलकर काम करने से ही बात बनेगी।

उपराज्यपाल अनिल बैजल और अरविन्द केजरीवाल

गौर करें तो न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता जो कि केजरीवाल सरकार की एक प्रमुख मांग थी। इसके अलावा भूमि, पुलिस और क़ानून व्यवस्था को लेकर दिल्ली सरकार के पास कोई अधिकार न होने की बात भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कही गयी। जबकि केजरीवाल अक्सर इन विषयों का अधिकार अपने पास न होने को लेकर हंगामा मचाए रहते हैं।

न्यायालय ने यह भी कहा कि कुछ मामलों को छोड़कर अन्य बहुत-से विषय हैं, जिनमें केजरीवाल सरकार को फैसले लेने का अधिकार है, लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों के विषय में उपराज्यपाल से राय लेना भी आवश्यक है। विवाद की स्थिति पैदा होने पर राष्ट्रपति के पास जाने का विकल्प भी न्यायालय ने सुझाया है।       

उपर्युक्त बातों पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में किसीके लिए भी हार-जीत जैसा कुछ नहीं है। इस फैसले में केजरीवाल सरकार के लिए एक छुपा हुआ सन्देश है कि वो एक चुनी हुई सरकार है, जिस कारण जनता के प्रति उसकी जवाबदेही है और वो इस जवाबदेही से नहीं बच सकती।

दरअसल केजरीवाल जबसे सत्तारूढ़ हुए हैं, तबसे उन्होंने जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से बचने के लिए गतिरोध की राजनीति के रूप में एक बड़ा सरल उपाय खोज लिया है। जब भी उनके किसी वादे के न पूरे होने को लेकर उनसे कोई सवाल पूछा जाता है तो उसका ठीकरा वे सीधे-सीधे उपराज्यपाल फोड़ देते हैं। अपने स्तर पर हुई गड़बड़ियों के लिए भी उपराज्यपाल को जिम्मेदार ठहराना उनका शगल बन गया है।

लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय के ‘अधिकारों के संतुलन’ की मूल  भावना से पुष्ट इस फैसले के बाद केजरीवाल की बहानेबाजी की राजनीति पर ‘ब्रेक’ लगने की उम्मीद की जा सकती है। क्योंकि इस फैसले के बाद भी यदि केजरीवाल अधिकारों के अभाव का रोना रोते रहे, तो दिल्ली की जनता के सामने उनकी ‘गतिरोध की राजनीति’ की कलई पूरी तरह से खुल जाएगी और वे अपनी बची-खुची साख भी गँवा बैठेंगे। फिर शायद ही जनता उन्हें दुबारा ये रोना रोने के लिए सत्ता की दहलीज तक पहुँचाए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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