सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी सुधरने को तैयार नहीं दिख रही आप !

अरविंद केजरीवाल खुद को पूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री मान कर राष्ट्रीय राजनीति में अपना महत्व बढ़ाना चाहते हैं। दिल्ली उनकी प्राथमिकता में नहीं है। यदि होती तो सबसे पहले वह इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सीमाएं समझते और उसीके अनुरूप सरकार का संचालन करते। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का यही मूल विचार है।

दिल्ली पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आम आदमी पार्टी अपनी जीत बता रही है। वास्तविकता यह है कि जब तक अरविंद केजरीवाल दिल्ली की संवैधानिक स्थिति को स्वीकार नहीं करेंगे, वह विवाद को ही आमंत्रण देते रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तत्काल बाद उनकी सरकार ट्रांसफर विवाद लेकर सामने आ गयी। आप नेताओं ने निर्णय के बाद कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए लड़ाई जारी रहेगी। जाहिर है, ये सिर्फ अलग-अलग मुद्दों पर लड़ने आए हैं, इन्हें काम करना ही नहीं है

अरविंद केजरीवाल खुद को पूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री मान कर राष्ट्रीय राजनीति में अपना महत्व बढ़ाना चाहते हैं। दिल्ली उनकी प्राथमिकता में नहीं है। यदि होती तो सबसे पहले वह इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सीमाएं समझते और उसीके अनुरूप सरकार का संचालन करते। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का यही मूल विचार है। 

इस निर्णय के परोक्ष और अपरोक्ष निहितार्थ ‘आप’ को शर्मिंदा करने वाले हैं। इन दोनों पर उसे आत्मचिंतन करना चाहिए था, लेकिन उसने इसे जश्न का अवसर मान कर सुधार की संभावनाओं को समाप्त कर दिया है। इसके बाद यह लगभग तय है कि आप सरकार जिस तरह अब तक चली है, उसी तर्ज पर उसका शेष कार्यकाल भी बीत जाएगा। 

सुप्रीम कोर्ट के कुछ शब्द विशेष रूप से गौरतलब हैं। पहला यह कि अराजकता नहीं होनी चाहिए। दूसरा यह कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, तीसरा यह कि सभी लोगों को संविधान का पालन करना चाहिए। लेकिन आश्चर्य यह कि इस प्रकार की न्यायिक टिप्पणी के बाद भी आप के नेता जीत का जश्न मना रहे हैं। न्यायालय की टिप्पणी में अराजकता शब्द सीधे-सीधे ‘आप’ के लिए है। इसने सत्ता में आने के बाद अराजकता की मिसाल कायम की है। यह शब्द इस पार्टी की पहचान के साथ जुड़ गया है। अब यह सरकार समापन की दिशा में बढ़ रही है, ऐसे में बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है।

सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे वाक्य में कहा कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। यह टिप्पणी भी आप सरकार के लिए ही है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सबसे बड़ी मुसीबत भी यही है कि वह अपने को पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री से कम समझने को तैयार नहीं हैं। यह गलतफहमी उन्हें अराजकता से बाहर नहीं निकलने देती। यदि वह अपने को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का मुख्यमंत्री मानते तो सीमित अधिकारों के आधार पर कार्य करने का प्रयास करते। लेकिन वे तथ्य को स्वीकारने को ही तैयार नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के पालन की बात कही और ‘आप’ ने मान  लिया कि यह टिप्पणी उपराज्यपाल के लिए है। लेकिन देखा जाए तो उपराज्यपाल ने प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह ही किया है। उन्होंने सरकार के उन्ही फैसलों को नकारा, जिसमें निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि चुनी हुई सरकार को फ़ैसले करने का अधिकार है। उपराज्यपाल कुछ फ़ैसलों से असहमत हों तो राष्ट्रीय हित में उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। लेकिन इस वाक्य को अलग करके पढ़ेंगे तो स्थिति स्पष्ट नही होगी। इस निर्णय को समग्र रूप में पढ़ना होगा जिसमें कहा गया कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, विशेष दर्जे वाला केंद्र शासित प्रदेश ही है। यह न तो पूर्ण राज्य है, न यहां पर राज्यपाल हैं। इसकी जगह उपराज्यपाल अर्थात प्रशासक हैं।

ज़मीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था उपराज्यपाल के ही पास रहने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना संभव  नहीं है। इस संदर्भ में ही संसदीय शासन प्रणाली को देखना होगा जिसमें चुनी हुई सरकार ही राज्य को चलाने के लिए जिम्मेदार  होती है।  

सुप्रीम कोर्ट के कथन पर केजरीवाल की प्रतिक्रिया निराश करने वाली है। इससे उन्होंने कोई सबक लेने से इनकार कर दिया है। उनकी सरकार ने अपनी विफलता स्वयं ही स्वीकार की है। वह कहते रहे हैं कि प्रधानमंत्री और उपराज्यपाल ने उन्हें कार्य नहीं करने दिया। इसका मतलब साफ है कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने चार वर्षों में ऐसा कुछ नहीं किया, जिसे वह अपनी सफलता या उपलब्धि के रूप में पेश कर सके। इसलिए वह विफलता का ठीकरा प्रधानमंत्री और उपराज्यपाल पर फोड़ कर अपने को बचाना चाहती है।

पिछले दिनों राजनिवास पर नौ दिन चला धरना इसी रणनीति का हिस्सा था। आप की इस सच्चाई को दिल्ली के लोग बाखूबी समझ चुके हैं। इस पार्टी को अराजकता में महारत हासिल है। लेकिन निर्धारित संवैधानिक दायरे में इन्हें सरकार चलाना नहीं आता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी इस सरकार में सुधार नहीं कर सकता।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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