शिक्षाविद् से लेकर राजनेता तक हर किरदार में कामयाब रहे डॉ मुखर्जी!

बतौर उद्योग मंत्री काम करने के दौरान डॉ मुखर्जी को चिंता इस बात की रहती थी कि भारत के गाँव में जो छोटे–छोटे उद्योग धंधे हैं, उनको कैसे व्यापार की मुख्यधारा से जोड़ा जाए, अतएव उन्होंने भारत के उद्योग की बुनियाद को तैयार किया और कुटीर एवं लघु उद्योग की व्यवस्थित ढंग से शुरुआत की। इसके साथ–साथ उन्होंने भाखरा नांगल डैम, भिलाई इस्पात उद्योग, सिन्दरी खाद कारखाना की शुरुआत कर देश को एक नई दिशा देने का काम किया।

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति के एक ऐसे महान व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होने आज़ादी के पश्चात् देश की एकता–अखंडता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। राजनेता सहित एक शिक्षाविद और देश के पहले उद्योग मंत्री के नाते भारतीयता व राष्ट्रवाद को लेकर उन्होंने जो विचार दिए, वे आज भी प्रासंगिक हैं।

इस वर्ष डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 117 वीं जन्म जयंती है। 06 जुलाई, 1901 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। आज से 117 साल पहले देश की क्या स्थिति थी, कितना कठिन दौर रहा होगा, इसकी हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं; किन्तु यह डॉ मुखर्जी की प्रतिभा ही थी कि वे महज 33 वर्ष की उम्र में कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने और चार वर्षों तक इस महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन किया। उनके जीवन में कई ऐसे उतार–चढ़ाव वाले दौर आए जिनका सामना करना कठिन था, लेकिन वे सबसे लड़ते-जूझते आगे बढ़ते रहे।

समयानुसार उन्हें जो दायित्व मिले, बड़ी सफ़लता के साथ वह उन दायित्वों का निर्वहन किए। काफी कम समय में ही वे अनेक पदों पर रहे। गौर करें तो उन्होंने बंगाल के वित्त मंत्री, हिन्दू महासभा के अध्यक्ष, देश के प्रथम उद्योग मंत्री, जनसंघ के अध्यक्ष, शिक्षाविद, बैरिस्टर जैसे तमाम क्षेत्रों से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया।

राष्ट्र सेवा की वैचारिक प्रेरणा उन्हें थकने नहीं देती थी। उनकी बुद्धिमता एवं बहुमुखी प्रतिभा का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देश की आज़ादी के बाद जब पहली सरकार का गठन हो रहा था, तब महात्मा गांधी और सरदार पटेल की यह इच्छा थी कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अनुभवों का लाभ देश को मिले, जिसके फलस्वरूप पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्री मंडल में बतौर उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री जगह देनी पड़ी।

बतौर उद्योग मंत्री काम करने के दौरान डॉ मुखर्जी को चिंता इस बात की रहती थी कि भारत के गाँव में जो छोटे–छोटे उद्योग धंधे हैं, उनको कैसे व्यापार की मुख्यधारा से जोड़ा जाए, अतएव उन्होंने भारत के उद्योग की बुनियाद को तैयार किया और कुटीर एवं लघु उद्योग की व्यवस्थित ढंग से शुरुआत की। इसके साथ–साथ उन्होंने भाखरा नांगल डैम, भिलाई इस्पात उद्योग, सिन्दरी खाद कारखाना की शुरुआत कर देश को एक नई दिशा देने का काम किया।

किन्तु, आज़ादी के बाद देश को चलाने के लिए पं जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जो नीतियाँ बन रहीं थीं, उनमें प्रायः पाश्चात्य विचारों की प्रधानता रहती थी; भारतीयता से निश्छल प्रेम करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद इससे काफ़ी दुखी थे। आखिर नेहरू-लियाकत समझौते के बाद 8 अप्रैल, 1950 को  नेहरू मंत्रिमंडल से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक मजबूत राजनीतिक दल का होना अनिवार्य है। लेकिन तत्कालीन दौर में कांग्रेस के विकल्प की रिक्तता को देखते हुए डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी  ने 21 अक्टूबर, 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की।

यह वो दौर था जब नेहरू एवं कांग्रेस की लोकप्रियता अपने उफ़ान पर थी, ऐसे दौर में जनसंघ के लिए सत्ता तक पहुंचना तो दूर की कौड़ी थी, ऐसे में अपने विचारों को जन–जन तक पहुंचाने तथा लोगों को जनसंघ से जोड़ने का श्रमसाध्य और कठिन कार्य डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शुरू किया। इसका परिणाम भी 1952 में हुए आम चुनाव में देखने को मिला। इस चुनाव में जनसंघ को तीन सीटों पर कामयाबी हासिल हुई जो जनसंघ के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था। 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति, भारतीय मिट्टी की सुगंध को लेकर डॉ मुखर्जी देश भर के नौजवानों को चेतना जागृत करने में लगे रहते। शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, समविचारी संगठनों के साथ वह जनसंघ और अपनी नीतियों से परिचय कराते रहते थे।इसके अलावा देश की एकता एवं अखंडता को बनाए रखने के लिए कश्मीर में प्रवेश की परमिट प्रणाली एवं धारा 370 के विरुद्ध उन्होंने अपने विरोध को तेज़ किया और ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेगा’ के नारे के साथ 08 मई, 1953 को बगैर किसी परमिशन के उन्होंने कश्मीर की यात्रा प्रारम्भ कर दी

11 मई, 1953 को शेख अब्दुल्ला सरकार ने डॉ मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया, जिसका विरोध देश के सभी हिस्सों में हुआ। शेख सरकार द्वारा बनाए गए अस्थाई जेल में ही राष्ट्रवाद और भारतीयता का यह देदीप्यमान नक्षत्र बेहद रहस्यमय ढंग से हमेशा के लिए 23 जून, 1953 को अस्त हो गया।

वह अविभाज्य जम्मू-कश्मीर के सपनों को पिरोये हुए शहीद हो गये। उनकी मौत रहस्यमय ढंग से हुई थी, जिस पर से आज तक पर्दा नहीं उठ सका। भारत के राजनीतिक इतिहास में लोकतांत्रिक मूल्यों की व्याख्या और भारत के राजनीतिक इतिहास की विवेचना में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की यश-कीर्ति को छोटा दिखाने तथा उसे सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास वामपंथी इतिहासकारों ने किया है। यही कारण है कि श्यामा प्रसाद मुख़र्जी का शिक्षा, उद्योग और भारतीयता को लेकर जो विजन था, उससे ठीक प्रकार से देश परिचित नहीं हो सका।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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