अगर वाकई में कहीं लोकतंत्र खतरे में है, तो वो है बंगाल में !

भाजपा के कार्यकर्ताओ को निशाना बनाने की सबसे बड़ी वजह है, भाजपा का पश्चिम बंगाल में मजबूत दावेदार बनकर उभरना। कांग्रेस और वामपंथियों को पछाड़ते हुए भाजपा बंगाल में तेजी से दूसरे स्थान पर आ चुकी है। अत्यधिक मुस्लिम तुष्टीकरण और मालदा, पुरुलिया में अल्पसंख्यको द्वारा की गयी हिंसा के परिणामस्वरूप बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय ममता बनर्जी से निराश है। ऐसे में भाजपा एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रही है, यही ममता को अखर रहा है।

हर दिन देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग मोदी सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगाता है कि वर्तमान सरकार में  लोकतंत्र खतरे में आ चुका है, लेकिन यही बुद्धिजीवी वर्ग कांग्रेस द्वारा न्यायपालिका, चुनाव आयोग को निशाना बनाने  पर चुप्पी साध लेता है। इस बुद्धिजीवी वर्ग के बारे में तो जितना कहा जाए उतना कम है, लेकिन अगर वास्तव में कहीं लोकतंत्र खतरे में है, तो वो है बंगाल में।जब से भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ बढ़ानी शुरू की हैं, तब से देश के सामने बंगाल की राजनीति का बड़ा वीभत्स रूप सामने आया है। भाजपा के कार्यकर्ता लगातार बंगाल में राजनीतिक हिंसा का शिकार हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा का प्रयोग कोई नई बात नहीं हैं। 34 वर्ष के वामपंथियों के शासनकाल में भी राजनीतिक विरोधियो को हिंसा का शिकार होना पड़ता था। 70 के दशक के “सैनबाड़ी हत्याकांड” ने पूरे बंगाल में सनसनी फैला दी थी, जिसमे वामपंथियों ने रेखारानी सैन के सामने उनके  पति नबकुमार सैन की आँखे निकाल दी थी और नबकुमार सैन के दोनों भाइयो, मलय और प्रणब को मौत के घाट उतार दिया था। एक वर्ष पश्चात नबकुमार की भी नृशंस हत्या कर दी गयी थी।

हिंसा से मुक्ति और परिवर्तन की अपेक्षा से लोगों  ने ममता बनर्जी को चुना था कि वे  प्रदेश में कानून-व्यवस्था स्थापित कर पाएंगी। लेकिन, अब लगता है कि ममता भी वामपंथियों के पदचिन्हों पर चलने लगी हैं। पिछले एक महीने के अंदर-अंदर बंगाल में भाजपा के तीन कार्यकर्ताओ को मौत के घाट उतारा जा चुका है।

बीते दिनों 54 वर्षीय धर्मराज हजरा की लाश शक्तिपुर गाँव में एक झील में मिली। धर्मराज  हजरा भाजपा की मंडल कमिटी के सदस्य थे  और उन्हें पंचायत चुनाव से ही भाजपा के समर्थन के लिए जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं। केरल की तर्ज पर ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी हिंसा का प्रयोग सामान्य हो गया है। बस फर्क इतना सा है कि केरल में वामपंथी हिंसा का प्रयोग करते हैं और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता।

धर्मराज हजरा से पहले भी पुरुलिया के त्रिलोचन महतो और दुलत कुमार को मौत के घाट उतार दिया गया था। महतो का शव एक पेड़ से लटका हुआ मिला था और दुलत कुमार की लाश एक हाई टेंशन पोल से लटकी  हुई मिली  थी। इससे पूर्व अप्रेल के महीने में भी तृणमूल कार्यकर्ताओं के द्वारा बांकुरा के रानीबाग में  की गयी हिंसा में अजीत मुर्मू ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। अजीत मुर्मू भाजपा की तरफ से पंचायत चुनाव में उम्म्मीद्वार थे।

इसी वर्ष पश्चिम  बंगाल में हुए पंचायत चुनावों में तृणमूल कार्यकर्ताओ ने अराजकता की सारी सीमाएं लांघ दी थीं। मीडियाकर्मियो के सामने बन्दूक के दम पर बैलट बॉक्स लूटे जा रहे थे, कई सीटों पर दूसरे  प्रत्याशियों को नामांकन भी नहीं भरने दिया गया। टीएमसी नेता अरबुल इस्लाम को निर्दलीय प्रत्याशी के समर्थक की हत्या के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया। उनके घर से ज़िंदा बम तक बरामद किये गए थे।

टीएमसी कार्यकर्ता खुले तौर पर हथियार लेकर रैली निकाल रहे थे ताकि अन्य पार्टियों के समर्थको में भय उत्पन्न किया जा सके। इन सबका परिणाम ये हुआ कि पंचायत चुनाव में  34% सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने निर्विरोध जीत दर्ज की। इस पूरे चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई,  24 लोगो की इस हिंसा में मृत्यु हो गयी और दर्जनों घायल हुए।

अगर आंकड़ो पर गौर करे तो कुल 48650 ग्राम पंचायत की सीटों में से 16814 सीटें तृणमूल ने निर्विरोध जीतीं, पंचायत समिति की कुल 9217 सीटों  में से 3059 सीटें और जिला परिषद की 825 सीटों में से 203 सीटें  निर्विरोध तृणमूल के खाते में आईं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद ऐसा घटनाक्रम पहली बार हुआ होगा।

चौंकाने वाली बात ये है कि  पश्चिम बंगाल चुनाव आयोग इस पूरे वाकये के दौरान  मूकदर्शक बना हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग पे  तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है  कि ऐसा लग रहा है मानो बंगाल में पंचायत स्तर पर लोकतंत्र सुचारू रूप से काम नहीं कर रहा।

इतना सब कुछ होने के बावजूद भी क्यों ये राष्ट्रीय बहस का मुद्दा नहीं बन पाया? इस सवाल का यही जवाब है कि अधिकांश मीडियाकर्मियो के अनुसार ममता बनर्जी  “सेक्युलर” हैं। मीडिया की अघोषित परिभाषा के अनुसार मुस्लिम तुष्टीकरण “सेकुलरिज्म” है, भाजपा और संघ उनकी इस परिभाषा के अंतर्गत सटीक नहीं बैठते इसलिये वो “साम्प्रदायिक” हो जाते हैं।सेक्युलर मुख्यमंत्री के प्रदेश में इस प्रकार की कोई घटना हो भी जाती है, तो उसे पर्याप्त कवरेज नहीं दिया जाता। अगर इसका उल्टा भाजपा नीत प्रदेश में इस प्रकार की कोई घटना होती तो हाहाकार मच जाता। 

दरअसल तृणमूल के नेताओं ने छोटे-मोटे प्रलोभन देकर हर क्षेत्र में जमीनी स्तर पर उपद्रवियों की ऐसी फ़ौज खड़ी कर रखी है जो ये सुनिश्चित करती है कि कोई विपक्षी दल पनप ही ना पाए। ये हिंसा का प्रयोग करके ये सुनिश्चित करते है कि  दूसरे दलों के उम्मीदवार अपना नामांकन भी ना भर पायें। सत्ताधारी दल के संरक्षण के कारण कोई पुलिस कार्यवाही भी नहीं होती।

प्रसिद्ध लेखक सीताराम गोयल  लिखते हैं कि,  “ऐसा समाज जो विचारधारा के संघर्ष को नहीं समझता, जो आक्रामक विचारधारा का प्रतिरोध नहीं करता, वो देर-सवेर शारीरिक हिंसा को आमंत्रित करता हैं।”  आशा है कि पश्चिम बंगाल का जनमानस तृणमूल कांग्रेस की हिंसात्मक विचारधारा को करारा जवाब देगा।

भाजपा के कार्यकर्ताओ को निशाना बनाने की सबसे बड़ी वजह है, भाजपा का पश्चिम बंगाल में मजबूत दावेदार बनकर उभरना। कांग्रेस और वामपंथियों को पछाड़ते हुए भाजपा बंगाल में तेजी से दूसरे स्थान पर आ चुकी है। अत्यधिक मुस्लिम तुष्टीकरण और मालदा, पुरुलिया में अल्पसंख्यको द्वारा की गयी हिंसा के परिणामस्वरूप बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय ममता बनर्जी से निराश है। ऐसे में भाजपा एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रही है, यही ममता को अखर रहा है।

सबसे बड़ी विडम्बना तो यह  है कि ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर  ये  आरोप लगाती हैं  कि उसने देश में भय  का वातावरण बनाया हुआ है। भाजपा के विरुद्ध महागठबंधन का नेतृत्व भी कर रही हैं, प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा भी रखती हैं। लेकिन, अपने शासनाधीन प्रदेश में वे कानून व्यवस्था भी सुचारू रूप से संचालित नहीं कर पा रही हैं।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं। नेशनलिस्ट ऑनलाइन का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।)

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