दलहन क्रांति : मोदी सरकार के प्रयासों से दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनने की राह पर देश

महंगी दालों ने आम आदमी की थाली से दाल को तकरीबन दूर ही कर दिया था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों से अब आम आदमी की थाली में दालें भरपूर मात्रा आ गई हैं। मोदी सरकार द्वारा दलहनी फसलों के घरेलू उत्‍पादन को बढ़ाने के प्रयासों का ही नतीजा है कि 2015-16 में जहां 163 लाख टन दालों का उत्‍पादन हुआ था, वहीं दो साल बाद 2017-18 में यह बढ़कर 239.5 लाख टन हो गया। इससे दालों का आयात तेजी से कम हुआ। स्‍पष्‍ट है, अगले कुछ साल में देश दालों के मामले में आत्‍मनिर्भर बन जाएगा।   

भारतीय खेती की बदहाली की एक बड़ी वजह एकांगी कृषि विकास नीतियां रही हैं। वोट बैंक की राजनीति के कारण सरकारों ने गेहूं, धान, गन्‍ना, कपास जैसी चुनिंदा फसलों के अलावा दूसरी फसलों पर ध्‍यान ही नहीं दिया। इसका सर्वाधिक दुष्‍प्रभाव दलहनी व तिलहनी फसलों पर पड़ा। घरेलू उत्‍पादन में बढ़ोत्‍तरी न होने का नतीजा यह हुआ कि दालों व खाद्य तेल का आयात तेजी से बढ़ा। इतना ही नहीं, आयातकों की मजबूत लॉबी ने सरकारों को आयात शुल्‍क लगाने से भी रोके रखा।

2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही नरेंद्र मोदी ने दलहन क्रांति की कवायद शुरू कर दी। सरकार ने दालों के घरेलू उत्‍पादन बढ़ाने के उपाय सुझाने हेतु सुब्रमण्‍यम समिति का गठन किया। समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि लंबे समय से भारतीय खेती में अन्‍य अनाजों की तुलना में दालों के साथ सौतेला व्‍यवहार किया जाता रहा है। समिति ने सबसे ज्‍यादा बल दालों की प्रभावी खरीद नीति बनाने और खरीद एजेंसियों द्वारा जमीनी स्‍तर पर खरीद के भौतिक सत्‍यापन पर दिया।

सांकेतिक चित्र [साभार : News Trend]

समिति के मुताबिक सिंचित इलाकों में दलहनों की बुवाई करने वाले किसानों को प्रत्‍यक्ष नकदी हस्‍तांतरण (डीबीटी) के जरिए 10 से 15 रूपये प्रति किलो की सब्‍सिडी देने से यहां के किसान दलहनी फसलों की खेती करने को आगे आएंगे। इसी बीच 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों में मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए बिचौलियों-जमाखोरों की मजबूत लॉबी ने दालों की कीमत आसमान पर चढ़ा दी। इससे नरेंद्र मोदी का दृढ़ निश्‍चय और प्रबल हुआ। उन्‍होंने एक ओर तो ऊंचे समर्थन मूल्‍य पर दालों की सरकारी खरीद का पुख्‍ता नेटवर्क तैयार कराया तो दूसरी ओर 20 लाख टन दालों का बफर स्‍टॉक बनाने आदेश दिया ताकि जमाखोर अपनी करामात न दिखा पाएं।

दलहनी फसलों के उन्‍नत बीजों के विकास पर ध्‍यान दिया गया। पिछले दो वर्षों में विभिन्‍न दलहनी फसलों की 23 उन्‍नत प्रजातियां विकसित की गईं। सबसे बढ़कर इन उन्‍नत प्रजातियों को खेतों तक पहुंचाने के पुख्ता उपाय किए गए। इसके लिए प्रयोगशाला से भूमि तक की कड़ी मजबूत बनाई गई।

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत दलहन उत्‍पादन का दायरा 16 राज्‍यों से बढ़ाकर 29 राज्‍यों तक कर दिया गया। सरकार ने दालों की खेती को बढ़ावा देने के लिए 1630 करोड़ रूपये का आवंटन किया। सरकार ने राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत 93 बीज केंद्र बनाने की मंजूरी दी है। राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों को बीज केंद्र बनाने की जिम्‍मेदारी दी गई है।

घरेलू उत्‍पादन बढ़ाने के लिए सीधे हस्‍तक्षेप के साथ-साथ सरकार ने दलहनी फसलों की खेती से जुड़े जोखिम को कम किया ताकि किसान सिंचित भूमि में दलहनों की खेती को आगे आएं। इतना ही नहीं, सरकार ने दाल उत्‍पादक क्षेत्रों में दाल मिल व प्रसंस्‍करण सुविधाएं स्‍थापित की। घरेलू उत्‍पादन बढ़ाने के साथ-साथ सरकार ने सस्‍ते आयात रोकने के लिए आयात शुल्‍क में बढ़ोत्‍तरी किया।

सांकेतिक चित्र

इस समय मटर पर 60 प्रतिशत, पीली मटर पर 50 प्रतिशत, मसूर पर 30 प्रतिशत और अरहर पर 20 प्रतिशत आयात शुल्‍क लगाया गया है। दालों पर इतना अधिक आयात शुल्‍क किसी भी सरकार ने नहीं लगाया था। मोदी सरकार द्वारा दलहन उत्‍पादन पर विशेष फोकस करने के फलस्‍वरूप घरेलू उत्‍पादन में तेजी से बढ़ोत्‍तरी दर्ज की गई। 2015-16 में जहां 163 लाख टन दालों का उत्‍पादन हुआ था, वहीं दो साल बाद 2017-18 में यह बढ़कर 239.5 लाख टन हो गया। इससे दालों का आयात तेजी से कम हुआ।

गौरतलब है कि 2016-17 में जहां देश में 66 लाख टन दालों का आयात किया गया, वहीं 2017-18 में यह आयात घटकर 56 लाख टन रह गया। इससे सरकार को 9775 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा बचाने में सफलता मिली। स्‍पष्‍ट है, अगले कुछ साल में देश दालों के मामले में आत्‍मनिर्भर बन जाएगा। समग्रत: मोदी सरकार के प्रयासों से देश में दलहन क्रांति का आगाज हो चुका है। अब न तो बिचौलियों-जमाखोरों की मजबूत लॉबी अपनी करामात दिखा पाएगी और न ही हर हर मोदीको अरहर मोदी पछाड़ पाएगा।

(लेखक केन्द्रीय सचिवालय में अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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