35ए : वह अनुच्छेद जिसे नेहरू ने संसद में पारित किए बिना ही संविधान का हिस्सा बना दिया

35ए के पीछे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्लाह के बीच हुए समझौते की कहानी है, जिस पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने अपनी सहमति की मुहर लगा दी। यह एक ऐसा एकलौता विवादित अनुच्छेद है, जिसे संसद में पारित किये बिना ही संविधान का हिस्सा बना दिया गया। वर्ष 1954 में इसे संसद में पेश व पारित नहीं किया गया बल्कि बिना संसद की मंजूरी के तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया।

अनुच्छेद 35-ए को लेकर पिछले कुछ दिनों से लगातार बहस-मुबाहिसो का दौर जारी है। यह एक ऐसा विधान है, जिसने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान किया है। लेकिन इसे एक ऐसे संवैधानिक धोखे का नाम भी दिया जा रहा है, जिसकी वजह से वहां के लाखों लोग वर्षों से नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

जब 1947 में भारत के बंटवारा हुआ, पाकिस्तान से बहुत से पाकिस्तानी कश्मीरी शरणार्थी भी कश्मीर आए, लेकिन तीन-चार पीढ़ियों के बाद भी बदतर जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। इन शरणार्थियों को आज न तो यहाँ के स्थानीय चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार है, और न ही किसी भी तरह की नौकरी मिल सकती है। कश्मीर के कानून के हिसाब से इनके बच्चे ज्यादा से ज्यादा सफाई कर्मचारी ही बन सकते हैं। मजाक ही मजाक में यहाँ कहा जाता है कि इन सफाई कर्मचारियों के बच्चे देश के पीएम तो बन सकते हैं, लेकिन यह जम्मू कश्मीर के किसी पंचायत में ग्राम सेवक या ग्राम प्रधान नहीं बन सकते।

चारू वाली खन्ना

महिलाओं के अधिकारों का हनन

आर्टिकल 35-ए का एक अहम पहलू महिलाओं के अधिकार से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर मामले की याचिकाकर्ता डॉक्टर चारू वाली खन्ना ने कौर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। चारू वाली खन्ना कश्मीरी पंडित हैं, पेशे से वकील हैं, उनका जन्म कश्मीर में ही हुआ लेकिन उन्होंने कश्मीर से बाहर शादी कर ली। अब वह चाहकर भी वापस कश्मीर में घर नहीं बना सकेंगी। यही उनके विरोध और कोर्ट जाने की वजह है।

चारू ने 20 अप्रैल, 1927 में लाए गए उस विधान को चुनौती दे दी है, जिसके तहत उन महिलाओं या विधवाओं का अधिकार हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता है जो किसी करणवश कश्मीर से बाहर जाकर बस जाती हैं। अगर कोई पुरुष किसी गैर कश्मीरी से शादी करता है तो वह अपनी संपत्ति अपने बच्चों को दे सकता है, लेकिन एक महिला बाहर शादी करने की सूरत में अपनी संपत्ति अपने बच्चों को स्थानांतरित नहीं कर सकती।

इस तरह इस कानून को महिला विरोधी कहा जा रहा है जो बाहर जाकर बस जाने से राज्य की महिलाओं को सभी तरह के अधिकारों से बेदखल कर देता है। लेकिन, यह सिर्फ महिलाओं के अधिकार से जुड़ा मुद्दा नहीं है वरन ये जम्मू-कश्मीर के भारतीय गणराज्य के साथ के रिश्तों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा मसला है। इस के तहत भारत के किसी अन्य राज्य का व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में भूमि आदि संपत्ति नहीं खरीद सकता।

अनुच्छेद 35ए जम्मू कश्मीर की विधायिका को यह अधिकार देता है कि वह जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासी कौन हैं, इसका निर्णय कर सके। इसमें स्थायी निवासियों के लिए नौकरियों, जमीन, स्कालरशिप, और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े अधिकार शामिल हैं। खास बात यह है कि अगर यह नियम भारतीय संविधान के किसी धारा का हनन भी करता है, तो भी उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

शेख अब्दुल्ला के साथ जवाहर लाल नेहरू

संसद में पारित हुए बिना है कायम

इसके पीछे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच हुए समझौते की कहानी है, जिस पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने अपनी सहमति की मुहर लगा दी। यह एक ऐसा विवादित अनुच्छेद है, जिसे संसद में पारित किये बिना ही संविधान का हिस्सा बना दिया गया। वर्ष 1954 में इसे संसद में पेश व पारित नहीं किया गया बल्कि बिना संसद की मंजूरी के तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया।

कैसे हट सकता है 35ए?

आज सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसकी पुनर्समीक्षा नहीं होनी चाहिए? और क्या भारत के राष्ट्रपति के पास संविधान में इस प्रकार के संशोधन का अधिकार है? इस अनुच्छेद 35-ए को धारा 370 की उपधारा 1 के तहत जोड़ा गया है, लेकिन इस तरह के संशोधन का अधिकार सिर्फ भारतीय संसद को प्राप्त है, राष्ट्रपति को नहीं।

सवाल यह भी है कि क्या इस मामले को 27 अगस्त को तीन न्यायाधीशों की बेंच सुनेगी या इसकी सुनवाई संवैधानिक पीठ करेगी। कोर्ट ने यह जता दिया है कि अनुच्छेद 35-ए एक महत्वपूर्व राष्ट्रीय मसला है और इस पर देशव्यापी व्यापक बहस की जरूरत है। देश के सामने इस गलती को पुनः सुधारने का मौका है, लोग उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं कि सर्वोच्च अदालत इस मसले को हमेशा के लिए  इस हिसाब से निबटारा करे जिससे भारतीय संविधान को और ज्यादा मजबूती मिले।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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