‘पत्रकारों का एक ऐसा वर्ग है जिसके लिए देश की सब समस्याएँ 2014 के बाद ही पैदा हुई हैं’

पत्रकारों का ऐसा एक वर्ग है जो निष्पक्षता का दावा तो करता है, लेकिन भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोधी दलों जैसा एजेंडा लेकर चलता है। उसकी पत्रकारिता का मूल कथ्य यही है कि देश में जितनी भी समस्याएं हैं, वह 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पैदा हुई हैं। वो अपरोक्ष ढंग से शायद यह कहना चाहता है कि इसके पहले देश समस्या मुक्त था। किसान बहुत खुशहाल थे, उनको पर्याप्त यूरिया, उन्नत बीज, भारी समर्थन मूल्य, सिंचाई और बाजार की सुविधा उपलब्ध थी। चार वर्ष पहले बहुत रोजगार थे। जबकि वास्तविकता के धरातल पर मोदी से पहले संप्रग शासन में देश की हालत क्या थी, ये जनता बाखूबी जानती है।

किसी भी पत्रकार को अपनी निष्पक्षता या महानता के ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता नहीं होती, यह निर्धारण समाज स्वतः ही कर लेता है। इतना तय है कि पूर्वाग्रह से पीड़ित व्यक्ति कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। वह भी एक प्रकार के एजेंडे पर ही चलता है। जिसके प्रति उंसकी कुंठा होती है, उसमें भूल कर भी उसे कोई अच्छाई दिखाई नहीं देती। ऐसे लोग जब किसी न्यूज़ चैनल से हटते या हटाये जाते है, तो उसे भी अपनी महानता और बलिदान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इनके पास इस बात का जवाब नहीं होता कि छत्तीसगढ़ की किसान महिला से केवल धान से लाभ पर ही सवाल क्यों दागे जा रहे थे?

सांकेतिक चित्र

 

नकारात्मक पत्रकारिता भी समाज का अहित करती है। छत्तीसगढ़ प्रकरण इसका उदाहरण है। इसमें वैकल्पिक कृषि समूह, कृषि व्यवसाय जैसे मुद्दे चर्चा से बाहर हो गए। जबकि ग्रामीण समाज में यह जानकारी पहुंचनी चाहिए थी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के किसानों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर बात की थी।  कांकेर जिले के कन्हारपुरी गांव की एक महिला चंद्रमणि कौशिक से जब प्रधानमंत्री मोदी ने खेती से होने वाली आय सम्बन्धी सवाल किए तो उन्होंने कहा था कि पहले के मुकाबले अब उन्हें ज्यादा मुनाफा हो रहा है और उनकी आय दोगुनी हो गई है।

यह बात सीताफल पर हुई थी। प्रधानमंत्री ने स्वयं इसके बारे में जानकारी प्राप्त की थी। इस बातचीत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू कथित निष्पक्ष पत्रकारिता की भेंट चढ़ गए। अपने को महान और आदर्श पत्रकार बताने की जिद में सामाजिक दायित्व को पीछे छोड़ दिया गया। 

महत्वपूर्ण यह था कि धान के अलावा स्थानीय स्तर पर फल की खेती भी की जा सकती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस प्रकार की खेती समूह बना कर की जा सकती है। यह माना जा सकता है कि ग्रामीण महिला सही हिसाब नहीं बता सकी। लेकिन गेंहू, धान आदि की परम्परागत खेती के साथ फल, फूल आदि की फसल को महत्व देने का विचार देश में जाना चाहिए था।

प्रधानमंत्री ने 2022 में किसानों की आमदनी दो गुनी करने की बात कही है। फिलहाल पहली बार उपज का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया गया है। छत्तीसगढ़ की  चंद्रमणि ने सीताफल  से बढ़ी आमदनी के बारे में बताया था, वह धान की खेती से आमदनी बढ़ने की बात नहीं कर रही थीं। लेकिन सवाल है कि कथित निष्पक्ष पत्रकार महोदय की टीम बार-बार धान के ही पीछे क्यों पड़ी थी। क्या पत्रकारिता की आड़ में किसी एजेंडे पर कार्य चल रहा था?

चंद्रमणि कौशिक ने बताया कि पहले उन्हें सीताफल के जरिए पचास-साठ मिलते थे और अब सात सौ का मुनाफा होता है। लेकिन ये मुनाफा उनके अकेले का नहीं है, बल्कि उनके समूह में बारह महिलाएं काम करती हैं और ये मुनाफा सभी बारह लोगों में बंटता है। इसे वह स्पष्ट नहीं कर सकीं। लेकिन देश में कुछ तो ठीक दिशा में चल रहा है। ऐसे प्रयास पिछली सरकारों को करने चाहिए थे। क्या ऐसे पत्रकार यह समझते हैं कि कोई जादू की छड़ी है जिसे घुमाने से तत्काल आमदनी दुगुनी हो जाएगी। सही दिशा में सरकार प्रयास कर रही है और उसका धीर-धीरे असर भी हो रहा है।  

अब ऐसा माहौल बनाया जा रहा जैसे पत्रकारिता पर खतरा आ गया है। संसद में कांग्रेस इस पर कह रही कि मोदी सरकार पत्रकारों को दबा रही है। निष्पक्षता के नाम पर भाजपा विरोध का एजेंडा चलाने वाले पत्रकारों को भी मौका मिला। वे भी आदर्श पत्रकारिता का बखान करने लगे। 

सांकेतिक चित्र

वस्तुतः पत्रकारों का ऐसा एक वर्ग है जो निष्पक्षता का दावा तो करता है, लेकिन भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोधी दलों जैसा एजेंडा लेकर चलता है। उसकी पत्रकारिता का मूल कथ्य यही है कि देश में जितनी भी समस्याएं हैं, वह नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पैदा हुई हैं। वो अपरोक्ष ढंग से शायद यह कहना चाहता है कि इसके पहले देश समस्या मुक्त था। किसान बहुत खुशहाल थे, उनको पर्याप्त यूरिया, उन्नत बीज, भारी समर्थन मूल्य, सिंचाई और बाजार की सुविधा उपलब्ध थी। चार वर्ष पहले बहुत रोजगार थे। जबकि वास्तविकता के धरातल पर मोदी से पहले संप्रग शासन में देश की हालत क्या थी, ये जनता बाखूबी जानती है। 

ऐसे पत्रकारों ने कभी किसी ऐसी महिला से बात नहीं की होगी जिसे पहली बार एलपीजी सिलेंडर मिला; किसी ऐसे परिवार से बात नहीं की होगी जिसे प्रधानमंत्री आवास योजना से अपना घर मिला; मुद्रा योजना से सुविधा प्राप्त करने वालों की खोज में टीम नहीं दौड़ाई गई होगी; बीमा योजना के लाभान्वितों पर बात नहीं की गयी होगी। ये सभी बात प्रधानमंत्री की विभिन्न वीडियो कांफ्रेंसिंग से जाहिर हुईं। 

पहले कितनी सड़क और रेल लाइन बनती थीं, अब कितनी बन रहीं, इसकी चर्चा निष्पक्ष पत्रकारों की जुबान पर नहीं सुनाई देती। वास्तव में अच्छाइयों और कमियों को समान रूप से दिखाना ही निष्पक्षता है। केवल कमियों की तलाश में भटकना निष्पक्षता नहीं, पूर्वाग्रह होता है। यह एक एजेंडे को चलाने जैसा होता है।

ऐसे कथित निष्पक्ष पत्रकारों पर भी गलत तथ्य प्रस्तुत करने के आरोप लगते रहे हैं।  बताया जाता है कि पिछली नौकरी में ये एनपीए और किसानों के हालात को लेकर  कई गलत रिपोर्ट दिए थे। क्या यह सही नहीं कि उनकी  कैमरे पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ निजी बातें भी चर्चा में आई थीं,  उन्होंने आपराधिक मामले में एक गिरफ्तारी को  आपातकाल ही बता दिया था, केजरीवाल के साथ इंटरव्यू का एक हिस्सा लीक हो गया था – ये सब बाते क्या इनकी पत्रकारिता को सवालों के घेरे में खड़ा नहीं करतीं? अगर सवाल पूछना इनका अधिकार है, तो इनके हिस्से के जवाब कौन देगा।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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