अटल बिहारी वाजपेयी : ‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?’

वर्ष 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद हुए प्रथम अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में वाजपेयी ने एक महान युगदृष्टा के की तरह यह उद्घोष किया, जो आज काल के कपाल की अमिट रेखा बन चूका है। उन्होंने कहा- “भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा”। आज इस बात का मलाल हर भाजपा कार्यकर्ता को है कि जब देश में चारों तरफ कमल खिल रहा था, तब इस भविष्यवाणी को करने वाला उनका प्रिय जननेता कृष्णा मेनन मार्ग की एक बंद कोठरी में निश्चेष्ट शैल की भांति चुपचाप मौन साधे बैठा था। काश! अटल अपनी भविष्यवाणी को सच होते देख पाते…राजनीति के अजातशत्रु को नमन।

सोलह अगस्त की तारीख इतिहास में एक युग के अवसान के रूप में दर्ज हो गयी है। राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी का लंबी अस्वस्थता के बाद निधन हो गया। अटल जी को याद करते हुए उनकी एक कविता का जिक्र यहाँ समीचीन लगता है- “ठन गई, मौत से ठन गई/ जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था/ रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।“  वर्ष 1988 में किडनी का इलाज कराने विदेश गए अटल जी ने यह कविता लिखी थी।

इसी कविता की एक आगे की पंक्ति में अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा है- “मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?” आज बेशक इस कविता को लिखे तकरीबन तीस साल हो गए, किन्तु आज फिर यह कविता प्रासंगिक सी नजर आती है। वह शख्स जिसकी बुलंद आवाज लोगों को मौन कर देती थी, भारतीय राजनीति का वह प्रखर वक्ता चुप सा हो गया था। शायद उनकी ‘मौत से सच में ठन गयी थी। काल के कपाल पर लिखने और मिटाने वाले अटल पिछले कुछ वर्षों से मौन हो गये थे। अंतत: सोलह अगस्त 2018 को अटल बिहारी वाजपेयी सदा-सदा के लिए चिरयात्रा पर प्रस्थान कर गये।

अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन और उनके विराट व्यक्तित्व पर भारतीय जनसंघ के प्रथम महामंत्री रहे भाई महावीर ने पुस्तक ‘हमारे अटल जी” में लिखा है (यह लेख तब लिखा गया जब अटल बिहारी प्रधानमंत्री थे)- “अटल जी के बारे में मुझे कुछ लिखना है, विचार आते ही कठिनाई शुरू हो जाती है, कहाँ से शुरू करूँ ? उम्र के 76 वर्षों के इस सफ़र में लगभग आधी शताब्दी की अथक साधना के बाद आज जो व्यक्तित्व हमारे सामने है, उसके कौन से रूप का वर्णन हो और कौन सा पहलू अछूता छोड़ दिया जाए ? एक किशोर, एक विद्यार्थी से लेकर एक प्रधानमंत्री बनने तक की इस यात्रा में अनेक पड़ावों से गुजरते हुए अटलजी ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को अहर्निश साधना के साथ जिन ऊँचाइयों तक पहुंचाया है, उन्हें शब्दों में बांधना कठिन है।”

यह सच है कि अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का एक बड़ा पक्ष उनका राजनीतिक जीवन है। किन्तु उनके व्यक्तित्व की विशालता उन्हें राजनीति के दायरे से बाहर भी ले जाती है। वे एक सफल पत्रकार और एक कवि के रूप में ख्यातिलब्ध थे। राजनीति में आने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी पत्रकारिता से जुड़े थे और कवितायें भी लिखते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका जुड़ाव राजनीति में आने से पहले से था।

बतौर पत्रकार उन्होंने 1947 में उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ नाम से पत्रिका प्राम्भ की थी। आगे चलकर वे पान्चजन्य के भी संपादक रहे। युवा अटल जब सार्वजनिक जीवन सक्रिय हो रहे थे, तब देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति मिलने में कुछ ही समय शेष बचे थे। लेकिन युवा अटल भारत छोडो आन्दोलन का हिस्सा बनकर 23 दिनों की जेल काट चुके थे। आजादी के बाद जब 1951 में जनसंघ की स्थापना हुई तो अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। वे युवा थे, ऊर्जावान थे और दीन दयाल उपाध्याय के भरोसेमंद भी थे।

चूँकि 1947 में जिस ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका का वाजपेयी ने संपादन किया था, दीन दयाल उस पत्रिका के सरंक्षक/मार्गदर्शक की भूमिका में थे। अटल बिहारी का भारतीय जनसंघ के साथ राजनीतिक सफ़र शुरू हुआ। पहली बार वाजपेयी को 1953 में लोकसभा का चुनाव लड़ने का अवसर मिला था। दरअसल विजय लक्ष्मी पंडित की नियुक्ति सोवियत संघ में राजदूत के रूप में होने के बाद उनकी लोकसभा सीट रिक्त हो गयी थी।

कांग्रेस के खिलाफ इस उपचुनाव में जनसंघ ने अटल बिहारी वाजपेयी को उम्मीदवार बनाया। यह चुनाव अटल बिहारी जीत नहीं सके, लेकिन अपने प्रथम चुनाव में ही उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के बाद दूसरा स्थान प्राप्त किया था। संघ के पूर्व सर संघचालक राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ ने अपने एक लेख में लिखा है कि “उन्होंने(अटल जी) ने इस चुनाव के लिए लगभग 150 सभाओं को संबोधित किया तथा काफी ख्याति अर्जित की।” अत: अटल बिहारी की चुनावी राजनीति की शुरुआत 1953-54 में ही हो गयी थी।

इसके बाद जब 1957 में देश में दूसरा आम चुनाव हो हुआ तब भारतीय जनसंघ ने अटल बिहारी की लोकप्रियता एवं उनकी वक्तव्य शैली को देखते हुए उन्हें तीन लोकसभा सीटों, बलरामपुर, लखनऊ और मथुरा, से उम्मीदवार बनाया। अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ और मथुरा से तो नहीं जीत सके लेकिन बलरामपुर से पहली बार लोकसभा में आये।

यह जवाहरलाल नेहरू का दौर था। यह कांग्रेस के वर्चस्व का दौर था। अटल बिहारी वाजपेयी खुद इसबात का जिक्र अपने भाषणों में कर चुके हैं कि तब वे अत्यंत युवा सांसद थे और पीछे बैठते थे। लेकिन जब भी उन्हें संसद में बोलने का अवसर मिला उन्होंने मुखरता से अपनी बात रखी। इसके बाद वे लगातार जनसंघ के साथ राजनीति सक्रिय रहे।

कांग्रेस में नेहरू युग के जाने के बाद जब इंदिरा का दौर आया तबतक अटल बिहारी वाजपेयी सदन के अन्दर और बाहर विपक्ष की मुखर आवाज बन चुके थे। चाहें आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के लिए होने वाले संघर्षों में उनकी भूमिका हो अथवा राजनीतिक रूप से वैकल्पिक विचारधारा के प्रसार के लिए किये उनके कार्य हों, अटल भारतीय राजनीति के अटल पुरुष की भांति अग्रिम कतार में डंटे रहे।

आपातकाल के दौरान जब चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की सरकार गिर गयी, तब जनसंघ के साथ जनता पार्टी की सरकार में भी जनसंघ और अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका अहम् रही थी। लेकिन राजनीतिक  कालक्रम में एक ऐसा दौर आया जब इतिहास एक बड़े परिवर्तन की करवट ले रहा था। दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनसंघ के सदस्यों को जनता पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसी के परिणामस्वरूप 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी सहित जनसंघ नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की और अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के पहले अध्यक्ष चुने गये।

वर्ष 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद हुए प्रथम अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में वाजपेयी ने एक महान युगदृष्टा के की तरह यह उद्घोष किया, जो आज काल के कपाल की अमिट रेखा बन चूका है। उन्होंने कहा- “भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा”।

इसके बाद सफलता-असफलता की अनेक सीढ़ियों पर चढ़ते हुए वाजपेयी ने आगे का राजनीतिक सफ़र पूरा किया। वर्ष 1984 में हुए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को बुरी हार मिली। वाजपेयी अपना चुनाव भी हार गये थे। यह आत्ममंथन का दौर था, आत्मचिंतन का दौर था। लेकिन अटल बिहारी द्वारा 1980 में कही वो बात अभी पूरी होनी थी। अँधेरा छंटना था, सूरज निकलना था, कमल खिलना था। सन 1984 की बुरी हार के बाद 89 में हुए आम चुनावों में भाजपा को 85 सीटों पर जीत मिली। इसके बाद अँधेरा छंटने का दौर दिखने लगा, सूरज की किरणे रोशनी का प्रवाह करने लगीं और चुनाव दर चुनाव कमल खिलने लगा।

नेहरू ने कभी अटल बिहारी के भाषण से प्रभावित होकर कहा था कि ‘इसके अंदर प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है।’ उनका कहा 1996 में सत्य साबित हुआ। वाजपेयी पहली बार 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने। हालांकि यह सरकार चली नहीं लेकिन सदन के पटल से उन्होंने देश की जनता को सन्देश देने में सफलता अर्जित की। अटल बिहारी वाजपेयी ने एकबार सदन में कहा था- पार्टी तोड़कर जो सत्ता मिलती है, उसे मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूँगा। आखिरकार 1999 के आम चुनावों में देश में यह नारा चल पड़ा था- अबकी बारी अटल बिहारी। वाजपेयी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने।

वाजपेयी ने सदन में मुखरता से बोलते हुए अनेक बार विरोधियों की आलोचना की है। उन्होंने कई बार कटु आलोचना की है। लेकिन उनकी आलोचना वैचारिक होती थी, न कि निजी। यही कारण है कि वे इतने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद अजातशत्रु बने रहे।

वर्तमान की राजनीति के लिए वह आज भी एक प्रेरणा पुरुष की तरह हैं। इस बात का मलाल हर भाजपा कार्यकर्ता को है कि जब देश में चारों तरफ कमल खिल रहा था, तब इस भविष्यवाणी को करने वाला उनका प्रिय जननेता कृष्णा मेनन मार्ग की एक बंद कोठरी में निश्चेष्ट शैल की भांति चुपचाप मौन साधे बैठा था। काश! अटल अपनी भविष्यवाणी को सच होते देख पाते…राजनीति के अजातशत्रु को नमन।

(लेखक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं और नेशनलिस्ट ऑनलाइन के संपादक हैं।)

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